अब नहीं बचेगी निमिषा प्रिया! ग्रांड मुफ्ती भी बेबस, तलाल के परिवार ने खून के बदले माफी से किया इनकार
Nimisha Priya
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 08:33 AM
भारत की रहने वाली निमिषा प्रिया, जो यमन में नर्स के रूप में कार्यरत थीं, 2020 में यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की हत्या के मामले में दोषी पाई गई थीं। अदालत ने उन्हें सजा-ए-मौत सुनाई थी। हालांकि, यमन के कानून में 'ब्लड मनी' यानी खून के बदले माफी का प्रावधान है, जिससे किसी की जान बच सकती है, बशर्ते पीड़ित परिवार राजी हो। लेकिन अब तलाल के परिवार ने साफ कर दिया है कि ना माफी मिलेगी, ना सौदा होगा! तलाल के भाई अब्दुल फतह महदी ने यमन के अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कहा है कि उनके परिवार ने ब्लड मनी (दिया) लेने से साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जानबूझकर सजा में देरी की जा रही है, जो "न्याय के खिलाफ" है। उन्होंने कहा कि निमिषा ने हत्या के बाद जो किया, वह "मानवता से परे था", और उसे माफ नहीं किया जा सकता। Nimisha Priya
ग्रांड मुफ्ती भी लाचार!
ग्रांड मुफ्ती अबूबकर, जिन्होंने पहले निमिषा की फांसी पर रोक लगवाई थी और एक समझौते की कोशिश कर रहे थे, अब इस स्थिति में असहाय नजर आ रहे हैं। तलाल का परिवार साफ कर चुका है कि वे किसी तरह की सुलह या मुआवजे के लिए तैयार नहीं हैं।
अबूबकर की साख पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि वो ब्लड मनी के जरिए इस केस को रुकवाने में नाकाम रहे। यमन के कानून के मुताबिक, सजा से बचने का एकमात्र रास्ता ब्लड मनी पर सहमति था, जो अब बंद हो चुका है। ऐसे में, यमन सरकार के पास अब कोई कानूनी बाध्यता नहीं बचती, और वह कभी भी सजा-ए-मौत लागू कर सकती है। पहले 16 जुलाई की तारीख तय थी, लेकिन नई तारीख की घोषणा जल्द हो सकती है।
पीड़ित परिवार का दो टूक संदेश
"मेरे भाई का खून कोई बाजारू चीज नहीं जिसे खरीदा जा सके। वो बिकने वाला नहीं है।" तलाल के भाई के ये शब्द साफ इशारा करते हैं कि निमिषा को माफी की कोई उम्मीद अब नहीं बची। यह एक भावनात्मक नहीं, बल्कि 'न्यायिक युद्ध' बन चुका है, जिसमें अब अंतिम अध्याय जल्द ही लिखा जा सकता है। निमिषा प्रिया के सामने अब कोई कानूनी रास्ता शेष नहीं है। यमन की सरकार जल्द ही अंतिम फैसले पर अमल कर सकती है। भारत सरकार और सामाजिक कार्यकर्ता अगर कुछ करना चाहते हैं, तो यह अंतिम समय है।
यह मामला न सिर्फ न्याय और कानून की पेचीदगियों का प्रतीक बन गया है, बल्कि यह भी दिखाता है कि विदेशों में भारतीय नागरिकों को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।