
Israel Iran War : इजरायल और अमेरिका से हुए सैन्य संघर्ष में भारी नुकसान उठाने के बावजूद ईरान ने अपनी ओर से इस टकराव को 'रणनीतिक जीत' के तौर पर पेश किया है। कुछ वैसा ही रवैया हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद अपनाया था, जहां हार के बाद भी जश्न का माहौल बनाया गया। दोनों ही देशों ने सैन्य असफलताओं को जनता के सामने जीत में बदलने का प्रयास किया—शासन की छवि बचाने के लिए।
ईरान ने इजरायल पर किए गए मिसाइल हमलों को 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3' का नाम देकर उसे एक सुनियोजित सैन्य सफलता की तरह प्रस्तुत किया, वहीं पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपनी जवाबी कार्रवाई को 'ऑपरेशन बुनियान-अल-मरसूस' बताते हुए उसे राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा। इन अभियानों के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया जश्न और जनउत्साह असल में सत्ता द्वारा रचा गया एक सुनियोजित नैरेटिव है—जिसका उद्देश्य जनता का ध्यान असल नुकसान से भटकाना और शासन को 'अविजेय' साबित करना है।
तेहरान के इंकलाब चौक पर उमड़ी भीड़ में बुर्कानशीं महिलाएं, पगड़ीधारी पुरुष और अधेड़ उम्र के नागरिक इकट्ठा हुए—कुछ ईरानी झंडा लहराते दिखे तो कुछ लोग सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की तस्वीरें लेकर नारे लगाते नजर आए। इस जनसमूह ने इजरायल और अमेरिका के खिलाफ आक्रोश जताते हुए एक स्वर में "नाश हो दुश्मन" के नारे लगाए। पाकिस्तान ने भी इसी तरह का 'धन्यवाद दिवस' तब मनाया था जब 10 मई को भारत-पाक संघर्ष विराम हुआ था। भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत आतंकवादी ठिकानों और 10 से अधिक पाक एयरबेस पर हमला कर उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया था। पाकिस्तान ने अमेरिकी मध्यस्थता से हुए सीजफायर को अपनी कूटनीतिक जीत बताकर महिमामंडित कर दिया।
इजरायल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई ने ईरान की रक्षा संरचना की जड़ों को झकझोर कर रख दिया। अमेरिका के अत्याधुनिक B-2 बमवर्षकों की सटीक बमबारी ने नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे परमाणु ठिकानों को लक्ष्य बनाकर उन्हें लगभग निष्क्रिय कर दिया। ये हमले सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि ईरान की परमाणु क्षमता पर सीधा हमला थे, जिसने उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को गंभीर झटका दिया है। इन हमलों ने न सिर्फ ईरान की वर्षों से चली आ रही परमाणु परियोजना को झकझोर दिया, बल्कि उसकी रक्षा प्रणाली की कमजोरी भी उजागर कर दी। इस कार्रवाई को तेहरान के लिए अब तक की सबसे बड़ी सैन्य और तकनीकी हारों में से एक माना जा रहा है।
इस हमले में ईरानी सैन्य नेतृत्व को गंभीर क्षति पहुंची और रिपोर्ट्स के मुताबिक 650 से अधिक लोगों की मौत हुई, हालांकि मानवाधिकार संगठनों का आंकड़ा 1000 तक पहुंचता है। बावजूद इसके, ईरानी सरकार ने इस पूरे प्रकरण को 'विजय' के तौर पर प्रचारित किया। हिज़्बुल्लाह और हौती जैसे ईरानी समर्थित संगठनों ने इस संघर्ष को इजरायल की पराजय बताकर अपने-अपने क्षेत्रों में जीत के पोस्टर और नारे लगाए।
ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिका द्वारा किए गए हमले के बाद अमेरिकी मीडिया में सवाल उठने लगे। CNN और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी प्रतिष्ठित एजेंसियों ने पेंटागन की कथित खुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि यूरेनियम समृद्धिकरण की तकनीक और सेंट्रीफ्यूज सुरक्षित रहे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ईरान हमले से पहले ही संवेदनशील सामग्रियों को स्थानांतरित कर चुका था।
व्हाइट हाउस और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेंटागन से लीक हुई खुफिया रिपोर्टों को सिरे से नकारते हुए उन्हें 'भ्रामक और बेबुनियाद' बताया, लेकिन इनकार के बावजूद अमेरिकी हमले की सफलता को लेकर संदेह बना रहा। इसी बीच ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों को 'राजनीतिक उत्पीड़न' की संज्ञा देते हुए न्यायपालिका की मंशा पर भी सवाल खड़े कर दिए। ट्रंप ने नेतन्याहू को 'संकटकाल में डटे एक वीर नेता' बताते हुए न केवल उनके पक्ष में माफी की मांग की, बल्कि इन मुकदमों को इजरायल की न्याय व्यवस्था की 'विश्वसनीयता पर संकट' बताया। Israel Iran War