ईरान विरोध प्रदर्शन: ‘मुल्ला ईरान छोड़ो’ के नारे क्यों लगा रही Gen Z?
सबसे अहम बात यह है कि इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में युवा और कॉलेज छात्र नजर आ रहे हैं यानी वही पीढ़ी जिसे दुनिया Gen Z के नाम से जानती है। यही वजह है कि यह विरोध सिर्फ एक आर्थिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता बनाम नई पीढ़ी की टकराहट जैसा रूप लेता जा रहा है।

Iran Protest : ईरान के हालात एक बार फिर असामान्य हो गए हैं। राजधानी तेहरान से उठी विरोध की चिंगारी अब कई प्रांतों और शहरों तक फैल चुकी है। सड़कों पर भीड़ है, नारों का शोर है और सुरक्षा बलों के साथ टकराव की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। शुरुआती तौर पर यह आंदोलन महंगाई और आर्थिक बदहाली के खिलाफ शुरू हुआ माना जा रहा है, लेकिन अब इसकी दिशा बदलती दिख रही है लोग सिर्फ रोटी-महंगाई की बात नहीं कर रहे, सीधे सत्ता के केंद्र पर सवाल उठा रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक झड़पों में अब तक 17 लोगों की मौत की सूचना भी सामने आई है। सबसे अहम बात यह है कि इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में युवा और कॉलेज छात्र नजर आ रहे हैं यानी वही पीढ़ी जिसे दुनिया Gen Z के नाम से जानती है। यही वजह है कि यह विरोध सिर्फ एक आर्थिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता बनाम नई पीढ़ी की टकराहट जैसा रूप लेता जा रहा है।
ईरान में आखिर हो क्या रहा है?
बीते कुछ दिनों से देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हैं। तेहरान के साथ-साथ दूसरे शहरों, कस्बों और कई इलाकों तक इसका असर पहुंच चुका है। प्रदर्शनकारियों के नारों में अब ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे और ‘मुल्ला शासन’ के खिलाफ खुली चुनौती सुनाई दे रही है। जगह-जगह हालात तनावपूर्ण हैं और सुरक्षा एजेंसियां सख्ती के साथ आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही हैं, जिससे टकराव और बढ़ रहा है।
गुस्से की पहली वजह: चौपट अर्थव्यवस्था
ईरान में नाराजगी की सबसे बड़ी और तात्कालिक वजह आर्थिक संकट है। आम लोगों की जेब पर सबसे बड़ा हमला मुद्रा की गिरती कीमत ने किया है। ईरानी रियाल की हालत इतनी कमजोर हो चुकी है कि डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत ऐतिहासिक निचले स्तरों पर बताई जा रही है। नतीजा रोजमर्रा की चीजें आम परिवार की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।
- महंगाई ने खाने-पीने से लेकर दवा और ईंधन तक सब कुछ महंगा कर दिया है।
- बेरोजगारी और ठप होता कारोबार युवाओं के भविष्य पर सीधा वार कर रहा है।
- छोटे व्यवसाय और अस्थायी बाजार बंद होने से लोगों की आय का स्रोत सिकुड़ रहा है।
यानी संकट सिर्फ आंकड़ों का नहीं, घर-घर के चूल्हे का बन गया है।
लेकिन यह अब ‘सिर्फ आर्थिक विरोध’ नहीं रहा
ईरान की सड़कों पर जो दिख रहा है, वह अब महंगाई विरोध से आगे निकल चुका है। जब आर्थिक पीड़ा लंबे समय तक बनी रहती है, तो लोगों का गुस्सा सत्ता की नीतियों और शासन-प्रणाली पर आ टिकता है। अब विरोध में यह सवाल भी शामिल है कि देश की प्राथमिकताएं क्या हैं—जनता की जरूरतें या सत्ता के फैसले?
लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि आर्थिक तबाही केवल बाजार की वजह से नहीं, बल्कि शासन के फैसलों, व्यापक भ्रष्टाचार, और संसाधनों के बंटवारे की राजनीति की वजह से भी है। यही वह मोड़ है, जहां आंदोलन “राहत” की मांग से “बदलाव” की मांग में बदलने लगता है।
शासन और नेतृत्व से भरोसा टूटने की कहानी
ईरान में असंतोष नया नहीं है। 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हिजाब विरोधी आंदोलन ने बड़े पैमाने पर युवाओं और महिलाओं को सड़कों पर उतारा था। उस दौर से ही समाज और शासन के बीच दूरी बढ़ती चली गई। अब वही नाराजगी, नए कारणों के साथ और ज्यादा तीखे रूप में लौटती दिख रही है और इस बार मुद्दा केवल सामाजिक नियंत्रण नहीं, बल्कि आर्थिक अस्तित्व और राजनीतिक भविष्य भी है।
क्या निशाने पर सीधे खामेनेई हैं?
काफी हद तक, हां। विरोध का रुख अब सीधे सर्वोच्च नेतृत्व की ओर है। प्रदर्शनकारियों के नारों और संदेशों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता, शासन-शैली और फैसलों पर खुली नाराजगी झलक रही है। लोगों का कहना है कि जिस व्यवस्था में शीर्ष नेतृत्व के पास व्यापक अधिकार हों, वहां देश के संकट की जवाबदेही भी उसी सत्ता-केंद्र पर तय होती है। यही वजह है कि विरोध अब नीतियों की आलोचना से आगे बढ़कर “व्यवस्था” पर सवाल बनता जा रहा है।
Gen Z क्यों सबसे आगे है?
Gen Z के लिए यह लड़ाई सिर्फ आज की महंगाई नहीं, बल्कि कल के सपनों की है। ईरान की मौजूदा व्यवस्था ने जिस तरह अवसरों के दरवाज़े संकुचित किए हैं, उसका सबसे बड़ा बोझ उसी पीढ़ी के कंधों पर आ गया है जो अभी अपना भविष्य गढ़ना शुरू ही कर रही थी। इंटरनेट और वैश्विक दुनिया से जुड़कर पली-बढ़ी यह युवा जमात अब तुलना भी करती है और सवाल भी कि जब बाकी देश आगे बढ़ रहे हैं, तो उनके हिस्से में बेरोजगारी, गिरता जीवन-स्तर और अनिश्चितता क्यों? यही वजह है कि उनका गुस्सा सिर्फ रोटी-दामों तक सीमित नहीं रहता, वह आजादी, पहचान, सम्मान और बराबरी के हक की मांग बनकर सड़कों पर उतर आता है।
सरकार की प्रतिक्रिया
ईरानी प्रशासन ने विरोध को काबू में करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई है, गिरफ्तारी और सख्ती की खबरें आती रही हैं। संचार और इंटरनेट पर रोक-टोक जैसे उपाय भी विरोध की गति को धीमा करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। सरकार की तरफ से यह तर्क भी सामने आता रहा है कि आंदोलन को “बाहरी ताकतें” हवा दे रही हैं। लेकिन सड़कों पर दिख रहा गुस्सा बताता है कि मुद्दा लोगों की जिंदगी, उनकी आमदनी और उनकी उम्मीदों से जुड़ा है और यही बात इसे ज्यादा विस्फोटक बनाती है। Iran Protest
Iran Protest : ईरान के हालात एक बार फिर असामान्य हो गए हैं। राजधानी तेहरान से उठी विरोध की चिंगारी अब कई प्रांतों और शहरों तक फैल चुकी है। सड़कों पर भीड़ है, नारों का शोर है और सुरक्षा बलों के साथ टकराव की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। शुरुआती तौर पर यह आंदोलन महंगाई और आर्थिक बदहाली के खिलाफ शुरू हुआ माना जा रहा है, लेकिन अब इसकी दिशा बदलती दिख रही है लोग सिर्फ रोटी-महंगाई की बात नहीं कर रहे, सीधे सत्ता के केंद्र पर सवाल उठा रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक झड़पों में अब तक 17 लोगों की मौत की सूचना भी सामने आई है। सबसे अहम बात यह है कि इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में युवा और कॉलेज छात्र नजर आ रहे हैं यानी वही पीढ़ी जिसे दुनिया Gen Z के नाम से जानती है। यही वजह है कि यह विरोध सिर्फ एक आर्थिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता बनाम नई पीढ़ी की टकराहट जैसा रूप लेता जा रहा है।
ईरान में आखिर हो क्या रहा है?
बीते कुछ दिनों से देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हैं। तेहरान के साथ-साथ दूसरे शहरों, कस्बों और कई इलाकों तक इसका असर पहुंच चुका है। प्रदर्शनकारियों के नारों में अब ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे और ‘मुल्ला शासन’ के खिलाफ खुली चुनौती सुनाई दे रही है। जगह-जगह हालात तनावपूर्ण हैं और सुरक्षा एजेंसियां सख्ती के साथ आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही हैं, जिससे टकराव और बढ़ रहा है।
गुस्से की पहली वजह: चौपट अर्थव्यवस्था
ईरान में नाराजगी की सबसे बड़ी और तात्कालिक वजह आर्थिक संकट है। आम लोगों की जेब पर सबसे बड़ा हमला मुद्रा की गिरती कीमत ने किया है। ईरानी रियाल की हालत इतनी कमजोर हो चुकी है कि डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत ऐतिहासिक निचले स्तरों पर बताई जा रही है। नतीजा रोजमर्रा की चीजें आम परिवार की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।
- महंगाई ने खाने-पीने से लेकर दवा और ईंधन तक सब कुछ महंगा कर दिया है।
- बेरोजगारी और ठप होता कारोबार युवाओं के भविष्य पर सीधा वार कर रहा है।
- छोटे व्यवसाय और अस्थायी बाजार बंद होने से लोगों की आय का स्रोत सिकुड़ रहा है।
यानी संकट सिर्फ आंकड़ों का नहीं, घर-घर के चूल्हे का बन गया है।
लेकिन यह अब ‘सिर्फ आर्थिक विरोध’ नहीं रहा
ईरान की सड़कों पर जो दिख रहा है, वह अब महंगाई विरोध से आगे निकल चुका है। जब आर्थिक पीड़ा लंबे समय तक बनी रहती है, तो लोगों का गुस्सा सत्ता की नीतियों और शासन-प्रणाली पर आ टिकता है। अब विरोध में यह सवाल भी शामिल है कि देश की प्राथमिकताएं क्या हैं—जनता की जरूरतें या सत्ता के फैसले?
लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि आर्थिक तबाही केवल बाजार की वजह से नहीं, बल्कि शासन के फैसलों, व्यापक भ्रष्टाचार, और संसाधनों के बंटवारे की राजनीति की वजह से भी है। यही वह मोड़ है, जहां आंदोलन “राहत” की मांग से “बदलाव” की मांग में बदलने लगता है।
शासन और नेतृत्व से भरोसा टूटने की कहानी
ईरान में असंतोष नया नहीं है। 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हिजाब विरोधी आंदोलन ने बड़े पैमाने पर युवाओं और महिलाओं को सड़कों पर उतारा था। उस दौर से ही समाज और शासन के बीच दूरी बढ़ती चली गई। अब वही नाराजगी, नए कारणों के साथ और ज्यादा तीखे रूप में लौटती दिख रही है और इस बार मुद्दा केवल सामाजिक नियंत्रण नहीं, बल्कि आर्थिक अस्तित्व और राजनीतिक भविष्य भी है।
क्या निशाने पर सीधे खामेनेई हैं?
काफी हद तक, हां। विरोध का रुख अब सीधे सर्वोच्च नेतृत्व की ओर है। प्रदर्शनकारियों के नारों और संदेशों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता, शासन-शैली और फैसलों पर खुली नाराजगी झलक रही है। लोगों का कहना है कि जिस व्यवस्था में शीर्ष नेतृत्व के पास व्यापक अधिकार हों, वहां देश के संकट की जवाबदेही भी उसी सत्ता-केंद्र पर तय होती है। यही वजह है कि विरोध अब नीतियों की आलोचना से आगे बढ़कर “व्यवस्था” पर सवाल बनता जा रहा है।
Gen Z क्यों सबसे आगे है?
Gen Z के लिए यह लड़ाई सिर्फ आज की महंगाई नहीं, बल्कि कल के सपनों की है। ईरान की मौजूदा व्यवस्था ने जिस तरह अवसरों के दरवाज़े संकुचित किए हैं, उसका सबसे बड़ा बोझ उसी पीढ़ी के कंधों पर आ गया है जो अभी अपना भविष्य गढ़ना शुरू ही कर रही थी। इंटरनेट और वैश्विक दुनिया से जुड़कर पली-बढ़ी यह युवा जमात अब तुलना भी करती है और सवाल भी कि जब बाकी देश आगे बढ़ रहे हैं, तो उनके हिस्से में बेरोजगारी, गिरता जीवन-स्तर और अनिश्चितता क्यों? यही वजह है कि उनका गुस्सा सिर्फ रोटी-दामों तक सीमित नहीं रहता, वह आजादी, पहचान, सम्मान और बराबरी के हक की मांग बनकर सड़कों पर उतर आता है।
सरकार की प्रतिक्रिया
ईरानी प्रशासन ने विरोध को काबू में करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई है, गिरफ्तारी और सख्ती की खबरें आती रही हैं। संचार और इंटरनेट पर रोक-टोक जैसे उपाय भी विरोध की गति को धीमा करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। सरकार की तरफ से यह तर्क भी सामने आता रहा है कि आंदोलन को “बाहरी ताकतें” हवा दे रही हैं। लेकिन सड़कों पर दिख रहा गुस्सा बताता है कि मुद्दा लोगों की जिंदगी, उनकी आमदनी और उनकी उम्मीदों से जुड़ा है और यही बात इसे ज्यादा विस्फोटक बनाती है। Iran Protest












