
Geopolitical Monitor की ताज़ा रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि परियोजना के पूर्ण होने के बाद चीन को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार जल प्रवाह को नियंत्रित करने की असाधारण क्षमता मिल जाएगी। यह केवल एक इंजीनियरिंग चमत्कार नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की दिशा में बीजिंग का सुनियोजित कदम है। चीन भले ही इस परियोजना को तिब्बत के विकास और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार का हिस्सा बताकर वैश्विक समुदाय को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह जल संसाधनों को एक 'भू-राजनीतिक हथियार' में बदलने की स्पष्ट रणनीति का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री ली क्यांग द्वारा इस परियोजना का औपचारिक उद्घाटन चीन की मंशा को और स्पष्ट करता है—बीजिंग अब जल पर नियंत्रण को सामरिक बढ़त के साधन के रूप में स्थापित करना चाहता है। अनुमान है कि यह बांध 70 गीगावाट बिजली उत्पन्न करेगा, जो थ्री गॉर्जेस जैसे विश्वविख्यात बांध से भी अधिक क्षमता रखता है। परियोजना की टाइमिंग भी कई सवाल खड़े करती है। इसका काम तब शुरू हुआ, जब दक्षिण एशिया पहले से ही क्षेत्रीय तनावों से जूझ रहा है। भारत-पाक सिंधु जल संधि के अस्थायी निलंबन के कुछ ही महीनों बाद यह ऐलान, बीजिंग की मंशा को और संदिग्ध बनाता है। China News
योजना के तहत यारलुंग जंग्बो नदी के प्रवाह को मोड़ने के लिए नामचा बरवा पर्वतमाला के नीचे लगभग 20 किलोमीटर लंबी सुरंगों की श्रृंखला बनाई जाएगी। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ इसे "मानव इतिहास की सबसे महत्वाकांक्षी पर्वतीय इंजीनियरिंग परियोजनाओं" में से एक बता रही है। लागत का अनुमान 1.2 ट्रिलियन युआन (करीब 167 अरब डॉलर) लगाया गया है। परियोजना को राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रमुख प्राथमिकताओं में शुमार किया गया है। लक्ष्य है—तिब्बत की जलविद्युत क्षमता का दोहन कर चीन के पूर्वी औद्योगिक इलाकों को ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना। China News
डोंगफैंग इलेक्ट्रिक, सियुआन इलेक्ट्रिक और पिंगगाओ ग्रुप जैसी बड़ी कंपनियां इस परियोजना में निवेश की इच्छुक हैं। अनुमान है कि यह परियोजना चीन की जीडीपी वृद्धि को 0.1 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। बीजिंग ने इसके लिए "चाइना याजियांग ग्रुप" नामक एक नया राज्य-नियंत्रित निगम भी गठित किया है। 2000 के बाद से तिब्बत में 193 जलविद्युत परियोजनाएं शुरू की जा चुकी हैं, जिनमें से अधिकांश विशाल हैं। यदि ये परियोजनाएं पूरी होती हैं तो 12 लाख से अधिक लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा और कई पवित्र स्थल नष्ट हो जाएंगे। तिब्बती समाज पहले ही अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के क्षरण से जूझ रहा है, और यह परियोजना उसकी अस्मिता पर एक और प्रहार मानी जा रही है।
यह बांध भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए गहरी चिंता का कारण है। यारलुंग जंग्बो के भारत में प्रवेश के बाद ब्रह्मपुत्र बन जाने से यह असम, अरुणाचल प्रदेश व पूर्वोत्तर के राज्यों में 13 करोड़ लोगों की कृषि, पेयजल और आजीविका का मुख्य स्रोत है। इसके अलावा, बांग्लादेश में यह नदी 55% सिंचाई जरूरतों को पूरा करती है और 2 लाख से अधिक मछुआरों की जीविका इससे जुड़ी हुई है। पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि हिमालय जैसे भूकंपीय क्षेत्र में ऐसे मेगा प्रोजेक्ट्स न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा हैं, बल्कि बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं का कारण भी बन सकते हैं। परियोजना के 2030 तक पूर्ण होने का लक्ष्य रखा गया है।
मेकांग नदी पर चीन द्वारा बनाए गए 11 बड़े बांधों का उदाहरण सामने है, जिनसे दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों—थाईलैंड, वियतनाम और कंबोडिया—में पिछले दो दशकों में सूखा और जल संकट गहराया है। चीन की 'बिजली पहले, पर्यावरण बाद' नीति अब विश्व भर में आलोचना का विषय है। China News