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ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव अब सिर्फ सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे तेज कूटनीतिक जंग भी चल रही है।

Iran-US Tensions : ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव अब सिर्फ सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे तेज कूटनीतिक जंग भी चल रही है। पिछले कई हफ्तों से पाकिस्तान खुद को इस पूरे संकट का सबसे बड़ा मध्यस्थ साबित करने में जुटा था और पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को बैकचैनल डिप्लोमेसी का मुख्य चेहरा बताया जा रहा था। लेकिन अब अचानक कतर की एंट्री ने पूरे समीकरण को बदल दिया है। एक तरह से ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ खेला कर दिया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कतर की एक उच्चस्तरीय नेगोशिएशन टीम सीधे तेहरान पहुंची है और वह अमेरिका के साथ समन्वय बनाकर ईरान से बातचीत कर रही है। माना जा रहा है कि इसका मकसद युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य और परमाणु कार्यक्रम जैसे सबसे कठिन मुद्दों पर समझौते की कोशिश करना है।
Iran-US Tensions
अब तक पाकिस्तान यह संदेश देने की कोशिश कर रहा था कि वही अमेरिका और ईरान के बीच सबसे भरोसेमंद पुल है। आसिम मुनीर लगातार पश्चिम एशियाई देशों के संपर्क में थे और तेहरान दौरे को भी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि की तरह पेश किया जा रहा था। लेकिन जिस समय आसिम मुनीर तेहरान पहुंचे, उसी दौरान कतर की टीम का वहां पहुंचना कई सवाल खड़े कर गया। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन अब केवल पाकिस्तान के भरोसे नहीं रहना चाहता और उसने समानांतर बैकचैनल भी खोल दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान की कोशिशों की तारीफ जरूर की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि खाड़ी देशों के अपने हित हैं और अमेरिका सभी साझेदारों से बातचीत कर रहा है। इससे साफ संकेत मिला कि वॉशिंगटन अब बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रहा है।
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कतर लंबे समय से पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार माना जाता है। अफगानिस्तान में तालिबान वार्ता से लेकर गाजा संघर्ष तक, कतर ने कई बार बैकचैनल मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। कतर में मौजूद अल उदैद एयर बेस अमेरिका का मध्य पूर्व में सबसे बड़ा सैन्य ठिकाना माना जाता है। यही वजह है कि संकट के समय अमेरिका अक्सर कतर पर भरोसा करता है। दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा युद्ध में ईरान समर्थित हमलों से कतर भी प्रभावित हुआ था। रिपोर्टों के मुताबिक, मिसाइल और ड्रोन हमलों से उसकी सप्लाई और ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचा था। इसके बावजूद दोहा अब फिर बातचीत की मेज पर लौट आया है।
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ईरान-अमेरिका वार्ता में सबसे बड़ा अड़ंगा अब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बना हुआ है। यह वही समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल और गैस सप्लाई गुजरती है। ईरान इस रणनीतिक रास्ते पर नियंत्रण को अपनी ताकत के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। वहीं अमेरिका चाहता है कि यह समुद्री मार्ग पूरी तरह खुला रहे और किसी तरह का टोल सिस्टम लागू न हो। मार्को रुबियो ने साफ शब्दों में कहा कि अगर ईरान रास्ता खोलने को तैयार नहीं होता तो अमेरिका को प्लान बी भी तैयार रखना होगा। इससे संकेत मिलता है कि बातचीत के साथ-साथ सैन्य विकल्प भी टेबल पर मौजूद हैं।
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कूटनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज है कि ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान को पूरी तरह भरोसेमंद मध्यस्थ नहीं मान रहा। पाकिस्तान की चीन और ईरान दोनों से करीबी, अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। इसी वजह से अमेरिका ने कतर, ओमान और यूएई जैसे पुराने खाड़ी सहयोगियों को भी सक्रिय कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान के जरिए बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंचती, तो कतर जैसे देश अंतिम डील कराने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अगर ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो जाता है तो सबसे बड़ा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से तेल और गैस सप्लाई सामान्य हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में राहत मिलेगी। लेकिन अगर बातचीत फेल होती है तो पश्चिम एशिया में फिर बड़ा सैन्य टकराव शुरू हो सकता है। ऐसे में दुनिया भर में तेल की कीमतें, महंगाई और सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।
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