Greater Noida Farmer Protest: ग्रेटर नोएडा के किसान आर-पार के मूड़ में, 27 की महापंचायत में लेंगे बड़ा फैसला
Greater Noida Farmer Protest:
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 09:15 PM
Greater Noida Farmer Protest: पूरे ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के किसानों ने एक सुर में आर-पार की लड़ाई लडऩे की घोषणा की है। किसानों का कहना है कि अब ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी। इस लड़ाई की रणनीति बनाने के लिए 27 जून को प्राधिकरण के बाहर महापंचायत आयोजित की जाएगी। महा पंचायत के दिन प्राधिकरण कार्यालय के दोनों प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाएंगे और कोई बड़ा फैसला लिया जाएगा।
महापंचायत 27 जून को
15 दिन से जेल में बंद प्रमुख किसान नेताओं के कहने पर किसानों ने बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले के तहत 27 जून को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के कार्यालय पर एक महापंचायत बुलाई गई है। इस महापंचायत में आंदोलन को किसी निश्चित अंजाम तक पहुंचाने की रणनीति बनाई जाएगी। प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति में आंदोलन का काम देख रहे प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सुशील नागर ने चेतना मंच को बताया कि किसानों को शांतिपूर्ण ढंग से धरना देते हुए दो महीने का समय बीत गया है। अब इस आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने का मौका आ गया है। कोई बड़ा फैसला लेने के लिए पूरे क्षेत्र के किसानों की महापंचायत बुलाई गई है। यह महापंचायत 27 जून को होगी। उस दिन किसान कोई भी बड़े से बड़ा फैसला ले सकते हैं। इस बीच राजनैतिक विश्लेषकों ने भी इस आंदोलन को लेकर अपनी -अपनी टिप्पणियां करनी शुरू कर दी है।
किसान आंदोलन का भाजपा को होगा बड़ा नुकसान
राजनैतिक विश्लेषक एवं सामाजिक कार्यकर्ता कर्मवीर नागर प्रमुख ने ग्रेटर नोएडा के किसान आंदोलन पर एक विस्तृत विश्लेषण लिखा है। उनका कहना है कि बड़े ही विडंबना का विषय है कि जिन किसानों की भूमि पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण का नाम समूची दुनिया के पटल पर छा गया है, जिन किसानों की भूमि पर देश विदेश के इन्वेस्टर्स को सरकार आए दिन न्योता दे रही है, जिन किसानों की भूमि पर गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो गई हैं और बड़े-बड़े उद्योग और व्यापारिक संस्थान स्थापित हो गए हैं उसी किसान को अपनी आबादी भूमि और मुआवजा जैसी मूलभूत समस्याओं के निस्तारण के लिए कभी कडक़ड़ाती ठंड में तो कभी तपती धूप में और कभी झमाझम बारिश में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण कार्यालय के सामने धरना प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। लेकिन इस सब के बावजूद भी न जाने क्यूं प्राधिकरण के अधिकारी किसानों की ज्वलंत समस्याओं के निस्तारण के लिए कतई गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। कारण जो भी हो लेकिन किसानों के तमाम प्रयासों के बावजूद स्थानीय जनप्रतिनिधि भी किसानों की समस्याओं के निस्तारण पर अभी तक लाचार और बेबस नजर आए हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की बेबसी और लाचारी का कारण जो भी हो लेकिन किसानों के मुद्दों पर चुप्पी आम जनता में इसलिए भी चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि यह लोग जेवर के जनप्रतिनिधि से तुलना कर रहे हैं।
अब किसानों का धैर्य दे रहा है जवाब
श्री नागर आगे लिखते हैं कि जैसा की सर्वविदित है कि किसानों ने आबादी मामलों का निस्तारण करने, बगैर लीजबैक किए आबादी भूमि को शिफ्ट न करने, लीजबैक के 1451 मामलों का निपटारा करने, एसआईटी जांच की बाबत लीजबैक के 533 प्रकरण एवं बादलपुर के 208 प्रकरणों में मांगी गई रिपोर्ट की शासन से स्वीकृति लेना, किसानों के 6 एवं 8त्न के बजाय 10 परसेंट के भूखंड आवंटित करने, किसान कोटा खत्म न करने और भूमि अधिग्रहण में नए भूमि अधिग्रहण बिल को लागू करने जैसे मुद्दों पर 18 सूत्रीय मांग पत्र प्राधिकरण को सौंपा था। इन मुद्दों को लेकर किसान 14 मार्च 2023 से ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के सामने धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें से 33 किसानों को जेल भेज दिया गया और बहुत बड़ी तादाद में अन्य किसानों को शांति भंग करने की धारा में नोटिस भेजे जा रहे हैं। किसानों को जेल भेजने और ग्रामीणों को शांति भंग का नोटिस जारी करने से शांति प्रिय व मनपसंद लोग भले ही धरना प्रदर्शन करने से हिचक रहे हैं लेकिन लगभग 2 महीने से चल रहे धरने के बाद भी समाधान नहीं निकलने से ग्रामीणों में बेइंतहा रोष है।
नाराजगी क्या गुल खिलाएगी ?
श्री नागर ने लिखा है कि यह तो भविष्य में ही पता चल पाएगा कि इन ग्रामीणों की नाराजगी क्या गुल खिलाएगी क्योंकि किसानों के द्वारा अपनी मांगों के समर्थन में इस तरह का धरना प्रदर्शन पहली बार नहीं किया जा रहा है इससे पहले भी धरना प्रदर्शन होते रहे हैं। अगर हम विगत 6 साल के भाजपा शासन की ही बात करें तो बार-बार धरना प्रदर्शन के बाद भी किसानों की समस्या यथावत बनी हुई हैं। लेकिन इसके बावजूद भी इस क्षेत्र के ग्रामीणों ने भाजपा को मतदान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। आज भी नजर डालें तो गौतम बुद्ध नगर के किसान परिवारों से ताल्लुकात रखने वाले अधिकांशत: खद्दर धारी भाजपा के साथ हैं। लेकिन इसके बावजूद 2 महीने तक किसानों का भीषण गर्मी में जेल में बंद रहना और प्राधिकरण कार्यालय के बाहर पड़े रहना बड़ा ही शर्मनाक विषय है।
वे आगे लिखते हैं कि सोचने का विषय तो यह है कि जिन प्राधिकरणों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था भी तल्ख टिप्पणी कर चुकी हों उनके विषय में स्थानीय जनप्रतिनिधि सदनों में कभी आवाज ही उठाते नजर नहीं आते अगर प्राधिकरण और किसानों की बात को साफगोई तरीके से प्रदेश के मुखिया के सामने प्रस्तुत किया गया होता तो शायद अब तक कोई समाधान कर चुका होता। हो सकता है आज तक किसानों के विषय को माननीय मुख्यमंत्री के समक्ष ठीक से प्रस्तुत ही नही किया गया हो अन्यथा भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति पर काम करने वाली माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की सरकार शायद धरनारत किसानों की समस्याओं के निस्तारण का कोई रास्ता निकाल चुकी होती। लेकिन कभी-कभी यह सब भी संदेहास्पद नजर आने लगता है क्योंकि शासन द्वारा गैर पुश्तैनी काश्तकारों की जांच हेतु गठित एसआईटी जांच रिपोर्ट को आज तक भी उजागर न किया जाना इस बात की तरफ साफ इशारा करता है कि कहीं ना कहीं इस रिपोर्ट में सत्ता से जुड़े हुए ऐसे लोगों का भी कोई बड़ा गड़बड़ घोटाला है जिनके नाम उजागर होने से सत्ता और सरकार की किरकिरी हो सकती है।
वोट की राजनीति
श्री नागर ने अपने विश्लेषण में लिखा है कि अब तो गांवों में आम चर्चा का विषय यह भी है कि एक तरफ किसान हित के मुद्दों पर उदासीनता और दूसरी तरफ ग्रुप हाउसिंग सोसाइटीज में जनता दरबार लगाकर समस्याओं का निस्तारण करना स्पष्ट रूप से वोट की राजनीति के अलावा कुछ नहीं। क्योंकि शहरी क्षेत्र के मतदाताओं की संख्या में निरंतर हो रही भारी बढ़ोत्तरी की वजह से स्थानीय अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि ग्रामीणों के प्रति कुछ लापरवाह नजर आने लगे हैं और किसान आंदोलन की अनदेखी की भी यह मुख्य वजह मानी जा रही है।
अगर ऐसा है तो शायद किसान आंदोलन की अनदेखी करने वाले यह बड़ी भूल कर रहे हैं क्योंकि एक राजनीतिक दलों का टिकट देने का आधार यही किसान जातियां होती हैं। किसानों की इतनी भी अनदेखी करना ठीक नहीं है क्योंकि जिस दिन ग्रामीण क्षेत्र का मतदाता संगठित होकर पूरी तरह विरोध पर उतारू हो जाएगा तो चुनावी नतीजे बदलने में देर नहीं लगेगी।
चुनाव का बहिष्कार
श्री नागर आगे लिखते हैं कि अगर चुनावी वर्ष में भी किसानों के मुद्दों का समाधान नहीं किया गया तो गौतम बुद्ध नगर के किसान और ग्रामीण आगामी समय में चुनावी बहिष्कार का बड़ा फैसला ले सकते हैं। जिससे अंतरराष्ट्रीय पटल पर नोएडा ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण की साख को बट्टा लग सकता है। किसानों के साथ हो रहे अन्याय और उत्पीडऩ के विरुद्ध चुनाव बहिष्कार की यह खबर जब पूरी दुनिया में जाएगी तो इन्वेस्टर्स पर भी इसका बुरा असर पडऩा तय है जो सरकार के हित में नहीं है इसलिए समय रहते ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पर धरनारत किसानों के मुद्दों का समाधान किया जाना चाहिए अन्यथा चुनावी वर्ष में जनपद गौतम बुद्ध नगर के किसानों के साथ राकेश टिकैत जैसे बड़े किसान नेता और अन्य राजनीतिक दलों के नेता भी अपनी शिरकत करते नजर आ सकते हैं। जैसा कि फिलहाल भी सभी दलों के नेताओं की शिरकत से गतिविधियां तेज हो चली हैं