यमुना एक्सप्रेस-वे पर 14 साल में 8,812 हादसों का दावा सामने आया है। 23 सितंबर 2026 की बस आग में 9 लोगों की मौत के बाद सुरक्षा, परमिट और जवाबदेही पर बड़े सवाल उठे हैं।

Greater Noida: यमुना 'नदी' को शास्त्रों में यमराज की बहन कहते हैं। जिस नदी का नाम यमराज की बहन के नाम पर रखा गया हो उसके नाम का मार्ग आज ‘‘यम’’ का द्वार बन गया है। यमुना एक्सप्रेस-वे पर 14 साल में 8,812 हादसे हुए हैं। 23 सितंबर 2026 की रात को बस में 9 जिंदगियां फिर जल गईं। फिर वही कहानी मुआवज़ा...। जांच के आदेश... और कोई जिम्मेदार नहीं। पर इस बार सवाल है- रेल हादसे पर इस्तीफा देने वाला देश सडक़ की लाशों पर चुप क्यों? दिल्ली से महोबा जा रही बस। नौ बदन जल गए, तीस लोग सुबह के अंधेरे में भागकर बचे। यह सिर्फ एक रात का हादसा नहीं यह उस सडक़ का 8,812वां हादसा है, जिसे पांच साल पहले ही 'मौत का राजमार्ग' कहा जा चुका था। आरटीओ, परमिट, पेट्रोलिंग, यमुना एक्सप्रेस-वे पर स्पीड लिमिट तमाम पाबंदियों के बावजूद यमुना एक्सप्रेस-वे पर हो रहे हादसों के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? जिस नदी को शास्त्र में यमराज की बहन 'यमी' कहते हैं, उसके नाम का मार्ग मौत का मार्ग कैसे बनता गया? 14 साल, 8,812 हादसे, हजारों लाशें और जिम्मेदारी का सवाल किसी से कहीं नहीं, आखिर ऐसा क्यों?
यम यानी मृत्यु के देवता। यमुना — जिन्हें वेदों में यम की जुड़वां बहन 'यमी' कहा गया है। पौराणिक मान्यता में वे सूर्य और संज्ञा की संतानें हैं — एक बहती नदी, दूसरा जलती चिता। जब 2012 में उत्तर प्रदेश की शान समझकर उसी यमुना के नाम पर 165 किलोमीटर का सबसे आधुनिक एक्सप्रेस-वे बना, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह नाम आने वाले सालों में मौत का कुआं बन जाएगा। बुधवार 23 सितंबर 2026 की मध्यरात्रि दिल्ली के कश्मीरी गेट से महोबा जा रही डबल डेकर बस यमुना एक्सप्रेस-वे के 33वें किलोमीटर पर आग की लपटों में घिर गई। बताया जाता है कि बस में 35 सवारियां थीं। एक महिला सहित नौ लोग जिंदा जल गए। सोए हुए यात्रियों ने जागते ही आखिरी सांस ली। आधे घंटे बाद मदद पहुंची, पर तब तक धुएं में दम घुट चुका था। यह सिर्फ एक हादसा नहीं — यह उस मार्ग की दास्तान है, जो 14 साल में हादसों का सबसे बड़ा इतिहास लिख चुका है। अगस्त 2012 में नोएडा-आगरा के बीच खुले यमुना एक्सप्रेस-वे (165 किलोमीटर, छह लेन) को एक बार किसी लड़ाकू विमान तक उतारकर 'विकास का शिखर' बताया गया था। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक यह मार्ग गौतम बुद्ध नगर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा चार जिलों से गुजरता है पर आज इसका हिसाब कुछ और ही कहता है।
यमुना एक्सप्रेसवे पर पिछले 14 सालों में 8,812 दुर्घटनाएं हुई हैं। यानी रोज़ाना औसतन 2 हादसे यदि सालवार आंकड़ें देखें तो 2017 में 763 हादसे/146 मौतें, 2018 में 659/111, 2019 में 560/195, 2020 में 509/122, 2021 में 424/136, 2022 में 303/106, 2023 में 411/95, 2024 में 528/112, 2025 में 1,198 हादसे, 113 मौतें और 562 लोग घायल हुए। हादसों के सबसे बड़े कारण नींद/झपकी (लगभग 42 प्रतिशत), ओवरस्पीडिंग और टायर फटना, जुलाई 2019 में लखनऊ से दिल्ली आ रही यूपी रोडवेज की बस पुल की रेलिंग तोडक़र 20 फीट गहरी नाली में गिरी थी जिसमें 29 लोगोां की मौतें हुई थीं। 16 दिसंबर 2025 में मथुरा के पास कोहरे में आठ बसों और दो छोटे वाहनों की भीषण टक्कर में आग लगने से 19 लोगों मौत हुई थी। जिसके बाद डीएनए से शवों की पहचान की गई। यानी "जलते बस" का यह दृश्य पहली बार नहीं। हर बार रेस्क्यू होता है, आयुक्त पत्रकारों से बात करते हैं, सरकार मुआवजे की घोषणा करती है। और अगले हादसे तक सब शांत हो जाता है। यम की बहन के नाम पर बना मार्ग आज सचमुच यम का दरवाजा बन गया है।
यमुना एक्सप्रेस-वे पर होने वाले हादसों पर कई बड़े सवाल खड़े होते हैं। 23 सितंबर 2026 की रात्रि में हुए हादसे में बस में 35 यात्री सवार थे जिनमें से 9 की मौत हो गई तथा 26 को बचाया गया। आग लगने के आधे घंटे बाद मदद पहुंची। सवाल यह है — देश के सबसे 'मॉर्डन' एक्सप्रेस-वे पर भी मदद की रफ्तार में इतनी देर क्यों? उस रात सोए लोगों को चद्दर ओढ़ाते वक्त किसी ने उनकी सांस के बारे में क्यों नहीं सोचा?
जमीन पर यह सवाल बरसों से घूम रहा है कि आरटीओ की मिलीभगत से बगैर फिटनेस, बगैर परमिट की बसें रात की सवारियां भरकर यमुना एक्सप्रेस-वे पर दौड़ती हैं। ये बसें कश्मीरी गेट से लेकर देश के तमाम हिस्सों तक चलती हैं, तो फिर परमिट किसका, देखरेख किसकी? परिवहन विभाग के अधिकारियों की भूमिका की जांच कौन करे, जब मामला 'सिस्टम' में घुल जाता है? हाल में (फरवरी 2026) आगरा मंडल के आयुक्त ने भी परमिट-रहित वाहनों को एक्सप्रेस-वे पर रोकने का निर्देश दिया था — यानी समस्या की गंभीरता अधिकारियों को भी पता है। लेकिन छानबीन करना और सजा देना दोनों अधूरे रह जाते हैं।
रिकॉर्ड बताते हैं कि पूरे एक्सप्रेस-वे पर सिर्फ तीन पुलिस पोस्ट, 30 कैमरे, छह एम्बुलेंस, छह गश्ती वाहन। 18,000 सोस वाले बूथ मृतप्राय है। स्पीड लिमिट तोडऩे वाले करोड़ों वाहन, पर चालान न के बराबर। वर्ष-2018 में ही पता चला था कि 2.4 करोड़ वाहनों ने स्पीड तोड़ी, पर केवल 31,000 चालान हुए। मतलब, कानून की आंख इस मार्ग पर बरसों से मींदती रही है। बाद में आईआईटी दिल्ली की सर्वे और सुरक्षा-समितियों के सुझावों पर काम हुआ, वार्षिक स्पीड सीमा घटाकर 75 किलोमीटर कर दी गई। पर क्या यह काफी है, जब रोज 2 हादसे होते रहते हैं? Greater Noida:
यमुना एक्सप्रेस-वे देश का वह आईना है, जिस पर राष्ट्र का दर्द नजर आता है। वर्ष-2024 में देश भर में 4,87,707 सडक़ दुर्घटनाएं हुई जिनमें 1,77,175 मौतें तथा 4.71 लाख घायल हुए। वर्ष-2025 में 1.8 लाख से अधिक मौतें — यानी हर रोज 502 लोग, हर घंटे लगभग 20 लोग सडक़ हादसे में मारे गए। वर्ष-2026 में (27 जुलाई तक) 2.96 लाख हादसे हुए जिनमें 1.01 लाख से अधिक मौतें हुईं। वर्ष के अंत तक आंकड़ा 1.77 लाख के आसपास रहने का अनुमान। राष्ट्रीय राजमार्ग एक्सप्रेस-वे पर ही पूरे देश की 35 प्रतिशत मौतें हुई हैं। इनमें उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। वर्ष-2023-25 तक 6,358 मौत हुई जिनमें से 671 अकेले उत्तर प्रदेश में यानी जब यमुना एक्सप्रेस-वे पर भीषण हादसे होते हैं, तो वे अकेले नहीं होते वे पूरे देश के सडक़-सुरक्षा संकट का पोस्टर बनते हैं।
इस रिपोर्ट का सबसे कड़वा सवाल यह है कि जिम्मेदारी किसकी? इतिहास गवाह है कि रेल हादसों पर नैतिक जिम्मेदारी लेने का एक संस्कार भारत में रहा है। लाल बहादुर शास्त्री ने (वर्ष-1956) महबूबनगर में 121 मौतों और फिर अरियालुर में 142 मौतों पर दो बार रेलमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। नीतीश कुमार ने (वर्ष-1999) में गैसल रेल हादसे (285-290 मौतें) के बाद "यह रेलवे की पूर्ण विफलता है, यह आपराधिक लापरवाही है" कहकर इस्तीफा दिया था। ममता बनर्जी (वर्ष-2000) में दो हादसों पर इस्तीफा पेश किया, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे अस्वीकार कर दिया था। वहीं सुरेश प्रभु ने (वर्ष-2017) में कैफियत और खतौली चार दिनों में दो हादसों पर नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा पेश किया था। पर अब वह संस्कार कहां गया? जब कभी रेल हादसा होता है तब भी मांग तो उठती है, जांच के आदेश होते हैं, फिर मुआवज़ा दिया जाता है पर किसी मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल ही नहीं उठता। और सडक़ तो रेल जितनी भी 'जिम्मेदारी' में नहीं आती सडक़ हादसों में जब हर साल 1.8 लाख लोग मरते हैं, तो किसी मंत्री के इस्तीफे का सवाल तो दूर, किसी विभाग की जवाबदेही का हिसाब भी कभी पेश नहीं होता।
यमुना एक्सप्रेस-वे विकास का सबसे खूबसूरत चेहरा है 165 किलोमीटर की चिकनी सडक़, जिस पर तेजी का जुनून है। पर जिस रफ्तार से यहां लाशें गिरती हैं, वह बताती है कि विकास और सुरक्षा दो अलग यात्रियों की तरह अब भी बैठे हैं एक गाड़ी में। यमुना एक्सप्रेस-वे पर स्पीड सीमा घटाई गई, कैमरे, पैट्रोलिंग, आईआईटी दिल्ली सर्वे किया गया। दिसंबर 2025 हादसे के बाद ले-बाइज, परमिट जांच उपाय हुए हैं, इसके बावजूद उस 33वें किलोमीटर पर रात में बस क्यों जल गई? सवाल उठता है कि यमुना एक्सप्रेस-वे पर 14 साल, 8,812 हादसों के बाद भी क्या 2027 में यही दोहराया जाएगा? जब तक हादसे की जड़ सोता चालक, अवैध बस, ढीली निगरानी पर सजा नहीं होती, तब तक हर साल नया कफन बुना जाएगा।जिस देश में शास्त्री और नीतीश ने हादसों पर इस्तीफा देकर 'जिम्मेदारी' शब्द की इज्जत बढ़ाई। वहां आज 1.8 लाख मौतों के बाद किसी का कोई इस्तीफा क्यों नहीं? क्या सडक़ की लाश रेल की लाश से कम है? Greater Noida:
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