
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाज़ी को समझना आसान नहीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अंदाज हमेशा से ही चौंकाने वाला रहा है। कभी वे भारत पर टैरिफ का हथौड़ा चलाकर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, तो कभी रूस से तेल आयात को लेकर सख़्त चेतावनी देते हैं। लेकिन इन्हीं बयानों के बीच अचानक उनका रुख बदलता है और वही ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “महान नेता” कहकर दोस्ती की दुहाई देने लगते हैं। उनके इस यू-टर्न ने एक बार फिर साबित कर दिया कि ट्रंप केवल शब्दों से खेल नहीं रहे, बल्कि हर बयान के पीछे उनकी खास राजनीतिक रणनीति और व्यक्तिगत शैली छिपी है। सवाल यही है कि भारत को लेकर ट्रंप के इस बदले हुए तेवर के पीछे असली वजह क्या है? Donald Trump
27 अगस्त को ट्रंप प्रशासन ने भारत पर सीधे-सीधे 50% टैरिफ का भारी बोझ डाल दिया। इसमें 25% अतिरिक्त पेनल्टी सिर्फ इसलिए लगाई गई क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखे हुए था। ट्रंप का आरोप था कि इस खरीद से रूस को युद्ध में सहारा मिल रहा है। लेकिन ट्रंप की यह सख़्ती भी भारत को झुका नहीं पाई। नई दिल्ली ने दो टूक जवाब दिया तेल खरीदना राष्ट्रीय हित है और यही कदम वैश्विक बाज़ार में कीमतों को संतुलित रखने में मदद करता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के फैसले वॉशिंगटन की मर्ज़ी से नहीं, बल्कि अपने हितों को ध्यान में रखकर करेगा। इस तरह ट्रंप का दबाव डालने का दांव उलटा पड़ गया और भारत पहले से भी अधिक मजबूत होकर खड़ा नजर आया। Donald Trump
31 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के तियानजिन में हुए SCO शिखर सम्मेलन में पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई। इस मंच पर भारत की सक्रिय उपस्थिति ने दुनिया को यह साफ संदेश दिया कि नई दिल्ली वैश्विक शक्ति समीकरण का अहम स्तंभ है। यही सक्रियता ट्रंप की चिंता बढ़ाने वाली साबित हुई। दरअसल, जब भारत रूस और चीन जैसे देशों के साथ बहुपक्षीय मंचों पर मजबूती से खड़ा होता है, तो ट्रंप का दबाव बनाने का पूरा खेल कमजोर पड़ जाता है। यही वजह है कि सख़्त बयान देने के कुछ ही समय बाद ट्रंप ने सुर बदलकर मोदी को “महान नेता” कहकर संबोधित करना पड़ा।
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से व्यापार समझौते (BTA) को लेकर खींचतान चल रही है। ट्रंप प्रशासन बार-बार यह दबाव डालता रहा कि भारत अपने बाजार को अमेरिकी फार्मिंग और डेयरी उत्पादों के लिए खोले और टैरिफ घटाए। लेकिन ट्रंप की यह जिद भी भारत को झुका नहीं सकी। नई दिल्ली ने साफ कर दिया कि घरेलू किसानों के हित किसी भी विदेशी दबाव से बड़े हैं। इस सख़्त रुख ने ट्रंप की रणनीति को झटका दिया और यह संदेश दिया कि भारत अब अमेरिकी दबाव की राजनीति में फंसने वाला नहीं है। Donald Trump
8 सितंबर को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ब्रिक्स की वर्चुअल बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे, जहां अमेरिकी टैरिफ के असर और उससे निपटने की रणनीतियों पर चर्चा होगी। ब्राजील पर भी ट्रंप प्रशासन ने 50% टैरिफ थोप रखा है और वह इस वक्त ब्रिक्स का अध्यक्ष है। ऐसे में भारत, चीन, रूस और अन्य देशों का साझा मंच अमेरिका खासकर डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक नई चुनौती बनकर उभर सकता है। ट्रंप भले ही मोदी को “महान नेता” कहकर रिश्तों को सहज करने की कोशिश करें, लेकिन हकीकत यह है कि ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता उनके दबाव की राजनीति को कमजोर करती जा रही है।
डोनाल्ड ट्रंप की टीम ने भी भारत पर हमले तेज़ किए हैं। उनके करीबी सलाहकार पीटर नवारो ने तो यहां तक कह डाला कि रूस-यूक्रेन युद्ध असल में “मोदी का युद्ध” है और भारत “क्रेमलिन के लिए मनी लॉन्ड्रिंग मशीन” बन चुका है। ट्रंप खेमे की इस कठोर और विवादित भाषा ने अमेरिका में रह रहे हिंदू समुदाय को गहराई से आहत किया और नाराज़गी का तूफ़ान खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं, अमेरिका के पूर्व NSA जेक सुलिवन ने भी ट्रंप की इस नीति को घातक करार देते हुए कहा कि भारत से टकराव दरअसल अमेरिका के लिए ही रणनीतिक नुकसान है, क्योंकि वॉशिंगटन के दीर्घकालिक हित मजबूत भारत-अमेरिका साझेदारी से ही सुरक्षित हो सकते हैं। यानी, ट्रंप की आक्रामक शैली अब उनके अपने देश के भीतर भी सवालों के घेरे में है। Donald Trump