ट्रंप की एक पोस्ट से मच गई खलबली, क्या भारत में होने वाला है कुछ बड़ा?

Donald Trump के ईरान को लेकर नए टैरिफ ऐलान ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है। अमेरिका द्वारा 25% टैरिफ लगाने की धमकी के बाद भारतीय शेयर बाजार में अचानक तेज गिरावट देखने को मिली है। सेंसेक्स और निफ्टी की शुरुआती तूफानी तेजी कुछ ही मिनटों में बड़ी कमजोरी में बदल गई है।

Donald Trump
अचानक क्यों फिसला शेयर बाजार?
locationभारत
userअसमीना
calendar13 Jan 2026 11:13 AM
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भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को जो अचानक बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला उसने निवेशकों को चौंका दिया। सेंसेक्स और निफ्टी ने शुरुआती कारोबार में जबरदस्त तेजी दिखाई लेकिन कुछ ही देर में यह तेजी भारी गिरावट में बदल गई। इस अचानक बदली चाल के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नया टैरिफ ऐलान मानी जा रही है। ईरान को लेकर दी गई डोनाल्ड ट्रंप की सख्त धमकी ने वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार की भी टेंशन बढ़ा दी है।

क्या है ट्रंप का नया टैरिफ ऐलान?

डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट करते हुए ऐलान किया कि अमेरिका, ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25% टैरिफ लगाएगा। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि जो भी देश इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान से व्यापार करेगा उसे अमेरिका के साथ अपने सभी व्यापार पर तत्काल प्रभाव से 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ देना होगा और यह फैसला अंतिम होगा। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।

भारतीय शेयर बाजार पर तुरंत दिखा असर

ट्रंप के इस बयान का असर भारतीय शेयर बाजार पर तुरंत देखने को मिला। बीएसई का सेंसेक्स अपने पिछले बंद 83,878.17 के मुकाबले मजबूती के साथ 84,000 के ऊपर खुला और कुछ ही मिनटों में 84,258 तक पहुंच गया लेकिन अचानक बाजार की दिशा बदली और सेंसेक्स करीब 250 अंक से ज्यादा टूटकर 83,616 के स्तर पर आ गया। वहीं एनएसई का निफ्टी भी 25,897 पर खुलने के बाद फिसलकर 25,709 तक पहुंच गया।

भारत को क्यों सता रहा 75% टैरिफ का खौफ?

असल चिंता की वजह यह है कि अगर अमेरिका ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लागू करता है, तो भारत पर पहले से लागू लगभग 50% टैरिफ बढ़कर 75% तक पहुंच सकता है। हालांकि भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद 2019 से ईरानी तेल का आयात बंद कर दिया है लेकिन इसके बावजूद भारत और ईरान के बीच अन्य कई तरह का व्यापार अब भी जारी है।

भारत-ईरान के बीच क्या-क्या ट्रेड होता है?

भारत ईरान को चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, कृत्रिम फाइबर, इलेक्ट्रिक मशीनरी और आर्टिफिशियल ज्वेलरी का निर्यात करता है। वहीं ईरान से भारत में सूखे मेवे, ऑर्गेनिक-इनऑर्गेनिक केमिकल्स और कांच के बर्तन आयात किए जाते हैं। ऐसे में अगर अमेरिका की तरफ से अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है तो इन सेक्टर्स पर सीधा असर पड़ सकता है।

किन शेयरों में दिखी सबसे ज्यादा गिरावट?

बाजार में आई अचानक गिरावट के चलते कई बड़े, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर दबाव में आ गए। लार्जकैप में L&T, HCL Tech और Bharti Airtel जैसे शेयरों में 1.5% से 2.3% तक की गिरावट देखने को मिली। मिडकैप सेगमेंट में Glenmark, Dixon Tech, Godrej Properties और AU Bank फिसलते नजर आए। वहीं स्मॉलकैप शेयरों में Lotus Chocolate, Jubilant Agri और NEC Life सबसे ज्यादा टूटने वाले शेयरों में शामिल रहे।

निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

ट्रंप के टैरिफ ऐलान ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में जियो-पॉलिटिकल टेंशन और ट्रेड वॉर का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे माहौल में शेयर बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे घबराकर फैसले न लें और लंबी अवधि की रणनीति के साथ निवेश करें।

(नोट- शेयर बाजार में किसी भी तरह के निवेश से पहले अपने मार्केट एक्सपर्ट्स की सलाह जरूर लें।)

 

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ईरान में विरोध प्रदर्शन : 5 बड़ी बातें जो जानना हैं जरूरी

ईरान को लेकर दुनिया भर की मीडिया में बहुत कुछ कहा जा रहा है। कई विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि ईरान में इस्लामिक शासन के अब गिनती के दिन ही बचे हैं। लेकिन ईरान एक ऐसा देश है जिस पर कोई भी राय बनाने से पहले हमें बेहद सावधानी बरतने की जरुरत है।

IRAN NEWS
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locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar12 Jan 2026 03:35 PM
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IRAN NEWS: ईरान एक बार फिर उथल पुथल के दौर से गुजर रहा है। सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन 15 दिनों से जारी है। अर्थव्यवस्था के बुरे हालात से उपजा अंसतोष अब सत्ता परिवर्तन की दिशा में मुड़ता दिख रहा है। ईरान को लेकर दुनिया भर की मीडिया में बहुत कुछ कहा जा रहा है। कई विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि ईरान में इस्लामिक शासन के अब गिनती के दिन ही बचे हैं। लेकिन ईरान एक ऐसा देश है जिस पर कोई भी राय बनाने से पहले हमें बेहद सावधानी बरतने की जरुरत है। हम उन पांच प्वाइंट पर चर्चा करेंगे जो ईरान को जानने-समझने के लिए जरुरी हैं:

1-ईरान पर सच कौन बोल रहा है?

ईरान में प्रेस और नागिरक अधिकारों पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं। विरोध प्रदर्शन के चलते देश भर में इंटरनेट पर रोक लगा दी गई है। वैसे भी ईरान दुनियाभर में सबसे अधिक इंटरनेट सेंसरशिप वाला देश रहा है। ऐसे में ईरान की सही खबरें बाहर आना मुश्किल है। दूसरी तरफ है वेस्टर्न मीडिया जो मुख्य तौर पर ईरान का आलोचक रही है। उसकी जानकारी पर भरोसा करना बड़ी गलती हो सकती है। ईरान और अमेरिका की दुश्मनी जग जाहिर है। ईरान मिडिल ईस्ट में अमेरिका हितों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट रहा है। ईरान की जनता सड़कों पर उतरी तो यूएस प्रेसिडेंट तुरंत एक्टिव हुए और प्रदर्शनकारियों के पक्ष में बयान देने लगे। दूसरी तरफ ईरानी सुप्रीम लीडर ने कहा कि प्रदर्शनकारी यूएस प्रेसिडेंट को खुश करने में लगे हैं।

इन दो विरोधी नजरियों के बीच ईरान की वास्तविकता को समझना एक चुनौती है। इसके लिए हमें लगातार फैक्ट्स को क्रॉस चेक करना होगा और घटनाक्रम का निष्पक्ष आकलन करना पड़ेगा?

2-क्या ईरान में हो सकता है सत्ता परिवर्तन?

यह पहली बार नहीं है जब ईरान में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं। पिछले 2 दशकों में देश में कई बार विरोध की लहरे उठीं लेकिन ईरानी सरकार इनसे पार पाने में सफल रही है। इससे पहले सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन 2009 में देखे गए थे जिसे ग्रीन मूवमेंट का नाम दिया गया। राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप इस आंदोलन की वजह बने थे। हालांकि तेहरान इन पर काबू पाने में कामयाब रहा। 2022 का साल भी ईरान में उथल पुथल का साल बन कर आया जब महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। लेकिन काफी मशक्कत के बाद सरकार विरोध की आवाज दबाने में सफल रही। फिलहाल कहना मुश्किल है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो सकता है या नहीं क्योंकि सरकार ऐसे प्रोटेस्ट को नियंत्रित करने का अनुभव रखती है। एतिहासिक रिकॉर्ड भी यही कहता है।

3-क्या अमेरिका कर सकता है सैन्य कार्रवाई ?

ट्रंप प्रशासन ने 3 जनवरी को वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। चीन और रूस की तरफ से सिर्फ औपचारिक विरोध दर्ज किया गया लेकिन कोई गंभीर चुनौती पेश नहीं की गई। ईरान का सहयोगी रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा है इसलिए वह ईरान की मदद करने की स्थिति में नहीं है। चीन की नीति किसी भी देश में सीधे हस्तक्षेप की नहीं रही है ऐसे में बीजिंग ईरान में कोई बड़ी भूमिका निभाएगा इसकी संभावनाएं बेहद कम है। यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के बयानों से साफ है कि वह ईरान को लेकर कड़ा फैसला कर सकते हैं। पिछले साल ही उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी। अमेरिका की तरफ से फिर से सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

4-ईरान की जनता राजशाही चाहती है या लोकतंत्र

ये सबसे बड़ा सवाल है जो इन विरोध प्रदर्शनों से खड़ा हुआ है। दरअसल प्रदर्शनों की शुरुआत से ही ऐसे वीडियो जमकर इंटरनेट पर वायरल हुए जिनमें लोग ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के समर्थन में नारेबाजी करते दिखे। ईरान में नागरिक और महिला अधिकारों पर पाबंदियां लगी है लेकिन जनता याद कर रही है शाह पहलवी को जिनके दमनकारी शासन ने 1979 की इस्लामिक क्रांति को जन्म दिया था। वहीं शाह के निर्वासित बेटे लगातार लोगों से विरोध में शामिल होने और सिटी सेंटर्स पर कब्जे का आह्वान कर रहे हैं। वह जल्द ही देश लौटने की घोषणा भी कर रहे हैं। उन्होंने ट्रंप से भी प्रदर्शनाकारियों की मदद करने की अपील की थी। कोई भी पूर्व पीएम मोहम्मद मोसद्दक का नाम नहीं ले रहा है। जिन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था जिससे नाराज होकर यूएस और यूके ने मिलकर एक साजिश के तहत उन्हें 1953 में सत्ता से हटा दिया था।

 5- ईरान के साथ जुड़ा है दुनिया का भविष्य

ईरान तेल, गैस और खनिज संसाधनों के मामले में दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है। यह तेल रिजर्व के मामले में तीसरे, गैस रिजर्व के बारे में दूसरे नंबर पर है। ईरान में खनन (माइनिंग) अभी भी विकास के चरण में है, फिर भी यह देश दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण खनिज उत्पादकों में से एक है। यह दुनिया के टॉप-15 मेजर मिनिरल रिच देशों में शामिल है, जहां 68 प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। अगर ईरान में इस्लामिक शासन का अंत होता तो और तेल और अन्य संसाधनों पर अमेरिका समर्थित सरकार का कब्जा होगा ऐसे में दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई और कीमतों को तय करने अमेरिका अहम भूमिका निभाएगा। वो पहले ही सबसे बड़े तेल रिजर्व वाले वेनेजुएला पर कब्जा कर चुका है। अगर ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में लिया कड़ा एक्शन तो दुनिया में एक बड़ा तेल संकट खड़ा हो सकता है। ईरान को दुनिया के इस महत्वपूर्ण तेल रूट में एक अहम रणनीतिक बढ़त हासिल है। वह इसे ब्लॉक कर सकता है। यहां से दुनिया का 20 से 30 फीसदी तेल गुजरता है। अगर हालात काबू से बाहर होते देख ईरानी सरकार यह कदम उठा सकती है। IRAN NEWS

 

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पीएसएलवी राकेट के तीसरे चरण में आई खराबी, अन्वेषा उपग्रह का क्या हुआ

लॉन्च के बाद मीडिया से बात करते हुए डॉ. नारायणन ने कहा कि रॉकेट के तीसरे चरण के अंत में तकनीकी गड़बड़ी का सामना करना पड़ा, जिससे मिशन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई।

pslv 1
1पीएसएलवी-सी62
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar12 Jan 2026 01:42 PM
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PSLV Launch : सोमवार को सुबह हुए पीएसएलवी-सी62 मिशन के तीसरे चरण में तकनीकी खामी आ गई, जिसके कारण मिशन को आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इसरो के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन ने इस तकनीकी समस्या की पुष्टि करते हुए बताया कि इसकी जांच प्रारंभ कर दी गई है। इस मिशन का उद्देश्य ईओएस-एन1 नामक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह और साथ में भेजे गए 15 छोटे उपग्रहों को सूर्य समकालिक कक्षा में स्थापित करना था। यह प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 10:17 बजे किया गया था।

रॉकेट के तीसरे चरण के अंत में तकनीकी गड़बड़ी आई

लॉन्च के बाद मीडिया से बात करते हुए डॉ. नारायणन ने कहा कि रॉकेट के तीसरे चरण के अंत में तकनीकी गड़बड़ी का सामना करना पड़ा, जिससे मिशन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। उन्होंने बताया कि पहले तीन चरणों में रॉकेट का प्रदर्शन सामान्य था, लेकिन चौथे चरण के दौरान एक हल्का बदलाव देखा गया, जिससे रॉकेट का मार्ग बदल गया। इस समय वैज्ञानिक टीम ग्राउंड स्टेशन से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन कर रही है, ताकि समस्या का कारण स्पष्ट किया जा सके।

पिछले साल भी पीएसएलवी मिशन में आई थी समस्या

पीएसएलवी रॉकेट में चार चरण होते हैं। पहला ठोस ईंधन से, दूसरा तरल ईंधन से, तीसरा फिर ठोस ईंधन से और चौथा तरल ईंधन से। तीसरे चरण तक रॉकेट ने अपेक्षित प्रदर्शन किया था, लेकिन उसके बाद कुछ समस्या उत्पन्न हो गई। इसरो के प्रमुख ने यह भी कहा कि पिछले साल मई में हुए पीएसएलवी-सी61 मिशन में भी तीसरे चरण में तकनीकी समस्या आई थी, जिससे वह मिशन भी पूरी तरह सफल नहीं हो सका था।

कई उपग्रह भी दुर्घटना के हुए शिकार

ईओएस-एन1 उपग्रह, जिसे अन्वेषा भी कहा जा रहा है, का उद्देश्य भारत की कृषि, शहरी योजना और पर्यावरण निगरानी क्षमता को बढ़ाना था। साथ ही, मिशन के तहत स्पेन की एक स्टार्टअप द्वारा विकसित केआईडी नामक एक छोटे पुन:प्रवेश यान का प्रदर्शन भी किया जाना था। यह मिशन इसरो की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड का नौवां वाणिज्यिक मिशन था। हालांकि पीएसएलवी रॉकेट का यह मिशन सफल नहीं हो सका, लेकिन इसरो का पीएसएलवी कार्यक्रम अब तक 63 सफल उड़ानें पूरी कर चुका है। इसके प्रमुख मिशनों में चंद्रयान-1, मंगल कक्षा मिशन, आदित्य-एल1 और एस्ट्रोसैट जैसे ऐतिहासिक अभियान शामिल हैं। 2017 में पीएसएलवी ने एक ही मिशन में 104 उपग्रहों को लॉन्च कर विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित किया था। इसरो की टीम ने जांच प्रक्रिया शुरू कर दी है, और पूरी उम्मीद है कि वे इस समस्या का समाधान जल्द निकालेंगे और भविष्य में इस तरह की गड़बड़ी से बचने के उपाय अपनाएंगे। अब यह देखना होगा कि यह गड़बड़ी भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष मिशनों पर क्या असर डालती है। क्या आपको लगता है कि इसरो जल्द ही इस समस्या का समाधान निकाल पाएगा?

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