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Keir Starmer Quits: कीर स्टार्मर के इस्तीफे के बाद ब्रिटेन को पिछले एक दशक में सातवां प्रधानमंत्री मिलेगा।

UK News : कीर स्टार्मर ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और लेबर पार्टी के नेता के पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले करीब एक दशक में वो छठें प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया है। ब्रिटिश राजनीति में उथल-पुथल खत्म करने के वादे के साथ भारी चुनावी जीत हासिल करने के दो साल से भी कम समय बाद, स्टार्मर ने कहा कि यह साफ़ था कि उनकी पार्टी चाहती थी कि वह हट जाएं।
10 डाउनिंग स्ट्रीट पर अपने फैसले के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा , "मेरी पार्टी अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या अगले आम चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए मैं सबसे सही व्यक्ति हूँ। मैंने इस सवाल पर अपनी संसदीय पार्टी का जवाब सुन लिया है और मैं उस जवाब को खुशी-खुशी स्वीकार करता हूं।"
स्टार्मर के इस्तीफे के बाद ब्रिटेन को पिछले एक दशक में सातवां प्रधानमंत्री मिलेगा।
स्टार्मर का जाना किसी के लिए हैरानी वाला नहीं है। उनके लिए हालात पहले ही मुश्किल थे। शुक्रवार को स्थिति और खराब हो गई जब उनके संभावित प्रतिद्वंद्वी एंडी बर्नहम ने संसद की एक सीट पर आसानी से जीत हासिल कर ली।
अखबार 'द ऑब्जर्वर' के मुताबिक, कई मंत्रियों, सलाहकारों और पार्टी नेताओं से बात करने के बाद स्टार्मर इस नतीजे पर पहुंचे कि अब वे पद पर नहीं रह सकते। लेबर पार्टी के 100 से ज्यादा सांसद सार्वजनिक रूप से कह चुके थे कि स्टार्मर को इस्तीफा दे देना चाहिए। यह संख्या हाउस ऑफ कॉमन्स में लेबर के कुल सांसदों का लगभग एक-चौथाई है।
स्टार्मर का जाना ब्रिटेन के राजनीतिक संकट का चैप्टर
कीर स्टार्मर का संकट ब्रिटेन की बड़ी समस्या का सिर्फ एक अध्याय है। पिछले 11 साल में 6 प्रधानमंत्री ब्रिटेन की राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियों और संस्थागत थकान का प्रतीक बन गए हैं। एक देश जो कभी दुनिया को स्थिरता सिखाता था, आज खुद अस्थिरता का शिकार नजर आ रहा है।
2015-16 बाद से 6 लोग पीएम की कुर्सी पर बैठे लेकिन स्थिरता देने में नाकाम रहे:
पिछले एक दशक से यूके के लोगों प्रधानमंत्रियों की आवाजाही के आदि हो गए हैं।
इस अस्थिरता का सबसे बड़ा कारण ब्रेक्जिट/Brexit (2016) रहा। यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला ब्रिटेन की राजनीति को हमेशा के लिए बदल गया। कैमरन ने रेफरेंडम कराया, लेकिन खुद इस्तीफा दे दिया। थेरेसा मे ब्रेक्सिट डील पास कराने में नाकाम रहीं। बोरिस जॉनसन ने इसे पूरा किया, लेकिन COVID-19 महामारी, पार्टी गेट घोटाले और आर्थिक दबाव में फंस गए। लिज ट्रस का 49 दिन का कार्यकाल तो बाजारों को हिला देने वाला रहा — अफंडेड टैक्स कट्स की वजह से पाउंड गिरा, ब्याज दरें बढ़ीं और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। ऋषि सुनक ने कुछ स्थिरता लाने की कोशिश की, लेकिन 2024 के चुनाव में लेबर की भारी जीत हुई। कीर स्टार्मर ने वादा किया था कि वे “स्थिरता और बदलाव” लाएंगे, लेकिन घोटालों, पॉलिसी यूटर्न, पेंशनर्स की मदद कटौती, NHS संकट और जीवन स्तर में सुधार न होने से उनकी सरकार भी जल्दी ही संकट में फंस गई।
इस बार-बार बदलाव का असर क्या पड़ा है?
आर्थिक नुकसान : लगातार नई सरकार और नई नीतियां लंबी अवधि की योजना बनाना मुश्किल कर देती हैं। निवेशक अनिश्चितता से दूर भागते हैं। ब्रेक्जिट/Brexit के बाद व्यापार बाधाएं बढ़ीं, उत्पादकता वृद्धि धीमी हुई और जीडीपी प्रभावित हुई।
संस्थागत कमजोरी : लगातार सरकार बदलने से सिविल सर्विस और नीति-निर्माण की निरंतरता टूटती है। नई सरकार पुरानी नीतियों को उलट देती है, जिससे सुधार रुक जाते हैं।
जनता का विश्वास टूटना : महंगाई, आवास संकट, एनएसएस की वेटिंग लिस्ट, अवैध प्रवासन और बेरोजगारी से लोग परेशान हैं। हर 1.5-2 साल में नेता बदलने से लगता है कि कोई भी उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहा।
वैश्विक छवि: “Global Britain” की छवि कमजोर हुई है। वैश्विक संकटों में ब्रिटेन का रुख स्पष्ट और स्थिर नहीं दिखता।
अगर ब्रिटेन को फिर से मजबूत और समृद्ध बनाना है, तो सिर्फ नेता बदलने से काम नहीं चलेगा। पूरे राजनीतिक सिस्टम, नीति-निर्माण की संस्कृति और जनता के बीच विश्वास को मजबूत करने की जरूरत है। वरना प्रधानमंत्रियों का यह आने-जाने का सिलसिला जारी रहेगा और ब्रिटेन का पतन भी।
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