
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने हाल में दावा किया कि चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किया है। हालांकि, बीजिंग ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। चीन का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय संधियों और पारदर्शिता के सिद्धांतों का पालन करता है। लेकिन इस विवाद के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि चीन के पास आखिर कितने परमाणु हथियार हैं और वह कब बना ‘न्यूक्लियर पावर’? China Nuclear Power Journey
स्वीडन स्थित स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) और फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) की रिपोर्टों के अनुसार, चीन के पास सैकड़ों परमाणु वारहेड्स हैं जिनमें से कई तैनात हैं और कई भंडारण में रखे गए हैं। हाल के वर्षों में बीजिंग अपने परमाणु शस्त्रागार का तेजी से विस्तार कर रहा है। China Nuclear Power Journey
चीन की नीति ऐतिहासिक रूप से “No First Use” (NFU) यानी पहले हमला न करने की रही है। इसका अर्थ है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल केवल प्रतिघात (Retaliation) में करेगा। हालांकि, पिछले दशक में उसके मिसाइल साइलो नेटवर्क, मोबाइल लॉन्चर सिस्टम और समुद्री प्लेटफॉर्म्स में तेजी से वृद्धि हुई है जो संकेत देता है कि चीन अब ‘न्यूनतम प्रतिरोध’ से ‘विश्वसनीय प्रतिरोध’ की नीति की ओर बढ़ चुका है। China Nuclear Power Journey
चीन के पास भूमि, समुद्र और आकाश तीनों माध्यमों से परमाणु हमला करने की क्षमता है।
भूमि से लॉन्च होने वाली मिसाइलें: DF-5, DF-31A और नई पीढ़ी की DF-41 ICBM
समुद्र आधारित हथियार: Type-094 और Type-096 परमाणु पनडुब्बियां, जो JL-2 और JL-3 मिसाइलों से लैस हैं
हवाई क्षमता: H-6K और H-6N बॉम्बर जो लंबी दूरी तक क्रूज़ मिसाइल ले जाने में सक्षम हैं
नई मिसाइलें MIRV (Multiple Independently targetable Reentry Vehicle) तकनीक से लैस हैं, जो एक ही रॉकेट से कई वारहेड अलग-अलग लक्ष्यों पर दागने में सक्षम बनाती है। इससे चीन की प्रतिरोधक क्षमता गुणात्मक रूप से बढ़ गई है। China Nuclear Power Journey
1949 में जनवादी चीन गणराज्य की स्थापना के बाद से ही बीजिंग ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। कोरियाई युद्ध (1950-53) और अमेरिका-सोवियत शीत युद्ध ने चीन को सिखाया कि परमाणु क्षमता होना “जीवित रहने” की गारंटी है। शुरुआती दौर में सोवियत संघ ने चीन को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और टेक्नोलॉजी में मदद दी, लेकिन 1960 में दोनों देशों के मतभेद बढ़ने के बाद यह सहयोग खत्म हो गया। इसके बाद चीन ने “स्वदेशी मार्ग” अपनाया। 16 अक्टूबर 1964 को लोप नूर में चीन ने अपना पहला परमाणु परीक्षण (कोडनेम – 596) किया। इस सफलता ने उसे विश्व की पांचवीं परमाणु शक्ति बना दिया। सिर्फ तीन साल बाद, 17 जून 1967 को चीन ने हाइड्रोजन बम (H-बम) का परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया जो किसी भी देश के लिए अब तक की सबसे तेज़ प्रगति मानी जाती है।
देंग जियासिएन (Deng Jiaxian): पहले परमाणु बम के डिज़ाइन और परीक्षण के सूत्रधार
यू मिन (Yu Min): चीन के हाइड्रोजन बम के जनक
कियान सानकियांग (Qian Sanqiang): “चीन के रदरफोर्ड” कहे जाते हैं
छियान श्वेसन (Qian Xuesen): रॉकेट और मिसाइल प्रौद्योगिकी के संस्थापक
इन वैज्ञानिकों ने ‘मेड इन चाइना’ परमाणु कार्यक्रम को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया।
चाइनीज एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग फिज़िक्स (CAEP) और चीनी विज्ञान अकादमी (CAS) ने हथियार-डिज़ाइन और परीक्षण में केंद्रीय भूमिका निभाई। चीन की “सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी” यानी किसी पहले हमले के बाद भी जवाब देने की क्षमता, आज उसके रणनीतिक ढांचे का सबसे अहम हिस्सा है। इसके लिए उसने सॉलिड-फ्यूल मिसाइलें, मोबाइल लॉन्चर, और पनडुब्बी-आधारित प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं जो विरोधी की मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चुनौती देते हैं।
चीन ने 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर हस्ताक्षर किए थे, हालांकि संधि अब तक लागू नहीं हो पाई है। बीजिंग का दावा है कि वह अब कंप्यूटेशनल सिमुलेशन और सब-क्रिटिकल परीक्षणों के जरिए अपने शस्त्रागार की विश्वसनीयता जांचता है। अब तक किसी हालिया वास्तविक विस्फोटक परीक्षण की पुष्टि नहीं हुई है। China Nuclear Power Journey
ट्रंप का बयान अमेरिकी चुनावी राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। हालांकि यह सच है कि चीन का परमाणु विस्तार चिंताजनक गति से बढ़ रहा है, लेकिन किसी गुप्त परीक्षण के ठोस सबूत अब तक सामने नहीं आए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह आम राय बन रही है कि अमेरिका, रूस और चीन को आपसी संवाद बढ़ाना चाहिए, ताकि गलतफहमी और टकराव से बचा जा सके। China Nuclear Power Journey