
Israel Iran War : ईरान और इजरायल के बीच चली 12 दिनों की घातक जंग आखिरकार थम गई है, लेकिन सवाल अब भी बाकी हैं। क्या इस संघर्ष से वह मकसद हासिल हो गया, जिसकी दुहाई देकर युद्ध शुरू किया गया था? और सबसे अहम, क्या इससे ईरान की परमाणु क्षमता पर लगाम लगी या यह सिर्फ एक "लिमिटेड वॉर" था जिसमें इजरायल और अमेरिका ने अपने-अपने रणनीतिक एजेंडे पूरे किए?
अमेरिका की प्रत्यक्ष भागीदारी ने इस संघर्ष को और घातक बना दिया। अमेरिकी बंकर बस्टर बमों ने ईरान के फोर्डो, नतांज और इस्फहान जैसे प्रमुख परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्धविराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि क्या इससे उस परमाणु खतरे का स्थायी अंत हुआ, जिसकी आड़ में युद्ध छेड़ा गया था। सवाल उठ रहे हैं—क्या यह जंग पहले से फिक्स थी? क्या अमेरिका ने सिर्फ तीन ठिकानों को टारगेट करने के लिए इजरायल को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया? और क्या ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं सचमुच कुंद हो गई हैं?
वॉशिंगटन और तेल अवीव के दावों के उलट, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ईरान की संवर्धित यूरेनियम की भंडारण प्रणाली को कितना नुकसान पहुंचा है। अमेरिकी आकलन में यह जरूर कहा गया कि ईरान की परमाणु क्षमता अब ठप है, पर इसकी पुष्टि के कोई ठोस सबूत सामने नहीं आए।
अमेरिका ने इस आक्रमण के जरिए एक बार फिर यह जताने की कोशिश की कि वैश्विक मंच पर उसकी इच्छाशक्ति अब भी निर्णायक है।
इजरायल ने शुरुआत से ही यह दावा किया कि ईरान की न्यूक्लियर ताकत उसके अस्तित्व के लिए खतरा है। इस रणनीति के तहत उसने ईरान के शीर्ष वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों को टारगेट किया। इजरायली मीडिया के अनुसार पहले सप्ताह में 10 और दूसरे में 7 वैज्ञानिक मारे गए, साथ ही कई शीर्ष सैन्य कमांडर भी। इजरायल के लिए यह सैन्य दृष्टि से एक बड़ी ‘सर्जिकल’ सफलता मानी जा रही है।
जहां जंग में ईरान ने सैन्य रूप से भारी नुकसान झेला—हजार से ज्यादा नागरिकों की मौत, वैज्ञानिकों की हत्या और परमाणु ठिकानों को नुकसान—वहीं इसका राजनीतिक नेतृत्व इस युद्ध से और मजबूत होकर उभरा है। खामेनेई के शासन ने यह दिखा दिया कि अमेरिका और इजरायल की संयुक्त ताकत के आगे भी वह न तो झुका और न ही शर्तें मानीं। यह बात ईरान में सत्तारूढ़ व्यवस्था को घरेलू मोर्चे पर नया संबल देती है।
युद्ध के बाद ईरान की संसद ने संकेत दिए हैं कि वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी से बाहर निकलने वाला है।
नेशनल सिक्योरिटी कमेटी ने जो प्रस्ताव रखा है, उसमें साफ कहा गया है कि अब ईरान किसी बाहरी निरीक्षण को अनुमति नहीं देगा—न कैमरे लगेंगे, न निरीक्षण होगा, और न ही रिपोर्ट जमा की जाएगी। ईरान का तर्क है कि जब उसके ठिकानों पर सहयोग के बावजूद हमला हुआ, तो अब उसे अपनी संप्रभुता की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र निर्णय लेना होगा। Israel Iran War