लम्बा इतिहास रहा है ईरान के क्रांतिकारी नेता अयातुल्ला अली खामनेई का
दरअसल अयातुल्ला अली खामनेई सिया मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा चेहरा था। अयातुल्ला अली खामनेई का इतिहास जानना बहुत जरूरी है। ईरान को एक शक्ति सम्पन्न देश बनाने वाले खामनेई की ईरान के लिए बड़ी भूमिका रही है।

Ayatollah Ali Khamenei : ईरान पूरी दुनिया के निशाने पर है। दुनिया भर में दादागिरी करने वाला अमेरिका ईरान में भी अपनी कठपुतली वाली सरकार चाहता है। इसी चाहत में अमेरिका ने ईरान के सबसे ताकतवर नेता अयातुल्ला अली खामनेई की हत्या कर दी। अयातुल्ला अली खामनेई की हत्या के विरोध में सिया मुस्लिम दुनिया भर में प्रदर्शन कर रहे हैं। दरअसल अयातुल्ला अली खामनेई सिया मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा चेहरा था। अयातुल्ला अली खामनेई का इतिहास जानना बहुत जरूरी है। ईरान को एक शक्ति सम्पन्न देश बनाने वाले खामनेई की ईरान के लिए बड़ी भूमिका रही है।
ईरान को कभी झुकने नहीं दिया खामनेई ने
86 वर्ष की उम्र में अमेकिरा के हाथों मारे गए अयातुल्ला अली खामनेई ने अपने जीवन में कभी भी ईरान को किसी के सामने झुकने नहीं दिया। खामनेई ने जीवन में कभी भी अमरीका की दादागिरी को स्वीकार नहीं किया। अयातुल्ला अली खामनेई के इतिहास की बात करें तो खामनेई का जन्म वर्ष-1939 में ईरान के उत्तर पूर्वी शहर मशहद में हुआ था। खामनेई जब मात्र चार साल के ही थे तो उन्हें पढ़ाई करने के लिए ‘‘मकतब’’ में भेज दिया गया। ईरान में स्कूल को ‘‘मकतब’’ यानी मदरसे में खामनेई ने कुरआन को पढऩा सीखा। खामनेई नेे औपचारिक स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की। थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने धर्मशास्त्र की पढ़ाई शुरू कर दी। मशहद के धार्मिक संस्थानों में शिक्षा लेने के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए इराक के पवित्र शहर नजफ पहुंचे, जहां उन्होंने कई प्रसिद्ध आयतुल्लाओं से शिक्षा ली। बाद में वे ईरान के धार्मिक केंद्र कुम पहुंच गए। कुम में उनकी मुलाकात रूहोल्लाह खुमैनी से हुई, जो उस समय शाह के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे थे। यही मुलाकात खामेनेई के जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई और यहीं से उनके राजनीतिक और वैचारिक सफर की असली शुरुआत हुई।
बहुत महत्वपूर्ण था खामेनई का राजनीति में जाना
1950-60 के दशक में ईरान पर पहलवी राजशाही का शासन था. 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाने के लिए विदेशी ताकतों की मदद से तख्तापलट किया गया। इस घटना ने अयातुल्ला अली खामेनेई की सोच पर गहरा असर डाला। वे शाह की नीतियों के आलोचक बन गए. कई बार उन्हें गुप्त पुलिस ने गिरफ्तार किया। शाह शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में सक्रिय रहने के कारण एक समय उन्हें ईरान के दूरदराज इलाके में निर्वासित भी कर दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा. 1978-79 में जब ईरान में क्रांति की लहर उठी, तो खामेनेई भी सडक़ों पर थे. आखिरकार 1979 में राजशाही का अंत हुआ और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, जिसके सर्वोच्च नेता बने रूहोल्लाह खुमैनी। इस्लामी क्रांति के बाद खामेनेई तेजी से सत्ता के केंद्र में उभरे. 1989 में उन्होंने ईरान की कमान संभाली। यह जिम्मेदारी उन्हें रूहोल्लाह खुमैनी की मौत के बाद मिली, जिन्होंने 1979 की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया था और पहलवी राजशाही को समाप्त किया था।
क्षेत्र का विकास शुरू किया
खुमैनी को क्रांति का वैचारिक नेता माना जाता है, लेकिन ईरान की सैन्य और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम खामेनेई ने किया. उन्होंने सेना और अर्धसैनिक ढांचे को इस तरह तैयार किया कि ईरान न सिर्फ अपने दुश्मनों से अपनी रक्षा कर सके, बल्कि क्षेत्र के बाहर भी अपना प्रभाव बढ़ा सके। सुप्रीम लीडर बनने से पहले खामेनेई 1980 के दशक में ईरान के राष्ट्रपति रहे. उस समय ईरान और इराक के बीच लंबा और खूनखराबे वाला युद्ध चल रहा था. इस युद्ध ने देश को भारी नुकसान पहुंचाया। उस दौर में कई पश्चिमी देशों ने इराक के नेता सद्दाम हुसैन का समर्थन किया। इससे ईरान में यह धारणा और मजबूत हुई कि पश्चिम, खासकर अमेरिका, उसके खिलाफ है। विश्लेषकों के अनुसार, इसी अनुभव ने खामेनेई के मन में पश्चिम और विशेष रूप से अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया, जो उनके पूरे शासनकाल में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। आयतुल्ला अली खामेनेई का मानना था कि ईरान को हमेशा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि देश को बाहर और अंदर दोनों तरह के खतरे हो सकते हैं। इसी सोच ने उनके लंबे शासन की नींव रखी. उन्होंने सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा और देश को एक मजबूत रक्षा व्यवस्था देने पर जोर दिया। खामेनेई के नेतृत्व में ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी को एक मजबूत संस्था बनाया गया। यह सिर्फ सेना की तरह काम नहीं करती थी, बल्कि राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी उसका असर बढ़ गया। खामेनेई ने "प्रतिरोध अर्थव्यवस्था" की बात भी की, ताकि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान अपने दम पर खड़ा रह सके। वे अमेरिका और पश्चिमी देशों पर भरोसा करने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन समय-समय पर उनके खिलाफ बड़े विरोध भी हुए. 2009 में चुनाव विवाद के बाद प्रदर्शन हुए, 2022 में महिलाओं के अधिकारों को लेकर लोग सडक़ों पर उतरे, और आर्थिक परेशानियों के कारण भी बड़े आंदोलन हुए। कई युवा बदलाव और बेहतर आर्थिक हालात चाहते थे। आलोचकों का कहना था कि खामेनेई नई पीढ़ी की उम्मीदों को समझ नहीं पाए और देश लगातार टकराव और अलगाव की राह पर चलता रहा।
अडयिल नहीं बल्कि व्यवहारिक नेता थे खाम खामेनेई
आयतुल्ला अली खामेनेई एक प्रैक्टिकल नेता माने जाते थे. उनका मानना था कि पश्चिम के खिलाफ लड़ाई एक ही तरीके से नहीं लड़ी जा सकती. वे कहते थे कि विरोध जरूरी है, लेकिन हालात की मांग हो तो बातचीत से भी परहेज नहीं करना चाहिए. 2015 में ईरान और दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच परमाणु समझौता हुआ. लेकिन तीन साल बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगा दिए। जवाब में खामेनेई ने अमेरिका से बातचीत से इनकार कर दिया और धीरे-धीरे समझौते की शर्तों से पीछे हटना शुरू किया. ईरान ने यूरेनियम संवर्धन 60 प्रतिशत तक बढ़ा दिया, हालांकि वह लगातार यह कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण और नागरिक उपयोग के लिए है।
बहुत बड़ी रणनीति पर काम करते रहे थे खामेनेई
"एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" यानी प्रतिरोध की धुरी खामेनेई की प्रमुख रणनीति थी. उनका मानना था कि ईरान को सिर्फ अपनी सीमाओं के भीतर नहीं, बल्कि बाहर भी मजबूत रहना होगा, ताकि अमेरिका और इजरायल जैसे विरोधियों को रोका जा सके। इसी सोच के तहत ईरान ने कई क्षेत्रीय समूहों को समर्थन, हथियार और प्रशिक्षण दिया। इस रणनीति के मुख्य योजनाकार कासिम सुलेमानी थे, जो ईरान की कुद्स फोर्स के प्रमुख थे। 2020 में अमेरिका के हमले में सुलेमानी की मौत खामेनेई के लिए बड़ा झटका साबित हुई। इस गठबंधन में हिज्बुल्लाह, बशर अल-असद, हमास, हूती आंदोलन और इराक के कई सशस्त्र गुट शामिल थे। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के दक्षिणी इजरायल पर हमले के बाद हालात तेजी से बदल।. इजरायल ने गाजा में व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें भारी तबाही हुई और हमास के कई शीर्ष नेता मारे गए। इसके बाद इजरायल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह को निशाना बनाया और उसके कई वरिष्ठ नेताओं को मार गिराया, जिनमें प्रमुख नेता हसन नसरल्लाह भी शामिल थे। दिसंबर 2024 में सीरिया में बशर अल-असद की सरकार गिर गई। इससे वह मार्ग भी बंद हो गया, जिसके जरिए ईरान हिज्बुल्लाह तक हथियार और सहायता पहुंचाता था। इस तरह ईरान के कई सहयोगी कमजोर पड़ गए। इन हालात में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने की वकालत करते रहे थे, उन्हें एक मौका मिल गया। 13 जून 2025 को इजरायल ने अमेरिका की जानकारी में ईरान पर हमला किया। इस हमले में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए और परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचा। ईरान ने जवाब में तेल अवीव पर मिसाइलें दागीं। लगभग दो हफ्ते तक संघर्ष चलता रहा और अंत में अमेरिका ने ईरान की तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं पर बड़े बम गिराए। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई शासन और ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिसके बाद यहां कई बड़े आर्थिक प्रदर्शन देखने को मिले. यह प्रदर्शन धीरे-धीरे जनवरी महीने में व्यापक आंदोलन में बदल गए और इस दौरान हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की खबरें सामने आईं। ट्रंप ने खामेनेई को खुली चेतावनियां दीं और परमाणु समझौता करने का दबाव बनाया. खामेनेई शासन बातचीत की प्रक्रिया में था, तभी शनिवार, 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त ऑपरेशन किया, जिसमें खामेनेई समेत कई ईरानी नेताओं को निशाना बनाया गया. इसी हमले में आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई और इसके साथ ही एक लंबे दौर का अंत हो गया। इस प्रकार ईरान ने ही नहीं दुनिया ने एक बहादुर देश भक्त नेता खो दिया है। Ayatollah Ali Khamenei
Ayatollah Ali Khamenei : ईरान पूरी दुनिया के निशाने पर है। दुनिया भर में दादागिरी करने वाला अमेरिका ईरान में भी अपनी कठपुतली वाली सरकार चाहता है। इसी चाहत में अमेरिका ने ईरान के सबसे ताकतवर नेता अयातुल्ला अली खामनेई की हत्या कर दी। अयातुल्ला अली खामनेई की हत्या के विरोध में सिया मुस्लिम दुनिया भर में प्रदर्शन कर रहे हैं। दरअसल अयातुल्ला अली खामनेई सिया मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा चेहरा था। अयातुल्ला अली खामनेई का इतिहास जानना बहुत जरूरी है। ईरान को एक शक्ति सम्पन्न देश बनाने वाले खामनेई की ईरान के लिए बड़ी भूमिका रही है।
ईरान को कभी झुकने नहीं दिया खामनेई ने
86 वर्ष की उम्र में अमेकिरा के हाथों मारे गए अयातुल्ला अली खामनेई ने अपने जीवन में कभी भी ईरान को किसी के सामने झुकने नहीं दिया। खामनेई ने जीवन में कभी भी अमरीका की दादागिरी को स्वीकार नहीं किया। अयातुल्ला अली खामनेई के इतिहास की बात करें तो खामनेई का जन्म वर्ष-1939 में ईरान के उत्तर पूर्वी शहर मशहद में हुआ था। खामनेई जब मात्र चार साल के ही थे तो उन्हें पढ़ाई करने के लिए ‘‘मकतब’’ में भेज दिया गया। ईरान में स्कूल को ‘‘मकतब’’ यानी मदरसे में खामनेई ने कुरआन को पढऩा सीखा। खामनेई नेे औपचारिक स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की। थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने धर्मशास्त्र की पढ़ाई शुरू कर दी। मशहद के धार्मिक संस्थानों में शिक्षा लेने के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए इराक के पवित्र शहर नजफ पहुंचे, जहां उन्होंने कई प्रसिद्ध आयतुल्लाओं से शिक्षा ली। बाद में वे ईरान के धार्मिक केंद्र कुम पहुंच गए। कुम में उनकी मुलाकात रूहोल्लाह खुमैनी से हुई, जो उस समय शाह के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे थे। यही मुलाकात खामेनेई के जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई और यहीं से उनके राजनीतिक और वैचारिक सफर की असली शुरुआत हुई।
बहुत महत्वपूर्ण था खामेनई का राजनीति में जाना
1950-60 के दशक में ईरान पर पहलवी राजशाही का शासन था. 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाने के लिए विदेशी ताकतों की मदद से तख्तापलट किया गया। इस घटना ने अयातुल्ला अली खामेनेई की सोच पर गहरा असर डाला। वे शाह की नीतियों के आलोचक बन गए. कई बार उन्हें गुप्त पुलिस ने गिरफ्तार किया। शाह शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में सक्रिय रहने के कारण एक समय उन्हें ईरान के दूरदराज इलाके में निर्वासित भी कर दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा. 1978-79 में जब ईरान में क्रांति की लहर उठी, तो खामेनेई भी सडक़ों पर थे. आखिरकार 1979 में राजशाही का अंत हुआ और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, जिसके सर्वोच्च नेता बने रूहोल्लाह खुमैनी। इस्लामी क्रांति के बाद खामेनेई तेजी से सत्ता के केंद्र में उभरे. 1989 में उन्होंने ईरान की कमान संभाली। यह जिम्मेदारी उन्हें रूहोल्लाह खुमैनी की मौत के बाद मिली, जिन्होंने 1979 की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया था और पहलवी राजशाही को समाप्त किया था।
क्षेत्र का विकास शुरू किया
खुमैनी को क्रांति का वैचारिक नेता माना जाता है, लेकिन ईरान की सैन्य और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम खामेनेई ने किया. उन्होंने सेना और अर्धसैनिक ढांचे को इस तरह तैयार किया कि ईरान न सिर्फ अपने दुश्मनों से अपनी रक्षा कर सके, बल्कि क्षेत्र के बाहर भी अपना प्रभाव बढ़ा सके। सुप्रीम लीडर बनने से पहले खामेनेई 1980 के दशक में ईरान के राष्ट्रपति रहे. उस समय ईरान और इराक के बीच लंबा और खूनखराबे वाला युद्ध चल रहा था. इस युद्ध ने देश को भारी नुकसान पहुंचाया। उस दौर में कई पश्चिमी देशों ने इराक के नेता सद्दाम हुसैन का समर्थन किया। इससे ईरान में यह धारणा और मजबूत हुई कि पश्चिम, खासकर अमेरिका, उसके खिलाफ है। विश्लेषकों के अनुसार, इसी अनुभव ने खामेनेई के मन में पश्चिम और विशेष रूप से अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया, जो उनके पूरे शासनकाल में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। आयतुल्ला अली खामेनेई का मानना था कि ईरान को हमेशा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि देश को बाहर और अंदर दोनों तरह के खतरे हो सकते हैं। इसी सोच ने उनके लंबे शासन की नींव रखी. उन्होंने सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा और देश को एक मजबूत रक्षा व्यवस्था देने पर जोर दिया। खामेनेई के नेतृत्व में ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी को एक मजबूत संस्था बनाया गया। यह सिर्फ सेना की तरह काम नहीं करती थी, बल्कि राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी उसका असर बढ़ गया। खामेनेई ने "प्रतिरोध अर्थव्यवस्था" की बात भी की, ताकि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान अपने दम पर खड़ा रह सके। वे अमेरिका और पश्चिमी देशों पर भरोसा करने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन समय-समय पर उनके खिलाफ बड़े विरोध भी हुए. 2009 में चुनाव विवाद के बाद प्रदर्शन हुए, 2022 में महिलाओं के अधिकारों को लेकर लोग सडक़ों पर उतरे, और आर्थिक परेशानियों के कारण भी बड़े आंदोलन हुए। कई युवा बदलाव और बेहतर आर्थिक हालात चाहते थे। आलोचकों का कहना था कि खामेनेई नई पीढ़ी की उम्मीदों को समझ नहीं पाए और देश लगातार टकराव और अलगाव की राह पर चलता रहा।
अडयिल नहीं बल्कि व्यवहारिक नेता थे खाम खामेनेई
आयतुल्ला अली खामेनेई एक प्रैक्टिकल नेता माने जाते थे. उनका मानना था कि पश्चिम के खिलाफ लड़ाई एक ही तरीके से नहीं लड़ी जा सकती. वे कहते थे कि विरोध जरूरी है, लेकिन हालात की मांग हो तो बातचीत से भी परहेज नहीं करना चाहिए. 2015 में ईरान और दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच परमाणु समझौता हुआ. लेकिन तीन साल बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगा दिए। जवाब में खामेनेई ने अमेरिका से बातचीत से इनकार कर दिया और धीरे-धीरे समझौते की शर्तों से पीछे हटना शुरू किया. ईरान ने यूरेनियम संवर्धन 60 प्रतिशत तक बढ़ा दिया, हालांकि वह लगातार यह कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण और नागरिक उपयोग के लिए है।
बहुत बड़ी रणनीति पर काम करते रहे थे खामेनेई
"एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" यानी प्रतिरोध की धुरी खामेनेई की प्रमुख रणनीति थी. उनका मानना था कि ईरान को सिर्फ अपनी सीमाओं के भीतर नहीं, बल्कि बाहर भी मजबूत रहना होगा, ताकि अमेरिका और इजरायल जैसे विरोधियों को रोका जा सके। इसी सोच के तहत ईरान ने कई क्षेत्रीय समूहों को समर्थन, हथियार और प्रशिक्षण दिया। इस रणनीति के मुख्य योजनाकार कासिम सुलेमानी थे, जो ईरान की कुद्स फोर्स के प्रमुख थे। 2020 में अमेरिका के हमले में सुलेमानी की मौत खामेनेई के लिए बड़ा झटका साबित हुई। इस गठबंधन में हिज्बुल्लाह, बशर अल-असद, हमास, हूती आंदोलन और इराक के कई सशस्त्र गुट शामिल थे। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के दक्षिणी इजरायल पर हमले के बाद हालात तेजी से बदल।. इजरायल ने गाजा में व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें भारी तबाही हुई और हमास के कई शीर्ष नेता मारे गए। इसके बाद इजरायल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह को निशाना बनाया और उसके कई वरिष्ठ नेताओं को मार गिराया, जिनमें प्रमुख नेता हसन नसरल्लाह भी शामिल थे। दिसंबर 2024 में सीरिया में बशर अल-असद की सरकार गिर गई। इससे वह मार्ग भी बंद हो गया, जिसके जरिए ईरान हिज्बुल्लाह तक हथियार और सहायता पहुंचाता था। इस तरह ईरान के कई सहयोगी कमजोर पड़ गए। इन हालात में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने की वकालत करते रहे थे, उन्हें एक मौका मिल गया। 13 जून 2025 को इजरायल ने अमेरिका की जानकारी में ईरान पर हमला किया। इस हमले में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए और परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचा। ईरान ने जवाब में तेल अवीव पर मिसाइलें दागीं। लगभग दो हफ्ते तक संघर्ष चलता रहा और अंत में अमेरिका ने ईरान की तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं पर बड़े बम गिराए। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई शासन और ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिसके बाद यहां कई बड़े आर्थिक प्रदर्शन देखने को मिले. यह प्रदर्शन धीरे-धीरे जनवरी महीने में व्यापक आंदोलन में बदल गए और इस दौरान हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की खबरें सामने आईं। ट्रंप ने खामेनेई को खुली चेतावनियां दीं और परमाणु समझौता करने का दबाव बनाया. खामेनेई शासन बातचीत की प्रक्रिया में था, तभी शनिवार, 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त ऑपरेशन किया, जिसमें खामेनेई समेत कई ईरानी नेताओं को निशाना बनाया गया. इसी हमले में आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई और इसके साथ ही एक लंबे दौर का अंत हो गया। इस प्रकार ईरान ने ही नहीं दुनिया ने एक बहादुर देश भक्त नेता खो दिया है। Ayatollah Ali Khamenei












