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स्वीडन में राजा को राष्ट्राध्यक्ष माना जाता है। फिलहाल यहां के राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताफ हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वही सरकार चलाते हैं। देश की असली प्रशासनिक ताकत प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के पास होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों विदेश दौरे पर हैं और उनकी यात्रा का अगला पड़ाव स्वीडन है। स्वीडन का नाम आते ही लोगों के मन में एक साफ-सुथरे, खुशहाल और आधुनिक देश की तस्वीर बनती है लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी उठता है कि आखिर स्वीडन में देश चलाता कौन है? वहां राजा की चलती है या प्रधानमंत्री की? क्योंकि स्वीडन उन देशों में शामिल है जहां राजशाही भी है और लोकतंत्र भी। स्वीडन का सिस्टम दुनिया के कई देशों से थोड़ा अलग जरूर है लेकिन समझने में आसान है। यहां राजा भी हैं, संसद भी है और जनता द्वारा चुनी गई सरकार भी। खास बात यह है कि इन तीनों की जिम्मेदारियां पहले से तय हैं और कोई भी दूसरे के काम में दखल नहीं देता।
स्वीडन में राजा को राष्ट्राध्यक्ष माना जाता है। फिलहाल यहां के राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताफ हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वही सरकार चलाते हैं। देश की असली प्रशासनिक ताकत प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के पास होती है। वर्तमान में उल्फ क्रिस्टर्सन स्वीडन के प्रधानमंत्री हैं और वही सरकार की कमान संभालते हैं।
स्वीडन में जनता सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लोग चुनाव के जरिए संसद चुनते हैं और संसद के आधार पर सरकार बनती है। वहां की संसद को रिक्सडाग कहा जाता है जिसमें 349 सदस्य होते हैं। यही संसद कानून बनाती है, सरकार से सवाल पूछती है और जरूरत पड़ने पर सरकार को हटा भी सकती है। इस व्यवस्था को भारत से जोड़कर समझना आसान है। जैसे भारत में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख होते हैं और प्रधानमंत्री सरकार चलाते हैं, ठीक वैसे ही स्वीडन में राजा की भूमिका औपचारिक है और असली कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री के पास होती है।
स्वीडन के राजा राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं। वे किसी पार्टी का समर्थन नहीं करते और न ही सरकारी फैसलों में दखल देते हैं। उनका काम देश का प्रतिनिधित्व करना होता है। बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल होना, विदेशी मेहमानों का स्वागत करना और विदेश यात्राओं में स्वीडन की छवि पेश करना उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। राजा कानून नहीं बना सकते, संसद को आदेश नहीं दे सकते और सरकार के फैसले भी नहीं बदल सकते। यही वजह है कि स्वीडन की राजशाही को “संवैधानिक राजशाही” कहा जाता है।
स्वीडन में सरकार का पूरा काम प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, रोजगार, विदेश नीति और आर्थिक फैसले सरकार ही लेती है। प्रधानमंत्री अपनी कैबिनेट बनाते हैं और अलग-अलग मंत्रालयों की जिम्मेदारी मंत्रियों को दी जाती है। अगर देश में कोई संकट आता है या कोई बड़ा फैसला लेना होता है तो जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की होती है। संसद में बहुमत बनाए रखना भी सरकार के लिए जरूरी होता है।
स्वीडन की संसद लोकतंत्र की सबसे अहम कड़ी है। कोई भी कानून संसद की मंजूरी के बिना लागू नहीं हो सकता। सरकार को बजट भी संसद में पेश करना पड़ता है। अगर संसद चाहे तो सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है।
स्वीडन में राजा और सरकार की जिम्मेदारियां साफ-साफ तय हैं। राजा सम्मान और परंपरा का प्रतीक हैं जबकि सरकार प्रशासन चलाती है। इसी वजह से दोनों के बीच टकराव की स्थिति नहीं बनती। राजा देश की एकता और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि सरकार जनता के लिए फैसले लेती है। यही संतुलन स्वीडन की व्यवस्था को खास बनाता है।
जब सरकार किसी नए कानून की जरूरत महसूस करती है तो वह संसद में प्रस्ताव लाती है। इसके बाद उस पर चर्चा होती है। कई बार समितियां भी जांच करती हैं। फिर संसद में वोटिंग होती है। बहुमत मिलने के बाद ही कानून लागू होता है। इस पूरी प्रक्रिया में राजा की कोई भूमिका नहीं होती।
इस सवाल का जवाब साफ है नहीं। स्वीडन में राजा भी संविधान और कानून के दायरे में रहते हैं। वहां असली शक्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं के पास है। संविधान, संसद और जनता सबसे ऊपर माने जाते हैं।
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