यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस अग्निकांड में नौ यात्रियों की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय और यूपी के मुख्य सचिव से जवाब मांगा है। चेतना मंच ने हादसे को लगातार प्रमुखता से उठाया था।

Greater Noida: यमुना एक्सप्रेसवे पर 23-24 सितंबर की दरम्यानी रात स्लीपर बस में लगी भीषण आग में नौ यात्रियों की मौत के मामले ने अब देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय तथा उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से जवाब मांगा है। अदालत ने यह जानना चाहा है कि हादसे के बाद बस के चालक और पंजीकृत मालिक के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई तथा बस को नियमों के बावजूद सड़क पर कैसे चलने दिया गया। यमुना एक्सप्रेसवे के जेवर क्षेत्र में हुए इस दर्दनाक हादसे को चेतना मंच ने शुरुआत से ही गंभीर जनसरोकार का विषय बनाया था। हादसे के बाद चेतना मंच ने लगातार समाचार प्रकाशित किए, सोशल मीडिया के माध्यम से मामला उठाया और संबंधित स्तरों तक सवाल पहुंचाने के लिए ट्वीट तथा ई-मेल के माध्यम से भी आवाज उठाई। अब सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर इस मामले में जवाब-तलब होने से बस यात्रियों की सुरक्षा और परिवहन व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है। Greater Noida:
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने सोमवार को मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के सचिव को जवाब दाखिल करने को कहा। यह कार्रवाई आगरा निवासी किशन चंद जैन की ओर से दायर आवेदन के संदर्भ में हुई। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह सवाल भी उठाया गया कि जिस बस के खिलाफ पहले से यातायात उल्लंघनों और लगभग 1.75 लाख रुपये के बकाया चालान का मामला बताया जा रहा है, वह अंतरराज्यीय मार्ग पर यात्रियों को लेकर कैसे चलती रही। अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि चालक और पंजीकृत मालिक के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और बस संचालन से पहले आवश्यक नियमों का पालन किया गया था या नहीं।
23 सितंबर की रात दिल्ली से महोबा जा रही स्लीपर बस में जेवर के पास यमुना एक्सप्रेसवे पर अचानक आग लग गई। पुलिस जांच के अनुसार आग चालक के केबिन के आसपास से शुरू हुई और कुछ ही समय में बस के दूसरे हिस्सों तक फैल गई। इस हादसे में नौ यात्रियों की मौत हो गई, जबकि अन्य यात्रियों को बचाया गया। पुलिस जांच में बस के आपातकालीन निकास, सामान की स्थिति और यात्रियों के सुरक्षित बाहर निकलने की व्यवस्था से जुड़े सवाल भी सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार बस का आपातकालीन निकास काम नहीं कर रहा था और सामान के कारण यात्रियों के निकलने के रास्ते प्रभावित होने की आशंका की जांच की जा रही है।
यमुना एक्सप्रेसवे के इस अग्निकांड के बाद चेतना मंच ने इसे महज एक दर्दनाक दुर्घटना के रूप में नहीं देखा। चेतना मंच ने लगातार यह सवाल उठाया कि आखिर यात्रियों की जान की कीमत पर परिवहन व्यवस्था में लापरवाही कब तक चलती रहेगी? हादसे से जुड़े तथ्यों, बस की फिटनेस, सुरक्षा मानकों, यात्रियों की सुरक्षा, परिवहन विभाग की जवाबदेही और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों को लेकर चेतना मंच ने लगातार खबरें प्रकाशित कीं। समाचारों के साथ सोशल मीडिया पर ट्वीट किए गए और ई-मेल के माध्यम से भी संबंधित जिम्मेदार संस्थाओं का ध्यान इस गंभीर मामले की ओर आकर्षित किया गया। इसी वजह से अब जब इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों स्तरों पर मामला पहुंच चुका है, तो यह केवल एक बस दुर्घटना की जांच का विषय नहीं रह गया है, बल्कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा और सरकारी निगरानी की व्यवस्था का बड़ा सवाल बन चुका है। Greater Noida:
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस हादसे पर स्वतः संज्ञान लिया था। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने उत्तर प्रदेश में चल रही एसी स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था, परमिट, निरीक्षण और निर्धारित मानकों के पालन पर गंभीर सवाल उठाए थे। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से जानकारी मांगी तथा स्लीपर बसों की विशेष रूप से रात के समय जांच तेज करने को कहा। अदालत ने परिवहन विभाग से पिछले वर्षों में जारी स्लीपर बस परमिट, निरीक्षण, सुरक्षा मानकों के अनुपालन, फायर एक्सटिंग्विशर, आपातकालीन निकास और चालक-परिचालक के प्रशिक्षण सहित कई बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी है।
इस मामले में न्यायालयों के हस्तक्षेप के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी बसों की फिटनेस और सुरक्षा जांच वास्तव में उसी गंभीरता से होती है, जैसी कागजों पर दिखाई जाती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एसी स्लीपर बसों में फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास और चालक-परिचालक के प्रशिक्षण जैसे विषयों पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने यह भी पूछा है कि संबंधित बस निर्धारित Automotive Industry Standards (AIS) का पालन करती थी या नहीं। कोर्ट के सामने यह व्यापक तथ्य भी आया कि जनवरी 2023 से दिसंबर 2025 तक देश में बसों में आग लगने की 45 घटनाओं में 64 यात्रियों की मौत और 145 लोग घायल हुए थे। Greater Noida:
सुप्रीम कोर्ट के ताजा कदम के बाद अब निगाहें उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार की ओर हैं। अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि हादसे में शामिल बस के संचालन की अनुमति किन परिस्थितियों में थी, उसके परमिट और फिटनेस की स्थिति क्या थी, यातायात उल्लंघनों के बावजूद उसके संचालन पर रोक क्यों नहीं लगी और यात्रियों की सुरक्षा के लिए निर्धारित नियमों का पालन हुआ था या नहीं। इस मामले में अभी न्यायालयों की जांच और सुनवाई जारी है। इसलिए अंतिम जिम्मेदारी अथवा किसी अधिकारी, चालक, मालिक या संस्था की कानूनी दोषसिद्धि का निष्कर्ष अदालत की आगे की कार्यवाही के बाद ही सामने आएगा।
यमुना एक्सप्रेसवे बस अग्निकांड ने नौ परिवारों को ऐसा दर्द दिया है जिसकी भरपाई संभव नहीं। लेकिन इस त्रासदी के बाद यदि न्यायालयों की पहल से सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में स्थायी सुरक्षा सुधार होते हैं, बसों की जांच व्यवस्था मजबूत होती है और भविष्य में यात्रियों की जान बचाने के लिए प्रभावी नियम लागू होते हैं, तो यह इस त्रासदी से निकला एक महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणाम होगा।
चेतना मंच का मानना है कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य केवल घटना की सूचना देना नहीं, बल्कि जनहित के गंभीर सवालों को लगातार उठाना भी है। इस मामले में चेतना मंच ने हादसे के बाद अपनी आवाज लगातार बुलंद की। अब सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही ने इस पूरे प्रकरण को देशव्यापी सड़क सुरक्षा और यात्री सुरक्षा के बड़े विमर्श में ला दिया है। नौ यात्रियों की मौत का यह मामला अब सिर्फ एक हादसे की कहानी नहीं है—यह सवाल है कि सड़क पर चलने वाले हर यात्री की जिंदगी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? Greater Noida:
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