
Israel Iran War : मध्य पूर्व में चल रहे ईरान-इजरायल संघर्ष पर भले ही कागज़ों में ‘सीजफायर’ की मुहर लग चुकी हो, लेकिन जमीनी हालात अब भी बारूद की तरह सुलग रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के बीच संघर्षविराम पर सहमति बनी थी, मगर ईरान की ओर से सोमवार को हुई मिसाइल वर्षा ने इस समझौते की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
इजरायली डिफेंस फोर्स के मुताबिक, महज एक घंटे में तीन मिसाइल हमले किए गए, जिनमें छह नागरिकों की जान चली गई। तेल अवीव और आसपास के शहरों में सायरन की आवाज़ें गूंज उठीं और लोग जान बचाने के लिए सुरक्षित आश्रयों की ओर दौड़े। ऐसे में अब बहस इस बात पर तेज हो गई है कि क्या यह युद्ध विराम वास्तव में लागू हुआ भी है या फिर यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय दबाव का एक कूटनीतिक छलावा भर था?
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हमलों को लेकर जो बयान दिया, वह स्पष्ट रूप से इस बात की तस्दीक करता है कि ईरान अभी पीछे हटने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा, “हमारी सेनाएं तब तक मोर्चे पर डटी रहेंगी, जब तक इजरायल को उसके हर हमले की सज़ा नहीं दे दी जाती। मैं अपने जवानों को सलाम करता हूं जो अंतिम सांस तक मातृभूमि की रक्षा में अडिग हैं। इस बयान से यह भी साफ होता है कि ईरान संघर्षविराम को एक राजनीतिक दबाव के रूप में नहीं देखता, बल्कि अपनी सैन्य स्थिति को बरकरार रखते हुए जवाबी कार्रवाई का अधिकार सुरक्षित रखना चाहता है।
13 जून को शुरू हुए इस युद्ध में ईरान को अब तक भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अमेरिकी हमलों ने उसके तीन प्रमुख परमाणु प्रतिष्ठानों — फोर्डो, नतांज और इस्फहान — को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। साथ ही, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख हुसैन सलामी सहित कई शीर्ष सैन्य अफसर और वैज्ञानिक मारे जा चुके हैं। मृतकों की कुल संख्या हज़ार के करीब पहुंच चुकी है, जबकि बुनियादी ढांचे को भी गहरा झटका लगा है।
इसके बावजूद ईरान की जवाबी कार्रवाई बताती है कि वह अब भी रणनीतिक मोर्चे पर सक्रिय है और खुद को एक कमजोर पक्ष के रूप में पेश नहीं होने देना चाहता। इस पूरे टकराव में ईरान न सिर्फ सैन्य मोर्चे पर अकेला रहा, बल्कि उसे क्षेत्रीय सहयोग भी नहीं मिला। मध्य-पूर्व के किसी बड़े देश ने उसका खुलकर समर्थन नहीं किया। रूस और चीन जैसे प्रभावशाली राष्ट्रों ने सीमित स्तर पर नैतिक समर्थन तो ज़रूर दिया, मगर प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के खिलाफ उतरने से परहेज किया।
ईरान पर सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। सैकड़ों नागरिकों की मौत और महत्वपूर्ण सैन्य एवं वैज्ञानिक नुकसान ने आम जनता और धार्मिक नेतृत्व को झकझोर दिया है। जानकारी के मुताबिक, इजरायल ने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई को भी निशाना बनाने की कोशिश की थी, जिसे ट्रंप की सीधी मध्यस्थता के चलते टाल दिया गया। Israel Iran War