इंटरनेट को लेकर एक बड़ा तथ्य सामने आया है। इंटरनेट के विषय में शोध करने वाले दुनिया के ज्यादातर शोधकर्ता यह मान रहे हैं कि वर्तमान में इंटरनेट के बिना जीवन चलाने की कल्पना मुश्किल है। दूसरी तरफ इंटरनेट को लेकर दुनिया की चिंता भी बढ़ती जा रही है।

Dead Internet Theory : इंटरनेट को लेकर एक बड़ा तथ्य सामने आया है। इंटरनेट के विषय में शोध करने वाले दुनिया के ज्यादातर शोधकर्ता यह मान रहे हैं कि वर्तमान में इंटरनेट के बिना जीवन चलाने की कल्पना मुश्किल है। दूसरी तरफ इंटरनेट को लेकर दुनिया की चिंता भी बढ़ती जा रही है। इंटरनेट को लेकर दोनों पक्षों को मुकुल श्रीवास्तव नामक लेखक ने अपने एक लेख में उजागर किया है। Dead Internet Theory
मुकुल श्रीवास्तव ने अपने लेख में लिखा है कि 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में जब इंटरनेट का विस्तार हुआ, तो इसे सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी ‘डिजिटल चौपाल’ कहा गया। यह ऐसा लोकतांत्रिक मंच था, जहां इन्सान अपनी अनुभूतियां, विचार, कला और मौलिक साहित्य को साझा कर सकता था। लेकिन, आज जेनरेटिव एआई और स्वचालित बोट्स के अनियंत्रित प्रसार ने इस चौपाल के मूल स्वरूप को बदलकर रख दिया है। समाजशास्त्रियों व तकनीकी विश्लेषकों के बीच आज जिस थ्योरी की सबसे गंभीर चर्चा है, वह है-‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ यानी ‘मृत इंटरनेट सिद्धांत’। इसकी अवधारणा पहली बार 2021 में ‘इल्यूमिनती पाइरेट’ नाम के अनाम विचारक ने पेश की थी। बाद में अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक में पत्रकार केटलिन टिफनी के लेख से इसे वैश्विक पहचान मिली। ‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ का मूल विचार यह है कि 2016-2017 के बाद से इंटरनेट अपनी जीवंतता खो चुका है। Dead Internet Theory
जेनरेटिव एआई के आगमन के बाद स्थिति यह हो गई है कि इंटरनेट अब ‘रोबोटिक कचरे का गोदाम’ बन चुका है, जहां अब बहुत कुछ पहले से तय होता है। दरअसल, एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक ‘औसत’ निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है। इस मशीनी कचरे के ढेर में किसी लेखक के मौलिक विचार, पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा, जब तक वह इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा। साइबर सुरक्षा फर्म इंप्रेवा द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6 फीसदी हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। इसमें से 32 प्रतिशत ट्रैफिक ‘बैड बोट्स’ का है, जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है। न्यूजगार्ड के हालिया अध्ययन के मुताबिक, इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों 'एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म' वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इन्सानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं, ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें। Dead Internet Theory
मुकुल श्रीवास्तव अपना लेख इस उम्मीद के साथ समाप्त करते हैं कि ‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ चेताती है कि इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इन्सान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा। इस विषय में हमें आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी Dead Internet Theory
विज्ञापन