बीजिंग ने अमेरिका का साथ देकर द रेजिडेंट फ्रंट को बताया आतंकी संगठन, क्या भारत को साध रहा है चीन?
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 05:24 AM
New Delhi/Beijing : एक ओर चीन संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे कुख्यात आतंकी संगठनों को बचाने के लिए वीटो का इस्तेमाल करता रहा है, वहीं दूसरी ओर अब उसने द रेजिडेंट फ्रंट (TRF) के खिलाफ खुलकर बयान देकर सबको चौंका दिया है। वह भी तब, जब टीआरएफ लश्कर की ही एक छाया इकाई मानी जाती है। इस पटल पर उभरा बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन अब आतंकवाद को लेकर दोहरा रवैया छोड़ने की कोशिश कर रहा है, या फिर यह रणनीतिक समीकरणों का हिस्सा है?
पहलगाम हमले के बाद अमेरिका की कार्रवाई, चीन की अप्रत्याशित सहमति
22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में निर्दोष पर्यटकों को निशाना बनाए जाने के बाद टीआरएफ ने हमले की जिम्मेदारी ली। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने टीआरएफ को आतंकी संगठन घोषित किया। लेकिन बात तब और दिलचस्प हो गई जब चीन ने अमेरिका के इस कदम का समर्थन किया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लीन जियान ने बीजिंग में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि "हम आतंकवाद के सभी रूपों का विरोध करते हैं। पहलगाम में हुए हमले की हम निंदा करते हैं और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए पड़ोसी देशों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहते हैं।"
TRF के विरोध में चीन की रणनीति: कारण क्या हैं?
चीन द्वारा TRF के विरोध में मुखर रुख अपनाने के पीछे कई रणनीतिक कारण नजर आते हैं। पहलगाम हमला और वैश्विक प्रतिक्रिया और पहलगाम में जिस प्रकार से पर्यटकों को निशाना बनाया गया, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न केवल टीआरएफ की निंदा करवाई, बल्कि इसके पीछे मौजूद संरचनाओं पर भी सवाल उठे। चीन के लिए यह हमदर्दी दिखाने का समय नहीं था। वरना वैश्विक मंचों पर उसकी छवि और खराब हो सकती थी।
भारत के साथ संबंधों में नरमी की कोशिश
गलवान संघर्ष के बाद से भारत-चीन संबंधों में लगातार तनाव बना हुआ है। ऐसे में चीन अमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापारिक दबाव को संतुलित करने के लिए भारत को साथ लाना चाहता है। टीआरएफ के विरोध में बयान देकर बीजिंग भारत को यह संकेत देना चाहता है कि वह आतंकवाद के मसले पर सहयोग को तैयार है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की राजनीति के तहत भारत, रूस और चीन तीनों इस वक्त वैश्विक बहुध्रुवीय व्यवस्था के समर्थक हैं। ऐसे में चीन की कोशिश है कि वह भारत को अपने विरोधी खेमे में जाने से रोके। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में कहा था कि हम भारत और चीन के बीच सामंजस्य बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
टीआरएफ क्या है और क्यों है खतरनाक?
साल 2019 में लश्कर-ए-तैयबा और इंडियन मुजाहिदीन के कट्टरपंथियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से 'द रेजिडेंट फ्रंट' की स्थापना की। इसका मकसद जम्मू-कश्मीर में आतंक की नई रणनीति के साथ दस्तक देना था। जिसमें सीधे लश्कर या जैश का नाम सामने न आए, पर हमला वैसा ही घातक हो। संगठन का कोई औपचारिक मुखिया नहीं, लेकिन इसका संचालन सज्जाद गुल नामक आतंकी ने शुरू किया था। सूत्रों के अनुसार, हाफिज सईद और लश्कर के अधिकारियों की इसमें सीधी भूमिका है। इसका उद्देश्य है कश्मीर में 'स्थानीय प्रतिरोध' का भ्रम पैदा कर बाहरी आतंक को स्वदेशी आंदोलन की तरह प्रस्तुत करना।
भारत के लिए संकेत : चीन का रुख क्या बदलेगा?
हालिया घटनाक्रम चीन की ओर से एक संकेत है कि वह अब आतंकवाद के मसले पर कम से कम लोकतांत्रिक दिखावे की जरूरत को समझने लगा है। परंतु भारत के लिए यह भी समझना जरूरी है कि टीआरएफ पर बयान देना, जैश और लश्कर पर चीन की नीति बदलने का प्रमाण नहीं है। अभी भी संयुक्त राष्ट्र में भारत की कोशिशों के बावजूद चीन ने कई बार आतंकी मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने की प्रक्रिया में बाधा डाली है। ऐसे में टीआरएफ पर विरोध को रणनीतिक लचीलापन कहा जाए, न कि नीति परिवर्तन। चीन का टीआरएफ विरोध एक सीमित रणनीतिक कदम है, न कि आतंकवाद पर स्थायी नीति बदलाव। भारत को यह ध्यान में रखते हुए चीन की हर चाल का मूल्यांकन करना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध एक मजबूत नैरेटिव बनाते रहना चाहिए, जिसमें चीन को भी जवाबदेह बनाया जाए।