ग्रेटर नोएडा के चर्चित ग्रैंड वेनिस रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से जुड़े बहुचर्चित कथित घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने प्रोजेक्ट के प्रमोटर सतिंदर सिंह भसीन को मिली जमानत रद्द कर दी है।

Greater Noida News : ग्रेटर नोएडा के चर्चित ग्रैंड वेनिस रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से जुड़े बहुचर्चित कथित घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने प्रोजेक्ट के प्रमोटर सतिंदर सिंह भसीन को मिली जमानत रद्द कर दी है। भसीन पर करीब 1,300 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के गंभीर आरोप हैं। इतना ही नहीं, उनके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में 80 से अधिक एफआईआर दर्ज होने की बात भी सामने आई है। यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने सुनाया।
मामला ग्रेटर नोएडा के उस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जिसे निवेशकों के सामने बड़े सपनों के साथ पेश किया गया था। आरोप है कि हजारों लोगों को यहां ऑफिस स्पेस, दुकानों और होटल यूनिट्स का सपना दिखाकर निवेश कराया गया, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग निकली। अदालत के सामने जो तस्वीर आई, उसमें यह प्रोजेक्ट बुनियादी सुविधाओं तक से वंचित बताया गया। निवेशकों से प्रीमियम कीमत वसूलने के बावजूद परिसर में लिफ्ट, सीढ़ियां, एयर कंडीशनिंग, शौचालय और फायर सेफ्टी जैसी जरूरी व्यवस्थाएं तक ढंग से मौजूद नहीं हैं।
इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक स्वतंत्र दो सदस्यीय समिति पहले ही ग्रेटर नोएडा स्थित इस प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल खड़े कर चुकी थी। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने की, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली इसमें सदस्य थीं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट उपयोग और कब्जे के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रेटर नोएडा का यह प्रोजेक्ट पिछले 15 साल से ज्यादा समय से अधूरा पड़ा है। इसमें निवेशकों की करीब 1,000 करोड़ रुपये से अधिक राशि फंसी हुई बताई गई। यानी जिन लोगों ने बेहतर रिटर्न और विकसित कमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्मीद में पैसा लगाया था, वे अब तक इंतजार और अनिश्चितता में फंसे हुए हैं। समिति ने अपनी पड़ताल में पाया कि ग्रेटर नोएडा के इस बड़े प्रोजेक्ट में फिलहाल केवल ग्राउंड फ्लोर पर बना मॉल ही किसी हद तक संचालित हो रहा है, जबकि बाकी निर्माण अधूरा है। रिपोर्ट में कहा गया कि भवन के शेष हिस्से न तो पूरी तरह तैयार हैं और न ही उन्हें वैधानिक मंजूरियां मिली हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें न तो व्यावसायिक इस्तेमाल के योग्य माना जा सकता है और न कब्जा देने लायक। समिति ने डेवलपर कंपनी भसीन इंफोटेक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड (BIIPL) के रवैये को बेहद लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना बताया। रिपोर्ट में संकेत दिया गया कि परियोजना को जिस स्तर की निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए था, वह पूरी तरह नदारद रही।
मामले की तकनीकी सच्चाई जानने के लिए समिति ने पूर्व स्पेशल डायरेक्टर जनरल अनंत कुमार की सेवाएं लीं, जिन्होंने निर्माण की स्थिति का प्रारंभिक परीक्षण किया। उनकी रिपोर्ट में कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं। जांच में पाया गया कि स्वीकृत नक्शों और वास्तविक निर्माण के बीच बड़ा अंतर है। रिपोर्ट के अनुसार, 15 मंजिला प्रस्तावित ढांचे में अब तक शीर्ष मंजिल का निर्माण पूरा नहीं हुआ। इतना ही नहीं, 9वीं से 14वीं मंजिल के बीच कई हिस्सों में पार्टीशन वॉल तक नहीं बनी हैं। इसका मतलब यह है कि अलग-अलग यूनिट्स की स्पष्ट पहचान तक संभव नहीं है। ऐसी स्थिति किसी भी व्यावसायिक परियोजना के लिए गंभीर अनियमितता मानी जाती है। ग्रेटर नोएडा के इस प्रोजेक्ट पर एक और बड़ा सवाल फायर सेफ्टी को लेकर उठा। तकनीकी रिपोर्ट में बताया गया कि 25 जुलाई 2025 को जो फायर सेफ्टी क्लियरेंस लिया गया था, वह केवल 57.15 मीटर ऊंचाई, यानी लगभग आठवीं मंजिल तक ही मान्य है। जबकि प्रस्तावित इमारत की कुल ऊंचाई इससे अधिक है। ऐसे में स्पष्ट है कि पूरी संरचना अभी सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं मानी जा सकती। अनंत कुमार ने समिति को यह भी बताया कि मौजूदा स्वरूप में यह परियोजना न तो तकनीकी दृष्टि से पूर्ण है और न वैधानिक एवं सुरक्षा मानकों पर खरी उतरती है। इससे निवेशकों की सुरक्षा और अधिकार, दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करते समय साफ माना कि यह कोई साधारण मामला नहीं है। अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, बड़ी संख्या में प्रभावित निवेशक, ग्रेटर नोएडा में वर्षों से अधूरा पड़ा प्रोजेक्ट और अदालत द्वारा नियुक्त समिति की स्पष्ट रिपोर्ट यह बताती है कि मामले को हल्के में नहीं लिया जा सकता। शीर्ष अदालत की नजर में यह एक गंभीर आर्थिक अपराध का मामला है, जिसमें बड़ी रकम, बड़े पैमाने पर निवेशकों का भरोसा और लंबा समय शामिल है। ऐसे में आरोपी को जमानत पर बने रहने देना न्यायहित में उचित नहीं माना गया। Greater Noida News