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सवाल सीधा है कफाला सिस्टम आखिर है क्या, यह किन नियमों पर चलता है, प्रवासी श्रमिकों के लिए इसके मायने क्या हैं और हालिया बदलावों के बाद आज इसकी तस्वीर कितनी बदली है? आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।

Saudi Arabia : सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को चलाने वाली बड़ी श्रम-शक्ति में लाखों प्रवासी कामगार शामिल हैं। खासतौर पर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और फिलीपींस जैसे देशों से पहुंचे लोग इसमें मुख्य रूप से शामिल है। इन कामगारों की नौकरी, रेजिडेंसी और रोज़मर्रा की कई औपचारिक प्रक्रियाओं पर कफाला सिस्टम (Kafala System) का असर लंबे समय तक निर्णायक रहा है। यही वजह है कि यह व्यवस्था वर्षों से बहस, आलोचना और सुधारों के केंद्र में बनी हुई है। सवाल सीधा है कफाला सिस्टम आखिर है क्या, यह किन नियमों पर चलता है, प्रवासी श्रमिकों के लिए इसके मायने क्या हैं और हालिया बदलावों के बाद आज इसकी तस्वीर कितनी बदली है? आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।
अरबी शब्द कफाला का अर्थ होता है जिम्मेदारी या प्रायोजन। सऊदी अरब में यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी विदेशी कर्मचारी को देश में काम करने और रहने के लिए किसी स्थानीय नागरिक या कंपनी (जिसे कफील कहा जाता है) का प्रायोजन जरूरी होता है। यानी प्रवासी कर्मचारी का वीज़ा, नौकरी और कई कानूनी प्रक्रियाएं उसी कफील से जुड़ी होती हैं। सरल शब्दों में कहें तो कफाला सिस्टम के तहत कर्मचारी पूरी तरह अपने नियोक्ता पर निर्भर रहता है।
सऊदी अरब में जब कोई विदेशी नागरिक नौकरी के लिए जाता है, तो उसकी एंट्री सिर्फ “जॉब” से नहीं एक स्पॉन्सरशिप सिस्टम से होती है। आमतौर पर कोई सऊदी कंपनी/नियोक्ता उसे स्पॉन्सर करता है, वही वर्क वीजा और इकामा (रेजिडेंसी परमिट) की प्रक्रिया पूरी कराता है। इसके बाद नौकरी बदलने, देश छोड़ने या कई मामलों में दस्तावेज़ी नियंत्रण जैसे फैसलों पर भी नियोक्ता का असर दिखता है। कागज़ों पर यह व्यवस्था प्रवासी श्रमिकों की निगरानी और कानूनी जवाबदेही तय करने के लिए बनी थी, लेकिन वक्त के साथ यही सिस्टम अधिकारों, निर्भरता और शोषण जैसे मुद्दों को लेकर बार-बार सवालों के घेरे में आता रहा है
कफाला सिस्टम पर सबसे तीखी आपत्ति यही रही है कि इसमें पावर का संतुलन पूरी तरह नियोक्ता के पक्ष में झुक जाता है। कई मामलों में कर्मचारी की नौकरी, दस्तावेज़ और आवाजाही सब कुछ एक तरह से मर्जी की मोहर पर टिक जाता है। नतीजा यह हुआ कि बिना अनुमति जॉब बदलने पर रोक, वेतन रोकने या देर से देने की शिकायतें, पासपोर्ट जब्त कर लेना, लंबे काम के घंटे और असुरक्षित/खराब कार्यस्थितियां जैसी समस्याएं बार-बार सामने आईं। ऊपर से देश छोड़ने के लिए एग्जिट परमिट जैसी शर्त ने कई प्रवासी श्रमिकों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठनों ने इस व्यवस्था को कई बार आधुनिक समय की बंधुआ मजदूरी जैसी संरचना बताकर कड़ी आलोचना की है।
आलोचनाओं और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सऊदी अरब ने पिछले कुछ सालों में कफाला सिस्टम की जकड़न ढीली करने की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं। Vision 2030 के एजेंडे के तहत श्रम सुधारों को तेज किया गया, ताकि प्रवासी कर्मचारियों की निर्भरता कम हो और अधिकारों की सुरक्षा बढ़े। इन बदलावों में कई श्रेणियों के कर्मचारियों को नौकरी बदलने की अनुमति, नियोक्ता की मंजूरी के बिना एग्ज़िट-रीएंट्री जैसी सुविधा, डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कॉन्ट्रैक्ट सत्यापन और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया, और वेज प्रोटेक्शन सिस्टम (WPS) को मजबूत करना शामिल है। सरकार का दावा है कि इन सुधारों का मकसद श्रमिकों को ज्यादा आज़ादी, पारदर्शिता और कानूनी सुरक्षा देना और कार्यस्थलों पर जवाबदेही तय करना है।
हालांकि सुधार हुए हैं, लेकिन कफाला सिस्टम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अब भी घरेलू कामगारों और कुछ श्रमिक वर्गों पर इसके नियम सख्ती से लागू होते हैं। यानी यह कहना गलत होगा कि कफाला सिस्टम समाप्त हो चुका है, बल्कि यह धीरे-धीरे सीमित और नियंत्रित किया जा रहा है।
सऊदी अरब में काम करने वाले भारतीयों की संख्या काफी अधिक है। कफाला सिस्टम के चलते कई भारतीय कामगारों को पहले कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन नए नियमों से अब स्थिति पहले से बेहतर हुई है। फिर भी, नौकरी से पहले कॉन्ट्रैक्ट पढ़ना, सही एजेंसी चुनना और कानूनी जानकारी रखना बेहद जरूरी है। Saudi Arabia
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