
Trump : डोनाल्ड ट्रंप जब अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत टैरिफ वॉर की शुरुआत की। उनका उद्देश्य था—चीन के बढ़ते आर्थिक दबदबे को चुनौती देना और अमेरिकी इकॉनोमी को फिर से मजबूती देना। लेकिन अब, वही ट्रंप टैरिफ पर नरम रुख अपनाते नजर आ रहे हैं और चीन के साथ समझौते की बात कर रहे हैं। ऐसा क्या हुआ कि ट्रंप अब बातचीत के लिए तैयार हो गए हैं?
ट्रंप ने 2018 में चीन के खिलाफ टैरिफ लगाकर ट्रेड वॉर की शुरुआत की।
उनका उद्देश्य था अमेरिकी कंपनियों और नौकरियों की रक्षा करना।
चीन पर आर्थिक दबाव बनाकर अपने शर्तों पर व्यापारिक समझौता करना चाहते थे। Trump
टैरिफ के चलते अमेरिकी डॉलर की कीमत में गिरावट देखने को मिली।
डॉलर कमजोर होने से आयात महंगे हो गए और महंगाई बढ़ने लगी।
निर्यात में थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन कुल मिलाकर नुकसान ज़्यादा हुआ। Trump
विदेशी निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ी, जिससे पूंजी प्रवाह (capital flow) धीमा हुआ।
बाजारों में अस्थिरता और कारोबारी माहौल में नकारात्मकता आई।
कई निवेशक अमेरिका की बजाय भारत जैसे उभरते बाजारों की ओर रुख करने लगे।
प्रसिद्ध निवेशक रुचिर शर्मा का मानना है कि टैरिफ रणनीति ने अमेरिका को ही अधिक नुकसान पहुंचाया।
डॉलर की कमजोरी ने अमेरिका की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को और घटा दिया।
टैरिफ से चीन की बजाय अमेरिकी उपभोक्ता और उद्योग ज्यादा प्रभावित हुए।
इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स ने भविष्यवाणी की है कि डॉलर में और गिरावट आ सकती है।
यूरो और येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर में 10% तक की गिरावट संभव है।
इस गिरावट के पीछे GDP की धीमी रफ्तार और व्यापारिक तनाव मुख्य वजहें हैं।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव को देखकर ट्रंप अब सहयोग का रास्ता अपना रहे हैं।
टैरिफ के बजाय अब व्यापार समझौतों और बातचीत से मसला सुलझाने की कोशिश की जा रही है।
ट्रंप का बयान – “हम एक बड़े ट्रेड वॉर को खत्म कर सकते हैं” – उनके बदले रुख को दर्शाता है। Trump :