H-1B वीजा पर ट्रंप की नीति पर अमेरिकी व्यापार जगत का पलटवार
भारत
RP Raghuvanshi
01 Dec 2025 07:08 PM
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा सभी नए H-1B वीजा (H-1B visa) आवेदनों पर 100,000 अमेरिकी डॉलर का शुल्क लगाने के फैसले के खिलाफ अमेरिकी व्यापार जगत ने कानूनी कदम उठाया है। यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स ने कोलंबिया की जिला अदालत में मुकदमा दायर कर इस निर्णय को गैरकानूनी और अमेरिकी व्यवसायों के लिए हानिकारक करार दिया है। —International News
चैंबर का कहना है कि यह कदम न केवल अमेरिकी इनोवेशन को कमजोर करेगा, बल्कि अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मकता भी घटाएगा। उनके मुताबिक, यह नीति विशेष रूप से छोटे और मध्यम आकार के व्यवसायों के लिए H-1B वीजा (H-1B visa) कार्यक्रम का उपयोग महंगा बना देगी। मौजूदा शुल्क 3,600 अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 100,000 डॉलर तक पहुंचने से स्टार्ट-अप्स के लिए यह एक "लागत का भारी बोझ" बन जाएगा।
कांग्रेस का अधिकार खतरे में
यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स ने इस कदम को कांग्रेस द्वारा तय किए गए कानूनों का उल्लंघन बताया है, जो स्पष्ट रूप से H-1B वीजा (H-1B visa) कार्यक्रम के तहत शुल्क तय करने का अधिकार देती है। चैंबर के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस के अधिकार को दरकिनार कर इस बढ़ोतरी को लागू करने की कोशिश की है, जो इमीग्रेशन और राष्ट्रीयता अधिनियम के खिलाफ है।
राष्ट्रपति का अधिकार क्षेत्र और भविष्य में आर्थिक प्रभाव
चैंबर का कहना है कि राष्ट्रपति के पास विदेशी नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश के संबंध में कुछ अधिकार होते हैं, लेकिन वे उस अधिकार का इस्तेमाल संविधान और अमेरिकी कानूनों के खिलाफ नहीं कर सकते। मुकदमे में यह भी कहा गया है कि अगर इस नीति को लागू किया गया तो अमेरिकी व्यवसायों को अतिरिक्त श्रम लागत का सामना करना पड़ेगा, जो उन्हें या तो कम कुशल श्रमिकों को नियुक्त करने के लिए मजबूर करेगा या फिर उनके आर्थिक मॉडल को नुकसान पहुंचेगा।
भारत और अन्य देशों पर प्रभाव
अमेरिका के H-1B वीजा (H-1B visa) कार्यक्रम के तहत भारत सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, जिसमें 71% से अधिक वीजा आवेदक भारतीय हैं। अमेरिकी कंपनियां इन वीजा पर काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को स्पॉन्सर करती हैं, और शुल्क में इस भारी बढ़ोतरी से विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों को प्रतिकूल असर हो सकता है। वहीं, चीन ने अपनी वीजा नीति में लचीलापन दिखाते हुए के-वीज़ा नामक नए वर्क परमिट की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर से उच्चतम स्तर की प्रतिभाओं को आकर्षित करना है।
चैंबर का कहना है कि H-1B वीजा (H-1B visa) के तहत आने वाले उच्च-प्रशिक्षित पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार, नई नौकरियां, उच्च वेतन और उत्पादों की बढ़ोत्तरी का कारण बनते हैं। इस नीति के परिणामस्वरूप, अमेरिकी व्यवसायों को या तो महंगे श्रमिकों को नियुक्त करना होगा या फिर निचले स्तर के कर्मचारियों को काम पर रखना पड़ेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।
चैंबर ने यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन की इस नीति का एक और गंभीर परिणाम यह हो सकता है कि अमेरिका अपने उच्च-प्रशिक्षित श्रमिकों को खो सकता है, जो अब अन्य देशों में काम करने के लिए जा सकते हैं। चीन जैसे देश, जो अपनी वीजा नीतियों को अधिक लचीला बना रहे हैं, ऐसे पेशेवरों को अपने यहाँ आकर्षित कर सकते हैं और अमेरिकी प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले एक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स की यह कानूनी चुनौती ट्रंप प्रशासन की इस नीति के खिलाफ एक गंभीर पलटवार है, जिसे अमेरिकी व्यवसायों और पेशेवरों द्वारा बेहद आलोचना किया जा रहा है। अब देखना यह है कि अदालत इस मामले में क्या फैसला देती है और क्या यह शुल्क वृद्धि अमेरिकी व्यवसायों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर लंबी अवधि में असर डालती है।