ग्रेटर नोएडा के रबूपुरा में एक परिवार के पांच सदस्यों की मौत पर व्यंग्यात्मक विश्लेषण। पोस्टमार्टम और वैज्ञानिक जांच से पहले मौत का कारण तय करने की जल्दबाजी पर सवाल।

Greater Noida News : किसी घर में पांच लोगों की एक साथ मौत हो जाए तो पूरा परिवार उजड़ जाता है। मां-बाप दुनिया छोड़ जाते हैं और उनके तीन मासूम बच्चे भी इस दुनिया में नहीं रहते। ऐसी घटना किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी है। लेकिन जब मौतों का कारण पता लगाने की जांच अभी चल ही रही हो, तब सार्वजनिक चर्चा में कारण का नाम इतनी जल्दी उभरने लगे कि लोग उसे अंतिम सच मान बैठें, तो सवाल उठना भी स्वाभाविक है। ग्रेटर नोएडा के रबूपुरा थाना क्षेत्र के नगला श्री पदम गांव में एक ही परिवार के पांच सदस्यों की मौत के मामले में कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा हो रहा है। पुलिस की प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, मृतक परिवार ने रात में नूडल्स खाए थे। पुलिस ने प्रथम दृष्टया फूड पॉइजनिंग की आशंका जताई है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि मौत का वास्तविक कारण अभी पुष्ट नहीं हुआ है। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है और फॉरेंसिक तथा अन्य वैज्ञानिक जांच की जा रही है। अब सवाल यह है कि जब खुद पुलिस की आधिकारिक जानकारी कह रही है कि असली कारण की पुष्टि होना बाकी है, तब इस घटना को लेकर किसी संभावित कारण को अंतिम निष्कर्ष की तरह पेश करने की जल्दबाजी क्यों होनी चाहिए?
यह भी पढ़ें : ग्रेटर नोएडा में एक ही परिवार के पांच लोगों की मौत, रात में खाई थी मैगी
चेतना मंच इस दुखद घटना से संबंधित तीन से अधिक समाचार प्रकाशित कर चुका है। समाचारों का उद्देश्य साफ है—घटना की जानकारी पाठकों तक पहुंचाना और जांच में सामने आने वाले तथ्यों से उन्हें अवगत कराना। लेकिन पत्रकारिता का एक बुनियादी सिद्धांत है कि सवाल पूछना और फैसला सुनाना दो अलग-अलग बातें हैं। रात में नूडल्स खाए गए थे, यह एक जानकारी है। उसके बाद पांच लोगों की मौत हुई, यह दूसरी जानकारी है। इन दोनों घटनाओं के बीच संबंध है या नहीं, इसका वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण काम है। अगर केवल इतना पता चलने से कि किसी ने रात में कोई खाद्य पदार्थ खाया था, मौत का कारण तय हो जाता, तो पोस्टमार्टम, फॉरेंसिक जांच और प्रयोगशालाओं की जरूरत ही क्या रह जाती? फिर तो हर मामले में घटनास्थल पर पहुंचकर यह पूछ लेना पर्याप्त होता कि रात के खाने में क्या बना था। मेन्यू मिलते ही जांच पूरी और प्रेस नोट जारी! व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन पांच जिंदगियों की मौत का मामला ऐसा नहीं है जिसमें अनुमान को प्रमाण की जगह दे दी जाए।
पुलिस पर किसी घटना की सच्चाई सामने लाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। उसे घटनास्थल का निरीक्षण करना होता है, साक्ष्य जुटाने होते हैं, संबंधित लोगों से पूछताछ करनी होती है और वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना होता है। इस मामले में पुलिस ने फील्ड यूनिट, फॉरेंसिक टीम और खाद्य सुरक्षा विभाग के मौके पर पहुंचने की जानकारी दी है। यह जांच की आवश्यक प्रक्रिया है। लेकिन जब जांच जारी हो, तब अधिकारियों की भाषा भी उतनी ही सावधान होनी चाहिए जितनी सावधानी से साक्ष्य जुटाए जाते हैं।
क्योंकि पुलिस की जुबान से निकला एक वाक्य आम नागरिक के लिए महज संभावना नहीं, कई बार सरकारी निष्कर्ष जैसा बन जाता है। यदि किसी अधिकारी के बयान या उसकी प्रस्तुति से यह संदेश जाता है कि पांचों मौतें फूड पॉइजनिंग से ही हुई हैं, जबकि आधिकारिक जांच में कारण की पुष्टि बाकी है, तो यह चिंता का विषय है। अधिकारी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-सी बात शुरुआती जानकारी है, कौन-सी आशंका है और किस निष्कर्ष के लिए अभी वैज्ञानिक प्रमाण की प्रतीक्षा है। आखिर कानून की प्रक्रिया में भी पहले जांच होती है, फिर निष्कर्ष निकलता है। यहां उलटा क्रम अपनाने की जरूरत किसे है?
यह भी पढ़ें : ग्रेटर नोएडा में निर्माणाधीन फैक्ट्री में युवक की मौत, करंट लगने की आशंका
इस घटना में नूडल्स का जिक्र सामने आने के बाद लोगों के मन में कई सवाल उठ सकते हैं। क्या भोजन दूषित था? क्या किसी अन्य खाद्य पदार्थ का सेवन किया गया था? क्या किसी विषैले पदार्थ की आशंका की जांच हो रही है? क्या मौतों के पीछे कोई दूसरी वजह हो सकती है? इन सवालों के उत्तर उपलब्ध जांच और मेडिकल रिपोर्ट से ही मिलने चाहिए। फिलहाल इनमें से किसी संभावना को प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। किसी खाद्य पदार्थ का सेवन करने और उसके बाद मौत होने के बीच समय का संबंध अपने आप यह साबित नहीं करता कि मौत उसी पदार्थ से हुई। इसके लिए चिकित्सकीय निष्कर्ष, पोस्टमार्टम और जरूरत पड़ने पर विषविज्ञान संबंधी जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए अभी नूडल्स को दोषी घोषित कर देना उतना ही अनुचित होगा, जितना किसी दूसरे कारण को बिना प्रमाण के जिम्मेदार ठहराना।
यह सवाल केवल पुलिस तक सीमित नहीं है। मीडिया की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। पांच लोगों की मौत अपने आप में बड़ी खबर है। इसमें सनसनी पैदा करने के लिए किसी खाद्य पदार्थ को मौत का कारण घोषित करने की जरूरत नहीं है। यदि जांच पूरी नहीं हुई है, तो शीर्षक में भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि मामला संदिग्ध है और कारण की पुष्टि बाकी है। ठकों का ध्यान आकर्षित करना पत्रकारिता का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पाठकों को किसी अपुष्ट निष्कर्ष पर पहुंचा देना पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। चेतना मंच ने इस मामले को प्रमुखता से उठाया है और आगे भी जांच से संबंधित पुष्ट जानकारी पाठकों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है। लेकिन समाचारों की संख्या बढ़ने से किसी आशंका का प्रमाण में बदल जाना संभव नहीं है। तीन खबरें हों या दस, सच वही होगा जिसकी पुष्टि साक्ष्य करेंगे।
नगला श्री पदम के इस परिवार में महेश, उनकी पत्नी ललिता और उनके तीन बच्चों की मौत ने एक ऐसा दुखद सवाल छोड़ दिया है, जिसका उत्तर केवल अनुमान से नहीं मिल सकता। परिवार को न्याय दिलाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए यह जानना जरूरी है कि वास्तव में क्या हुआ था। यदि जांच में फूड पॉइजनिंग की पुष्टि होती है, तो उसके स्रोत और परिस्थितियों की भी पड़ताल होनी चाहिए। यदि कारण कुछ और निकलता है, तो उस सच को भी उतनी ही स्पष्टता से सामने लाया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को भी अपनी प्रारंभिक टिप्पणियों में यह अंतर बनाए रखना चाहिए कि 'प्रथम दृष्टया आशंका' और 'जांच में प्रमाणित कारण' एक ही बात नहीं हैं। व्यंग्य की भाषा में कहें तो किसी गंभीर मामले में निष्कर्ष की गाड़ी को जांच से आगे दौड़ाने का कोई पुरस्कार नहीं मिलता। असली सफलता तब है, जब जांच पूरी होने पर ऐसा तथ्य सामने आए जिस पर पीड़ित परिवार, समाज और कानून—तीनों भरोसा कर सकें। पांच लोगों की मौत हो चुकी है। तीन मासूम बच्चों सहित एक पूरा परिवार खत्म हो गया। अब कम से कम सच्चाई को जल्दबाजी में दफन नहीं किया जाना चाहिए।
विज्ञापन