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वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है। ऐसे में स्ट्रेट आफ होर्मुज की स्थिति केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अहम बनी हुई है।

Energy Crisis : वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है। ऐसे में स्ट्रेट आफ होर्मुज की स्थिति केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अहम बनी हुई है। हालांकि मार्ग के दोबारा खुलने की उम्मीदें राहत का संकेत जरूर देती हैं, लेकिन विशेषज्ञ साफ मान रहे हैं कि तेल और पीएनजी की कीमतों में तुरंत गिरावट की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। बाजार की स्थिति सामान्य होने में महीनों से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है।
Energy Crisis
ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि केवल मार्ग खुलने से ही बाजार तुरंत राहत नहीं देगा। इसकी मुख्य वजह यह है कि पिछले कई महीनों में सप्लाई चेन बुरी तरह बाधित हो चुकी है और वैश्विक बाजार ने अतिरिक्त जोखिम को पहले ही कीमतों में शामिल कर लिया है।
इसके अलावा निवेशकों का भरोसा भी कमजोर हुआ है, जिससे कीमतों में तेज गिरावट की संभावना सीमित हो जाती है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक स्थिर नहीं रह पाएंगी। भले ही आने वाले समय में सप्लाई धीरे-धीरे सामान्य हो जाए, लेकिन कीमतें पुराने स्तर पर लौटने में काफी समय लग सकता है।
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विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्रेट आॅफ होर्मुज में बाधा के कारण कई देशों के बड़ी संख्या में तेल टैंकर फंसे हुए हैं। अनुमान है कि करीब 160 से अधिक टैंकर इस रूट में फंसे हैं, जिनमें करोड़ों बैरल कच्चा तेल मौजूद है। इन टैंकरों को सुरक्षित रूप से बाहर निकालना और सप्लाई सिस्टम को फिर से सामान्य करना बेहद जटिल प्रक्रिया है। इस क्षेत्र में टैंकरों की आवाजाही बेहद धीमी हो जाती है। यहां तक कि खाली टैंकरों को अंदर भेजना, उन्हें लोड करना और फिर बाहर निकालना सामान्य समय से कई गुना अधिक समय लेता है। इस प्रक्रिया को पूरी क्षमता पर लौटने में कम से कम 2 से 3 महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है।
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