बिना जुर्म के अमेरिका में काटी 43 साल जेल, अब देश निकाले का खतरा!
भारत
चेतना मंच
30 Oct 2025 02:24 PM
जरा सोचिए, किसी बेगुनाह इंसान को 20 साल की उम्र में जेल भेजा जाए, और जब वह 64 का हो तो जाकर अदालत कहे तुम निर्दोष हो। यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि असल जिÞंदगी की है, सुब्रमण्यम वेदम की, जो भारतीय मूल के हैं और अमेरिका में 43 साल तक बिना किसी जुर्म के जेल में बंद रहे। जेल से रिहाई के बाद राहत मिलने की बजाय, उन्हें एक और सजा का सामना करना पड़ रहा है देश निकाले का। अब अमेरिकी प्रशासन उन्हें भारत भेजना चाहता है, जबकि न तो उनका भारत में कोई परिवार है, न वहां कोई पहचान। Washington/ New Delhi News :
20 साल की उम्र में जेल, 64 पर निर्दोष घोषित
सुब्रमण्यम वेदम, जिन्हें प्यार से सुभू कहा जाता है, का जन्म भारत में हुआ था, लेकिन उनका पूरा बचपन और जीवन अमेरिका के पेंसिलवेनिया में बीता। साल 1980 में उनके कॉलेज के दोस्त टॉम किंसर की हत्या हुई थी। आखिरी बार टॉम को सुभू के साथ देखा गया था और बस, यही एक वजह थी कि पुलिस ने बिना सबूत उन्हें गिरफ्तार कर लिया। कोई गवाह नहीं, कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं, कोई दुश्मनी नहीं लेकिन सुभू को विदेशी कहकर आजीवन कारावास की सजा दे दी गई। 1983 में उन्हें दोषी ठहराया गया और उनका पासपोर्ट व ग्रीन कार्ड जब्त कर लिया गया।
40 साल बाद खुली सच्चाई
सुभू के वकीलों ने वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाए। आखिरकार 2021 में नए फॉरेंसिक सबूत सामने आए जिन्होंने साफ कर दिया कि हत्या में इस्तेमाल गोली उस हथियार से मेल ही नहीं खाती थी, जो सुभू के खिलाफ सबूत के तौर पर पेश किया गया था। 2 अक्टूबर 2025 को पेंसिलवेनिया की अदालत ने सुभू को निर्दोष घोषित किया और माना कि अभियोजन पक्ष ने कई सबूत छिपाए थे।
यह राज्य के इतिहास का सबसे लंबा गलत-सजा वाला केस बन गया।
रिहाई के बाद भी आजादी नहीं
रिहाई के ठीक बाद, जैसे ही सुभू जेल से बाहर आने वाले थे, अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग ने उन्हें दोबारा हिरासत में ले लिया। अब उन्हें भारत भेजने की तैयारी हो रही है जबकि भारत में उनका कोई रिश्तेदार तक नहीं बचा। उनकी भांजी बताती हैं कि सुभू हिंदी तक नहीं बोल पाते, क्योंकि उन्होंने सारा जीवन अमेरिका में बिताया। उनका परिवार आज अमेरिका में रहता है और चाहता है कि वे यहीं रहें, लेकिन 1988 के पुराने डिपोर्टेशन आॅर्डर को बहाल करते हुए प्रशासन उन्हें भारत भेजना चाहता है।
बहन की गुहार : वो नेक इंसान है, उसे यहीं रहने दिया जाए
सुभू की बहन सरस्वती वेदम, जो मैसाच्युसेट्स में रहती हैं, कहती हैं कि उसने अपनी जवानी, मां-बाप, सब कुछ खो दिया, लेकिन इंसानियत नहीं। उसने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। अब अगर उसे भारत भेज दिया गया, तो वह फिर अकेला पड़ जाएगा। उसका घर यहीं है, उसके लोग यहीं हैं। एक तरफ न्यायालय ने स्वीकार किया कि सुभू निर्दोष हैं और उनके साथ न्यायिक अन्याय हुआ, वहीं दूसरी ओर अब वही सिस्टम उन्हें एक ऐसे देश भेजना चाहता है, जिसे वे जानते तक नहीं। यह कहानी सिर्फ़ एक इंसान की नहीं बल्कि न्याय और व्यवस्था की खामियों का आईना है।