12 दिन तमाशा देखते रहे ईरान के दोस्त पुतिन-जिनपिंग : सच्चे दोस्त या रणनीतिक अवसरवादी?
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 10:25 PM
Iran-Israel War : जब 13 जून को इजराइल ने ईरान पर हमला किया, तब पूरी दुनिया की निगाहें बीजिंग और मॉस्को की तरफ थी। दोनों देश वर्षों से खुद को ईरान का "रणनीतिक साझेदार" बताते आए हैं, लेकिन इस बार जब तेहरान पर हमला हुआ, तो इन दोनों महाशक्तियों की प्रतिक्रिया सिर्फ बयानों तक सिमटकर रह गई। चीन और रूस दोनों ने शब्दों में नाराजगी दिखाई, लेकिन किसी भी तरह की सैन्य, आर्थिक या कूटनीतिक ठोस मदद से परहेज किया।
कूटनीति की आड़ में दूर रहना
चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से इजराइल की कार्रवाई की कड़ी निंदा जरूर की गई, लेकिन ईरान को कोई सैन्य समर्थन नहीं दिया गया। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने समकक्ष व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बात की, सीजफायर की अपील की, और फिर खामोशी ओढ़ ली। न तो कोई सैन्य समर्थन, न ड्रोन, न मिसाइल, और न ही आपातकालीन आर्थिक सहायता कुछ भी नहीं। चीन ने एक रणनीतिक दूरी बनाए रखी। उसका रुख संतुलन साधने वाला रहा। एक ऐसा देश जो क्षेत्रीय स्थिरता की बात करता है, लेकिन संकट की घड़ी में साझेदार के साथ खड़ा होने की बजाय खुद को अलग रखता है।
तेल, व्यापार और रणनीतिक गणित
चीन की यह दूरी कोई आकस्मिक नीति नहीं, बल्कि गहरी सोच का नतीजा है। ईरान उसका सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है। ईरानी तेल का 80-90% हिस्सा चीन ही खरीदता है। ऐसे में बीजिंग किसी भी उस जोखिम से बचना चाहता है, जिससे उसकी ऊर्जा आपूर्ति या आर्थिक विकास प्रभावित हो। यही वजह है कि वह क्षेत्रीय अस्थिरता से घबराता है और युद्ध के बजाय व्यापार को प्राथमिकता देता है।
रूस की भूमिका भी चीन से अलग नहीं रही। पुतिन की सरकार ने भी एक परंपरागत कूटनीतिक बयान देकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर ली। जबकि वही पुतिन यूक्रेन में पश्चिम से सीधा लोहा ले रहे हैं, ईरान के मसले पर उनका रुख शांत और सीमित रहा।
बेल्ट एंड रोड, पर सैन्य सहयोग नहीं
ईरान चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का अहम हिस्सा है और शंघाई सहयोग संगठन का नया सदस्य भी। दोनों देशों ने हाल में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास भी किए हैं। बावजूद इसके, जब बात प्रत्यक्ष समर्थन की आई, तो चीन ने कूटनीति और वाणिज्य के कवच में खुद को ढक लिया। अमेरिकी विश्लेषकों का कहना है कि चीन जानबूझकर ऐसे मौके पर पीछे हटता है, ताकि वह न तो अमेरिकी प्रतिबंधों की चपेट में आए और न ही सऊदी अरब जैसे सहयोगियों को नाराज करे। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान अब चीन ईरान से तेल खरीदना जारी रख सकता है, इस रणनीति की पुष्टि करता है। Iran-Israel War
साझेदारी या दिखावा?
बीजिंग और मॉस्को का रवैया यह दिखाता है कि 'रणनीतिक साझेदारी' के दावे संकट के समय अक्सर खोखले साबित होते हैं। ईरान ने अपनी जमीन पर हमला झेला, लेकिन जिन साझेदारों पर वह भरोसा करता आया उन्होंने केवल 'शब्दों की सेना' भेजी। यह घटना उस वास्तविकता को उजागर करती है, जिसे ईरान समेत पूरी दुनिया को अब समझना होगा। वैश्विक राजनीति में दोस्ती नहीं, केवल हित स्थायी होते हैं। Iran-Israel War