
सुधीर कुमार ने लिखा है कि विश्व में एक बड़ी क्रांति होने वाली है।
स्वीडन ने दुनिया का सबसे बड़ा 'लकड़ी का शहर' (वुडन सिटी) राजधानी स्टॉकहोम के सिकला में स्थापित करने की घोषणा की है। इस काष्ठ-शहर की सभी इमारतें जैसे घर, रेस्तरां, कार्यालय, अस्पताल, विद्यालय और दुकानें लकड़ी से निर्मित होंगी। इसका उद्देश्य सिकला को ऐसा शहर बनाना है, जिसकी जलवायु परिवर्तन में हिस्सेदारी नगण्य हो। इस परियोजना की शुरुआत 2025 में होने की उम्मीद जताई जा रही है।
इस प्रस्तावित काष्ठ-शहर को टिकाऊ वास्तुकला और सतत शहरी विकास के एक नए युग के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, घर के निर्माण में लकड़ी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। औद्योगिक क्रांति से पूर्व लकड़ी महत्वपूर्ण निर्माण सामग्री हुआ करती थी, पर बढ़ते आधुनिकीकरण और आर्थिक संपन्नता के कारण निर्माण सामग्री में सीमेंट, बालू, ईंट और लोहे का वर्चस्व हो गया। दुष्परिणाम यह हुआ कि कंकरीट के जंगल बसाए जाने लगे, जिससे ग्लोबल वामिंग की समस्या गहराती चली गई।
कंकरीट की तुलना में लकड़ी से बने घर कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं। कम ऊष्मा अवशोषण के कारण ऐसे घर अपेक्षाकृत ठंडे भी रहते हैं और कंकरीट पर हमारी निर्भरता कम करते हैं। दुनिया भर में बालू की कमी का संकट गहरा रहा है, जिससे निर्माण कार्य बाधित हो रहे हैं। बालू के बेलगाम दोहन के कारण जलस्रोत का आधार भी समाप्त हो रहा है। सीमेंट एक महत्त्वपूर्ण आधुनिक निर्माण सामग्री है, जिसके बिना आधुनिक निर्माण की कल्पना नहीं की सकती है। लेकिन इसके 'कार्बन फुटप्रिंट' को देखते हुए निर्माण कार्यों में इसका कम इस्तेमाल करने और वैकल्पिक रूप में लकड़ी का उपयोग बेहतर समाधान हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लकड़ी के घर अधिक भूकंपरोधी होते हैं और इनमें उपयोग होने वाली लकडय़िां भी अग्निरोधी होती हैं।
हालांकि ऐसे दौर में, जब दुनिया भर में बनावरण सिकुड़ते जा रहे हैं, तब बड़े पैमाने पर काष्ठ-घरों का निर्माण पर्यावरण असंतुलन का कारण बन सकता है। भारत में आज भी पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों में अधिकांश घर लकड़ी और बांस की सहायता से ही बनाए जाते हैं। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में आज भी लोग मिट्टी से निर्मित घरों में रह रहे हैं। बहरहाल, जलवायु परिवर्तन हमें परंपरा की ओर लौटने का अवसर दे रहा है।