अमेरिका तथा ईरान के बीच जोरदार युद्ध चल रहा है। एक महीने से चल रहे इस युद्ध का एक बड़ा नतीजा सामने आ गया है। युद्ध का बड़ा नतीजा यह है कि ईरान ने अमेरिका के द्वारा घोषित दादागिरी को तबाह कर दिया है।

Us Iran War : अमेरिका तथा ईरान के बीच जोरदार युद्ध चल रहा है। एक महीने से चल रहे इस युद्ध का एक बड़ा नतीजा सामने आ गया है। युद्ध का बड़ा नतीजा यह है कि ईरान ने अमेरिका के द्वारा घोषित दादागिरी को तबाह कर दिया है। पूरी दुनिया के ऊपर दादागिरी थोपने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध में हर मोर्चे पर फेल साबित हुए हैं। स्थिति यह हो गई है कि आज पूरी दुनिया अमेरिका के ऊपर हंसते हुए अमेरिका का मजाक बना रही है।
अमेरिका का यह प्रयास रहा है कि वह हमेशा सुपर पॉवर बना रहे। सुपर पॉवर बने रहने की होड़ में अमेरिका पूरी दुनिया के ऊपर अपनी दादागिरी थोपता रहा है। खाड़ी देश हों, पाकिस्तान हो या फिर ईराक अनेक देशों को अमेरिका ने अपना अघोषित गुलाम बना रखा है। अमेरिका की गुलामी करने वाले देश वही काम करते हैं जो अमेरिका चाहता है। इसी कड़ी में अमेरिका ईरान को भी अपना गुलाम बनाना चाहता था। ईरान ने अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब दिया है। पांच सप्ताह से चल रहे युद्ध के मोर्चे पर ईरान हर मामले में अमेरिका के ऊपर भारी पड़ा है। पूरी दुनिया देख रही है कि किस प्रकार अमेरिका ईरान के साथ समझौता करने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहा है। उधर ईरान ने घोषणा कर दी है कि अमेरिका के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका को सबक सिखाकर युद्ध में पूरी तरह घोषित तौर पर हराया जाएगा। ईरान अपनी घोषणा के हिसाब से लगातार अमेरिका के ऊपर भारी पड़ रहा है।
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध के मैदान में जब बंदूकें खामोश होने लगती हैं, तब झूठ के नगाड़े सबसे जोर से बजते हैं। आज फारस की खाड़ी के तपते पानी में जो कुछ घट रहा है, वह किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है, लेकिन इस पटकथा का अंत वैसा नहीं है जैसा वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में बैठकर लिखा गया था। युद्ध में कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है, इसे आंकने का पैमाना कभी भी मिसाइलों की संख्या या मलबे का ढेर नहीं होता। इसका सबसे सटीक पैमाना यह है कि शांति की भीख सबसे पहले किसने मांगी। आज जब हम अप्रैल 2026 की दहलीज पर खड़े हैं, तो दुनिया देख रही है कि जिस ईरान को प्रतिबंधों की बेडिय़ों में जकडक़र घुटनों पर लाने का दावा किया गया था, वह आज तनकर खड़ा है और दुनिया का स्वयंभू थानेदार अब एग्जिट गेट की तलाश में हाथ-पांव मार रहा है। इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुडक़र साल 2025 के उस ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को देखना होगा, जिसने उपमहाद्वीप के सैन्य इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। भारत ने जब अपनी सीमा पार कर आतंकवाद के फनों को कुचला, तो वह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक संदेश था। वह संदेश यह था कि शक्ति प्रदर्शन चीखने-चिल्लाने से नहीं, बल्कि सटीक प्रहार से होता है। पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम जब ताश के पत्तों की तरह ढह रहा था और भारतीय विमान आकाश में अपनी मर्जी से चित्रकारी कर रहे थे, तब रावलपिंडी के जनरलों ने पहली बार शांति का राग अलापा था। वह हार की तड़प थी जिसे जीत के पदकों के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश की गई। आसिम मुनीर का खुद को ‘फील्ड मार्शल’ घोषित कर देना वैसा ही था जैसे कोई डूबता हुआ आदमी खुद को समंदर का राजा कह दे। लेकिन गड्ढे झूठ नहीं बोलते। सैटेलाइट की तस्वीरों ने वह सच दुनिया के सामने रख दिया था जिसे पाकिस्तान की पीआर मशीनरी दबाना चाहती थी।ट्रंप दोहरा रहे हैं पाकिस्तान वाली गलती
मिडिल ईस्ट में अमेरिका की विफलता केवल सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक और नैतिक भी है। जिस रडार और एयर डिफेंस के भरोसे अमेरिका अपनी धौंस जमाता था, वे आज मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। अरब देश, जो कभी अमेरिका की छत्रछाया में खुद को सुरक्षित महसूस करते थे, अब नए समीकरणों की तलाश में हैं। सऊदी अरब का यूक्रेन के साथ डिफेंस डील करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि अब दुनिया को ट्रंप के कार्ड्स की असलियत समझ आ गई है। जब घर का मुखिया ही चोरों से अपनी रक्षा न कर पाए, तो परिवार के बाकी सदस्य नए रक्षक ढूंढने लगते हैं। आज वही स्थिति अमेरिका की है। सबसे दिलचस्प भूमिका पाकिस्तान की है, जो अपनी फटीहाली को कूटनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। वह देश जिसने खुद अपनी नाक कटवाई थी, आज अमेरिका और ईरान के बीच बिचौलिए की भूमिका में डॉलर बटोरने के सपने देख रहा है। लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस खेल का हिस्सा नहीं बनेगा। ईरान जानता है कि वक्त उसके साथ है। वह चुप है, शांत है और अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग है। उसकी यह खामोशी वॉशिंगटन की बेचैनी को और बढ़ा रही है। जब आपके पास खोने के लिए कुछ न बचा हो, तो आप सबसे खतरनाक योद्धा बन जाते हैं। ईरान आज उसी स्थिति में है।
कार्ल मार्क्स ने सच ही कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहले एक त्रासदी के रूप में और फिर एक मजाक के रूप में। ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के लिए त्रासदी थी, और आज फारस की खाड़ी में अमेरिका जो कर रहा है, वह एक वैश्विक मजाक बनकर रह गया है। ट्रंप अब एक सुरक्षित रास्ता ढूंढ रहे हैं जिससे वे अपनी साख बचा सकें, लेकिन ईरान उन्हें वह मौका देने के मूड में नहीं है। वह होर्मुज का पूरा टोल वसूलने के बाद ही चैन से बैठेगा। यह युद्ध मिसाइलों से नहीं, बल्कि सब्र और हौसले से जीता जा रहा है। और फिलहाल, जीत का सेहरा तेहरान के सिर बंधता दिख रहा है, जबकि वॉशिंगटन की चमकती वर्दी पर धूल और हार की कालिख साफ देखी जा सकती है। गड्ढे आज भी वहीं हैं, चाहे वो रावलपिंडी के एयरफील्ड पर हों या ट्रंप की विदेश नीति के सीने पर। सच तो यही है कि सुपरपावर का गुमान अब फारस की खाड़ी की लहरों में दफन हो चुका है। Us Iran War