गाय का दूध बना अंतरराष्ट्रीय मसला, अमेरिका पर भारत का सख्त स्टैंड
India-US Trade Deal
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 01:57 AM
India-US Trade Deal : भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते में एक बेहद असामान्य लेकिन अहम मुद्दा बार-बार दीवार बनकर खड़ा हो रहा है। गायों को मांस आधारित चारा दिए जाने से उत्पन्न मांसाहारी दूध का मामला। अमेरिका चाहता है कि भारत अपना डेयरी बाजार खोले, लेकिन भारत इस बात पर सख्त है कि ऐसे किसी भी डेयरी प्रोडक्ट की अनुमति नहीं दी जा सकती जो उन गायों से आता हो जिन्हें मांस, खून या पशु अवशेषों से बना चारा खिलाया गया हो।
भारतीय संस्कृति में गाय का बेहद महत्व
भारतीय संस्कृति में गाय न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि गाय का दूध, घी और उससे बने उत्पाद पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांडों का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि गायों को अगर नॉनवेज चारा खिलाया गया है, तो उनका दूध शुद्ध नहीं माना जा सकता और इस मुद्दे पर कोई रियायत नहीं दी जा सकती। एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ शब्दों में कहा है, "डेयरी क्षेत्र भारत की संस्कृति, आस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है। यह हमारी लक्ष्मण रेखा है जिसे पार नहीं किया जा सकता।" भारत का यह रुख देश की 80 करोड़ से अधिक शाकाहारी आबादी की आस्था और खानपान की मान्यताओं पर आधारित है।
इन शर्तों की हो चुकी है आलोचना
भारत सरकार अमेरिका से यह भी मांग कर रही है कि यदि किसी डेयरी प्रोडक्ट में पशु आधारित चारा उपयोग हुआ है तो उसे स्पष्ट रूप से लेबल किया जाए, ताकि उपभोक्ताओं को भ्रम न हो। वहीं अमेरिका इसे अनावश्यक व्यापार बाधा बता रहा है और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की इन शर्तों की आलोचना कर चुका है।
उठाना पड़ सकता है करोड़ों का नुकसान
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और इसका डेयरी उद्योग 8 करोड़ ग्रामीणों की आजीविका से जुड़ा है। यदि सस्ते अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट भारत में आयात होने लगे, तो इसका सीधा असर देश के छोटे किसानों और स्थानीय डेयरी कारोबार पर पड़ेगा। एक अनुमान के मुताबिक, ऐसा होने पर भारत को हर साल करीब 1.03 लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अमेरिका के चारे नहीं होते शुद्ध
गौरतलब है कि अमेरिका में आमतौर पर गायों को सस्ते प्रोटीन के लिए ऐसे चारे पर पाला जाता है जिनमें सूअर, मुर्गी, मछली, घोड़े और यहां तक कि कुत्ते-बिल्ली तक के अंगों का उपयोग होता है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि मुर्गियों की बीट, पंख और चर्बी तक को भी चारे में मिलाया जाता है।
स्वास्थ्य के लिए हो सकता है बड़ा खतरा
भारत में इस तरह की खाद्य प्रणाली को न सिर्फ स्वास्थ्य के लिहाज से खतरा, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं का गहरा अपमान माना जाता है। यही कारण है कि भारत ने आयातित डेयरी उत्पादों पर कड़ा पशु चिकित्सा प्रमाणन अनिवार्य कर रखा है, जिसमें यह तय किया जाता है कि प्रोडक्ट किस तरह के चारे से पाले गए पशुओं से प्राप्त हुआ है। भारत और अमेरिका दोनों ही 2030 तक आपसी व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने की तैयारी में हैं। लेकिन यदि मांसाहारी दूध पर सहमति नहीं बनती, तो यह डील आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है। भारत का संदेश स्पष्ट है व्यापार जरूरी है लेकिन आस्था से बड़ा कुछ नहीं।