ग्रेनो में एक साल बाद भी नहीं भरे जा सके अभियोजन अधिकारियों के खाली पद
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 12:08 AM
Greater Noida News : पीड़ितों को न्याय दिलाने और अपराधियों को सजा दिलवाने की सबसे अहम कड़ी माने जाने वाला अभियोजन विभाग पिछले एक साल से अभियोजन अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है। खासकर सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) और अभियोजन अधिकारी (पीओ) के पद लंबे समय से खाली हैं। जिससे केसों की सुनवाई और ट्रायल की रफ्तार बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
पिछले साल से एक एपीओ और दो पीओ के पद खाली
वर्तमान में गौतमबुद्ध नगर में अभियोजन विभाग के कुल आठ स्वीकृत पद हैं। इनमें एक संयुक्त निदेशक अभियोजन, एक ज्येष्ठ अभियोजन अधिकारी (एसपीओ), चार सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) एपीओ और दो अभियोजन अधिकारी (पीओ) के पद स्वीकृत हैं। लेकिन हालात यह हैं कि पिछले साल जुलाई में हुए ट्रांसफर के बाद से एक एपीओ और दो पीओ के पद खाली हैं। इनकी जगह केवल एक एसपीओ की तैनाती की गई। बाकी पद आज भी रिक्त हैं। नतीजतन जिले की 16 कोर्ट का काम महज एक संयुक्त निदेशक, एक एसपीओ और दो एपीओ के कंधों पर ही है। अभियोजन अधिकारियों की कमी का असर सबसे पहले गवाहों की पेशी पर पड़ता है।
जेवर की कोर्ट का काम भी संभाल रहे एपीओ
अभी संयुक्त निदेशक अभियोजन ब्रजेश कुमार मित्र की ओर से पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था), अपर पुलिस आयुक्त (अपराध/मुख्यालय) की कोर्ट का काम देखा जाता है। एसपीओ दूधनाथ प्रसाद की ओर से जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अपर सिविल जज (सीनियर डिविजन)/ एसीजेएम-1, सिविल जज (जूनियर डिविजन)/ एफटीसी-2 अदालत का काम देखा जाता है। एपीओ राजेश कुमार शुक्ला द्वारा अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन), अपर जिला मजिस्ट्रेट (भूमि अधिग्रहण), अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-द्वितीय अदालत का काम देखा जाता है। वहीं एपीओ गौरव पांडेय द्वारा अपर जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व), सिविल जज (सीनियर डिविजन)/ एफटीसी, अपर सिविल जज (सीनियर डिविजन)/एसीजेएम-2, किशोर न्याय बोर्ड का काम देखा जाता है।
यह आ रहीं दिक्कतें
कोर्ट में केस ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष को समय पर गवाहों को बुलाना और उनकी गवाही को रिकॉर्ड कराना होता है, लेकिन एक अधिकारी के पास एक से ज्यादा कोर्ट का काम होने के कारण गवाहों की पेशी में देर हो जाती है। कई बार गवाहों को कई तारीखों पर बुलाया जाता है, जिससे उनका भी समय बर्बाद होता है और केस कमजोर पड़ने का खतरा रहता है। दूसरी बड़ी दिक्कत सबूतों के संग्रहण और उनकी विवेचना में आती है। अभियोजन अधिकारियों की संख्या कम होने से उन्हें एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट में भागदौड़ करनी पड़ती है। कई बार केस डायरी, चार्जशीट और सबूतों के विश्लेषण में भूल हो जाती है। इससे अपराधियों को फायदा मिल सकता है।
कमिश्नर बनने के बाद काम का बोझ
वर्ष-2020 में गौतमबुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरेट लागू होने के बाद यहां न्यायालय की संख्या और केसों का बोझ बढ़ गया है। भूमाफिया, गैंगस्टर, नशा तस्करों और अन्य शातिर अपराधियों पर गैंगस्टर एक्ट समेत तमाम गंभीर धाराओं कमिश्नरेट बनने के बाद बढ़ा काम का बोझ, कार्रवाई हो रही है। सूरजपुर स्थित अभियोजन विभाग के अधिकारी लगातार केसों पर काम कर रहे हैं। लेकिन अदालतों और मामलों की संख्या बढ़ने के बावजूद अभियोजन विभाग के स्टॉफ में बढ़ोतरी नहीं की गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी और शासन को आठ भेजे गए पत्रों के बावजूद अभियोजन विभाग की इस समस्या का समाधान नहीं हुआ है।