
Shangri-La Dialogue : हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सामरिक नब्ज को टटोलने और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर निर्णायक संवाद के लिए भारत ने एक बार फिर अपनी रणनीतिक सक्रियता का प्रदर्शन किया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान शुक्रवार से सिंगापुर में शुरू हो रहे शांगरी-ला डायलॉग 2025 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। यह सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय सामरिक अध्ययन संस्थान (IISS) द्वारा आयोजित किया जाता है और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित रक्षा मंचों में गिना जाता है। तीन दिवसीय इस सम्मेलन में जनरल चौहान 40 से अधिक देशों के सैन्य प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे, जिनमें अमेरिका, यूके, जापान, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर जैसे रणनीतिक साझेदार शामिल हैं। चर्चा का केंद्र बिंदु रहेगा – हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, समुद्री स्थिरता और उभरते वैश्विक खतरों का साझा आकलन।
भारत ने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए पाकिस्तान को सामरिक मोर्चे पर झटका दिया था। अब कूटनीतिक क्षेत्र में भारत का रुख और भी सख्त नजर आ रहा है। देश के सात उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को उजागर कर रहे हैं। इसी रणनीति के तहत सीडीएस चौहान की शांगरी-ला डायलॉग में मौजूदगी को भारत की ‘रणनीतिक जवाबदेही’ का हिस्सा माना जा रहा है।
2002 में आरंभ हुआ यह सम्मेलन आज एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा रणनीतियों का एक निर्णायक मंच बन चुका है। इसका आयोजन हर वर्ष सिंगापुर के प्रसिद्ध शांगरी-ला होटल में होता है, और इसका नाम भी इसी होटल से प्रेरित है — जो शांति और संतुलन के प्रतीक ‘काल्पनिक स्वर्ग’ का प्रतिनिधित्व करता है।
इस डायलॉग में रक्षा मंत्री, सेना प्रमुख, नीति निर्माता, शोधकर्ता, थिंक टैंक और रणनीतिक विशेषज्ञ शिरकत करते हैं। IISS द्वारा आयोजित यह वार्षिक सम्मेलन उन मुद्दों पर खुली चर्चा को बढ़ावा देता है जिन पर आमतौर पर पर्देदारी में काम होता है — जैसे दक्षिण चीन सागर में सैन्य तनाव, ताइवान स्ट्रेट की सुरक्षा, साइबर खतरों का उभार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियाँ।
जब विश्व शक्तियों के बीच समुद्री प्रभुत्व, संप्रभुता और भू-राजनीतिक वर्चस्व को लेकर तनाव की स्थितियाँ उभरती हैं, तब शांगरी-ला डायलॉग जैसे मंचों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। भारत, जो कभी केवल एक क्षेत्रीय ताकत माना जाता था, अब वैश्विक रणनीतिक संतुलन का एक निर्णायक स्तंभ बनकर उभरा है। जनरल अनिल चौहान की इस डायलॉग में उपस्थिति न केवल भारत की सैन्य सोच का विस्तार दर्शाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संवादों का मौन दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय और निर्णायक भागीदार बन चुका है। Shangri-La Dialogue