क्या शहरों जैसे विकास का लाभ गांवों तक भी पहुंच रहा है या चमकते सेक्टरों के बीच ग्रामीण क्षेत्र अब भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं ? पूरी तस्वीर जानने के लिए पढ़िए ग्रेटर नोएडा से जुड़ी यह खास रिपोर्ट।

Greater Noida News : नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र आज देश-दुनिया में तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों के रूप में पहचाने जाते हैं। ऊंची-ऊंची इमारतें, मल्टीनेशनल कंपनियां, एक्सप्रेसवे, गेटेड सोसायटियां, बड़े-बड़े व्यावसायिक केंद्र और आधुनिक बुनियादी ढांचा इस क्षेत्र की पहचान बन चुके हैं। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक ऐसा सवाल लगातार खड़ा हो रहा है, जिसका जवाब गांवों के लोग लंबे समय से मांग रहे हैं। सवाल यह है कि जब गांवों को औद्योगिक नगरी क्षेत्र घोषित करके पंचायत व्यवस्था समाप्त कर दी गई, तो क्या इन गांवों को शहरों जैसी सुविधाएं और विकास का समान अधिकार नहीं मिलना चाहिए? ग्रामीण क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में कर्मवीर नागर प्रमुख ने इसी सवाल को उठाते हुए नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जिन गांवों की जमीन पर आज आधुनिक शहर खड़े हैं, उन्हीं गांवों को सफाई, सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट, सीवर और अन्य मूलभूत सुविधाओं के मामले में सेक्टरों की तुलना में पीछे क्यों रखा जा रहा है? Greater Noida News
गौतमबुद्धनगर के गांवों की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव तब आया जब नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्रों को औद्योगिक नगरी की अवधारणा के तहत विकसित किया गया। संविधान के अनुच्छेद 243Q के प्रावधानों का हवाला देते हुए इन क्षेत्रों में पारंपरिक पंचायत व्यवस्था के स्थान पर विकास प्राधिकरणों को प्रमुख भूमिका दी गई।इसके बाद गांवों में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत की पारंपरिक व्यवस्था समाप्त हो गई। उस समय यह तर्क सामने आया कि औद्योगिक नगरी के रूप में विकसित होने वाले इन क्षेत्रों में प्राधिकरण ही स्थानीय विकास और नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी संभालेंगे। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या गांवों को वास्तव में उसी स्तर की नागरिक सुविधाएं मिल रही हैं, जिसकी अपेक्षा पंचायत व्यवस्था समाप्त करते समय की गई थी? Greater Noida News
गौतमबुद्धनगर के गांवों के संदर्भ में पंचायत व्यवस्था समाप्त होने के बाद ग्रामीणों के सामने स्थानीय स्तर पर जवाबदेही का सवाल और गंभीर हो गया है।पहले ग्रामीण अपनी समस्या लेकर ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य अथवा जिला पंचायत अध्यक्ष तक पहुंच सकता था। गांव की सड़क खराब है, नाली बंद है, सफाई नहीं हो रही है, स्ट्रीट लाइट खराब है या कोई दूसरी स्थानीय समस्या है तो ग्रामीणों के पास अपने स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधि मौजूद था। अब स्थिति बदल चुकी है। ग्रामीणों को अपनी समस्या के समाधान के लिए संबंधित प्राधिकरण के कार्यालयों और अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि पंचायत व्यवस्था समाप्त की गई तो उसके स्थान पर ऐसी कौन सी मजबूत और जवाबदेह व्यवस्था बनाई गई, जिसके सामने गांव का आम नागरिक अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सके ? Greater Noida News
नोएडा से लेकर ग्रेटर नोएडा और जेवर तक जिस तेजी से शहरीकरण हुआ है, उसकी बुनियाद में ग्रामीण क्षेत्रों की जमीन रही है। किसानों की जमीन लेकर औद्योगिक, आवासीय और संस्थागत विकास किया गया।
भूमि अधिग्रहण और विकास के दौरान किसानों के सामने अनेक आश्वासन रखे गए। इनमें आबादी भूखंड, गांवों का शहरी तर्ज पर विकास, रोजगार के अवसर और अन्य सुविधाओं से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। आज जब इन्हीं क्षेत्रों में आधुनिक सेक्टर और विश्वस्तरीय परियोजनाएं विकसित हो रही हैं, तब गांवों के लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि जिस विकास की नींव उनकी जमीन पर रखी गई, उस विकास का समान लाभ गांवों की आबादी तक क्यों नहीं पहुंच रहा ? Greater Noida News
कर्मवीर नागर प्रमुख का आरोप है कि प्राधिकरणों की विकास व्यवस्था में गांवों और सेक्टरों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। शहरी सेक्टरों में नियमित सफाई, स्ट्रीट लाइट, पार्क, पक्की सड़कें, नालियों की सफाई और शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए व्यवस्थाएं मौजूद हैं। दूसरी तरफ कई गांवों में टूटी सड़कें, जलभराव, बंद नालियां, खराब स्ट्रीट लाइट और कूड़ा उठाने की समस्या ग्रामीणों की रोजमर्रा की परेशानी बनी हुई है। यह अंतर केवल सुविधाओं का अंतर नहीं है, बल्कि यह विकास के मानकों में समानता और प्रशासनिक प्राथमिकताओं से जुड़ा सवाल है। यदि गांव उसी औद्योगिक नगरी का हिस्सा हैं जिसमें अत्याधुनिक सेक्टर विकसित किए जा रहे हैं, तो गांवों में नागरिक सुविधाओं का स्तर भी उसी मानक का क्यों नहीं होना चाहिए? Greater Noida News
ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई व्यवस्था को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। प्राधिकरणों द्वारा ठेके के माध्यम से सफाई व्यवस्था संचालित किए जाने के बावजूद ग्रामीणों की शिकायत रहती है कि कई स्थानों पर नियमित और गुणवत्तापूर्ण सफाई नहीं होती। गांवों में नालियों की सफाई, कूड़ा उठाने, रास्तों की सफाई और जलभराव जैसी समस्याएं केवल सौंदर्य से जुड़ी समस्या नहीं हैं। इनका सीधा संबंध ग्रामीणों के दैनिक जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से है। कर्मवीर नागर प्रमुख का सुझाव है कि जिस प्रकार सेक्टरों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन और नियमित सफाई की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है, उसी प्रकार गांवों में भी डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रह, नियमित नाली सफाई और सफाई कार्यों की निगरानी सुनिश्चित की जानी चाहिए। Greater Noida News
ग्रामीण विकास को लेकर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में बजट का सवाल भी है। यदि प्राधिकरण गांवों के विकास के लिए बजट निर्धारित करता है तो ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके गांव के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, कितना खर्च हुआ और किन कार्यों पर खर्च हुआ। सड़क, नाली, सीवर, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, सामुदायिक केंद्र और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर निर्धारित धन का वास्तविक उपयोग कितना हुआ, इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। इस दिशा में थर्ड पार्टी ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्टिंग जैसी व्यवस्था ग्रामीण विकास में पारदर्शिता बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। Greater Noida News
पंचायत व्यवस्था समाप्त होने के बाद गांवों और प्राधिकरण के बीच संवाद की एक संस्थागत व्यवस्था बनाने का सुझाव भी सामने आया है। कर्मवीर नागर प्रमुख का कहना है कि प्रत्येक गांव में पांच सम्मानित बुजुर्गों और युवाओं को शामिल करके ग्राम विकास समिति बनाई जा सकती है। इस समिति को गांव की समस्याओं और विकास प्रस्तावों के संबंध में प्राधिकरण के सामने अपनी बात रखने का अधिकार दिया जाए।
ऐसी व्यवस्था पंचायत का विकल्प होने का दावा किए बिना भी ग्रामीणों और प्राधिकरण के बीच संवाद का प्रभावी माध्यम बन सकती है। इससे प्राधिकरण को भी गांव की वास्तविक स्थिति की जानकारी सीधे ग्रामीणों से मिल सकेगी और ग्रामीणों को अपनी समस्याओं के लिए केवल कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। Greater Noida News
गांव-प्राधिकरण संबंधों में सबसे संवेदनशील मुद्दा किसानों से जुड़े मामलों का है। आबादी भूखंड, अधिग्रहण, मुआवजा, रोजगार और अन्य लंबित मांगों को लेकर किसान संगठनों और ग्रामीणों की आवाज समय-समय पर सामने आती रही है। कर्मवीर नागर प्रमुख का कहना है कि जब तक किसानों को उनके अधिकारों और लंबित मामलों का समाधान नहीं मिलेगा, तब तक गांव और प्राधिकरण के बीच संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। यह मुद्दा केवल आर्थिक अधिकारों का नहीं है। यह उस भरोसे का भी प्रश्न है जो किसानों ने अपनी जमीन विकास के लिए देते समय शासन और प्राधिकरण की व्यवस्था पर किया था। Greater Noida News
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है। जब गांवों को औद्योगिक नगरी का हिस्सा बनाया गया और पंचायत व्यवस्था समाप्त हुई, तब अपेक्षा यह थी कि प्राधिकरण आधुनिक शहरी प्रशासन की तरह गांवों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे। लेकिन यदि गांवों में आज भी सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, सीवर और अन्य मूलभूत सुविधाओं की शिकायतें बनी हुई हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पंचायत व्यवस्था समाप्त होने से ग्रामीणों की सुविधा बढ़ी या उनकी स्थानीय आवाज कमजोर हुई? यह प्रश्न किसी एक गांव का नहीं है। यह नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र के उन तमाम गांवों से जुड़ा है जो तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्र के बीच अपनी पहचान और अधिकारों के सवाल से जूझ रहे हैं। Greater Noida News
कर्मवीर नागर प्रमुख द्वारा उठाए गए मुद्दों को व्यापक रूप में देखें तो गांवों के विकास के लिए पांच प्रमुख मांगें सामने आती हैं—
पहली—गांवों के लिए स्वीकृत विकास बजट का प्रभावी और पूर्ण उपयोग सुनिश्चित हो।
दूसरी—गांवों में सड़क, स्ट्रीट लाइट, सफाई, नाली और अन्य सुविधाओं के लिए सेक्टरों के समान विकास मानक लागू हों।
तीसरी—प्रत्येक गांव में ग्राम विकास समिति या गांव विकास बोर्ड जैसी संवाद व्यवस्था बनाई जाए।
चौथी—गांवों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन और नियमित सफाई व्यवस्था लागू हो तथा खराब काम करने वाले ठेकेदारों पर जवाबदेही तय हो।
पांचवीं—किसानों की आबादी, भूखंड और अन्य लंबित समस्याओं का समयबद्ध निस्तारण किया जाए। Greater Noida News
नोएडा और ग्रेटर नोएडा की पहचान आज विश्वस्तरीय शहर के रूप में बन रही है। जेवर में एयरपोर्ट के विकास और यमुना क्षेत्र में औद्योगिक एवं संस्थागत परियोजनाओं के विस्तार से इस पूरे क्षेत्र में आने वाले वर्षों में और बड़े बदलाव की उम्मीद है। लेकिन इस विकास की वास्तविक सफलता केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बड़े औद्योगिक निवेश से तय नहीं होगी। विकास की असली कसौटी यह भी होगी कि उस विकास के बीच बसे मूल गांवों की जिंदगी कितनी बदली। क्या गांवों को भी वही सड़क मिलेगी? क्या गांवों में भी वही सफाई होगी? क्या गांवों में भी पर्याप्त स्ट्रीट लाइट होंगी? क्या ग्रामीणों की शिकायत का समाधान उतनी ही तेजी से होगा जितनी तेजी से किसी विकसित सेक्टर की शिकायत का होता है? और सबसे महत्वपूर्ण क्या किसान और ग्रामीण स्वयं को इस विकास का साझेदार महसूस करेंगे? Greater Noida News
इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि जिस समय पंचायत व्यवस्था समाप्त की गई थी, उस समय कुछ ग्रामीणों को उम्मीद थी कि प्राधिकरण व्यवस्था के माध्यम से गांवों का तेजी से विकास होगा।
लेकिन यदि आज उन्हीं क्षेत्रों के ग्रामीण पंचायत व्यवस्था के पुनर्गठन की मांग कर रहे हैं तो इसे ग्रामीणों की बदलती सोच के रूप में देखा जा सकता है। इस मांग के पीछे मूल भावना यही दिखाई देती है कि गांवों के पास अपनी बात रखने वाला, उनके बीच रहने वाला और स्थानीय स्तर पर जवाबदेह कोई जनप्रतिनिधि होना चाहिए। यही वह बिंदु है जिस पर शासन और प्राधिकरणों को गंभीरता से विचार करना होगा। Greater Noida News
नोएडा और ग्रेटर नोएडा की चमक के पीछे इन गांवों की जमीन और किसानों का योगदान है। इसलिए गांवों को केवल अधिग्रहण के समय याद करना और उसके बाद विकास की मुख्यधारा से अलग छोड़ देना ग्रामीणों के भीतर असंतोष पैदा कर सकता है। औद्योगिक नगरी का वास्तविक अर्थ केवल उद्योग और ऊंची इमारतें नहीं हैं। इसका अर्थ ऐसी समावेशी व्यवस्था भी है जिसमें गांव, किसान, मजदूर, सेक्टर और उद्योग सभी विकास प्रक्रिया का हिस्सा हों। कर्मवीर नागर प्रमुख द्वारा उठाया गया सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि यदि पंचायत व्यवस्था समाप्त करके प्राधिकरणों को गांवों की जिम्मेदारी दी गई है, तो अब प्राधिकरणों को यह साबित भी करना होगा कि वे गांवों की समस्याओं को उसी गंभीरता से सुनते और हल करते हैं, जिस गंभीरता से वे विकसित सेक्टरों की समस्याओं को देखते हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा केवल कांच और कंक्रीट की इमारतों से नहीं बने हैं। इनके पीछे सैकड़ों गांवों की जमीन, किसानों का योगदान और ग्रामीण समाज का इतिहास है। इसलिए अब सवाल केवल विकास का नहीं है। सवाल यह है कि विकास का लाभ गांवों तक समान रूप से कब पहुंचेगा और औद्योगिक नगरी में रहने वाले ग्रामीणों को सम्मानजनक नागरिक सुविधाएं कब मिलेंगी? अगर इस सवाल का जवाब समय पर नहीं दिया गया तो विकास की चमक के बीच गांवों की आवाज और तेज होना स्वाभाविक है। Greater Noida News
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