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Europe Heatwave: इस समय पश्चिमी यूरोप के करोड़ों लोग 35 से 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान झेल रहे हैं। फ्रांस, स्पेन और इटली में रेड अलर्ट जारी हैं। कई शहरों में स्कूल बंद किए गए हैं, अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ गए हैं>

El Niño Effect : दुनिया के जो देश हमेशा ठंड से कांपते थे वें देश भयंकर गर्मी की मार झेल रहे हैं। दुनिया के इन देशों में इतनी भयंकर गर्मी पड़ रही है कि यें देश तपता हुआ तवा बन गए हैं। दुनिया भर से आ रही रिपोर्ट बता रही हैं कि जिस यूरोप और उत्तरी अमेरिका को कभी बर्फ, ठंडी हवाओं और सुहाने मौसम के लिए जाना जाता था, आज वही क्षेत्र भीषण गर्मी की चपेट में हैं। फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। वैज्ञानिक इसे केवल सामान्य हीटवेव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change), अल-नीनो (El Niño) और वायुमंडलीय बदलावों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम बता रहे हैं।
क्यों तपने लगे दुनिया के सबसे ठंडे देश?
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार गर्मी के पीछे केवल एक कारण नहीं है। प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा शक्तिशाली अल-नीनो पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही लगातार बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी का औसत तापमान पहले ही बढ़ा चुकी हैं। ऐसे में जब अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटना सक्रिय होती है तो उसका असर और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। अल-नीनो वह स्थिति है जब प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे पूरी दुनिया के मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है। कई देशों में सूखा पड़ता है, कहीं बाढ़ आती है और कई क्षेत्रों में भीषण गर्मी पड़ती है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि 2026-27 का अल-नीनो इस सदी के सबसे शक्तिशाली अल-नीनो में शामिल हो सकता है।
यूरोप में टूट रहे गर्मी के रिकॉर्ड
इस समय पश्चिमी यूरोप के करोड़ों लोग 35 से 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान झेल रहे हैं। फ्रांस, स्पेन और इटली में रेड अलर्ट जारी हैं। कई शहरों में स्कूल बंद किए गए हैं, अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ गए हैं और सार्वजनिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी तीव्र गर्मी 50 वर्ष पहले लगभग असंभव थी। अमेरिका के कई राज्यों में भी लगातार हीटवेव दर्ज की जा रही है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार गर्म समुद्री सतह, बदलते वायुमंडलीय दबाव और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तरी अमेरिका में भी सामान्य से कहीं अधिक तापमान देखने को मिल रहा है। वैज्ञानिकों ने इस बार की भीषण गर्मी के पीछे 'ओमेगा ब्लॉक' नामक मौसमीय प्रणाली को भी जिम्मेदार बताया है। इस स्थिति में उच्च दबाव का क्षेत्र कई दिनों तक एक ही स्थान पर स्थिर रहता है, जिससे ठंडी हवाएं नहीं पहुंच पातीं और गर्म हवा लगातार फंसकर तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा देती है।
क्या भारत पर भी पड़ेगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत अल-नीनो भारत के मानसून को भी प्रभावित कर सकता है। इससे कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा, अधिक तापमान और कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि भारत में मानसून पर अन्य मौसमी प्रणालियां भी असर डालती हैं, इसलिए इसका प्रभाव हर क्षेत्र में समान नहीं होगा। विश्वभर के जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में ऐसी भीषण गर्मी और अधिक सामान्य हो सकती है। उनके अनुसार प्राकृतिक अल-नीनो जैसी घटनाएं पहले भी होती थीं, लेकिन अब मानवजनित जलवायु परिवर्तन उन्हें कहीं अधिक खतरनाक बना रहा है। दुनिया के सबसे ठंडे माने जाने वाले क्षेत्रों में रिकॉर्डतोड़ गर्मी केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का स्पष्ट संकेत है। अल-नीनो, ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडलीय बदलाव मिलकर पृथ्वी के मौसम का नया स्वरूप तैयार कर रहे हैं। यदि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यूरोप और अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया को और भी अधिक खतरनाक गर्मी, सूखा तथा चरम मौसमीय घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है।
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