रॉयल कोर्ट की ओर से जारी बयान में कहा गया कि यह नमाज हजरत मोहम्मद की सुन्नत के मुताबिक अदा की जाएगी, जिसमें अल्लाह से रहमत, माफी और बारिश की दुआ की जाती है। साथ ही नागरिकों से अपील की गई है कि वे तौबा (पश्चाताप) करें, इस्तिगफार (माफी मांगें), नेक काम करें और अल्लाह की रहमत की ओर लौटें।

दिल्ली में जहां इस साल प्रदूषण पर काबू पाने और हवा में नमी बढ़ाने के लिए क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) का सहारा लिया गया, वहीं सऊदी अरब ने बारिश की उम्मीद में आस्था की राह अपनाई है। किंग सलमान बिन अब्दुलअजीज ने देशभर में ‘सलातुल इस्तिस्का’ यानी बारिश की दुआ वाली विशेष नमाज अदा करने का आदेश दिया है। यह नमाज पूरे किंगडम में गुरुवार, 12 नवंबर को एक साथ अदा की जाएगी। दो रकाअत वाली इस खास इबादत में कुल 13 तकबीरें कही जाती हैं। पहली रकाअत में सात और दूसरी में छह बार “अल्लाहु-अकबर” की पुकार के साथ की जाती है। रॉयल कोर्ट की ओर से जारी बयान में कहा गया कि यह नमाज हजरत मोहम्मद की सुन्नत के मुताबिक अदा की जाएगी, जिसमें अल्लाह से रहमत, माफी और बारिश की दुआ की जाती है। साथ ही नागरिकों से अपील की गई है कि वे तौबा (पश्चाताप) करें, इस्तिगफार (माफी मांगें), नेक काम करें और अल्लाह की रहमत की ओर लौटें। यह केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि इंसान की विनम्रता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।
इस्तिस्का की नमाज इस्लाम में बारिश की दुआ के रूप में अदा की जाने वाली एक विशेष इबादत है। यह नमाज़ दो रकाअतों की होती है, जिसमें कुल 13 तकबीरें (अल्लाहु-अकबर की पुकारें) कही जाती हैं। पहली रकाअत में सात बार और दूसरी रकाअत में छह बार “अल्लाहु-अकबर” कहकर अल्लाह की बड़ाई की जाती है। पहली रकाअत के दौरान इमाम सूरह अल-आला (The Most High) की तिलावत करते हैं, जबकि दूसरी रकाअत में सूरह अल-गाशिया (The Overwhelming) पढ़ी जाती है। नमाज पूरी होने के बाद इमाम खुतबा (प्रवचन) देते हैं और पूरी कौम मिलकर बारिश, रहमत और माफी की दुआ करती है।
इस्तिस्का की नमाज सिर्फ बारिश की गुहार नहीं, बल्कि इंसान की आत्मा और अल्लाह के बीच संवाद का एक पवित्र माध्यम है। जब धरती सूख जाती है, नदियाँ थम जाती हैं और आसमान चुप हो जाता है तब यह नमाज़ लोगों को अल्लाह के सामने विनम्रता, तौबा और भरोसे के साथ झुकना सिखाती है। इस्लाम में इसे एक सामूहिक आध्यात्मिक अभ्यास माना गया है, जो समाज को एकजुट कर इंसानियत और ईमान का संदेश देता है। रेगिस्तानी इलाकों जैसे सऊदी अरब में इसका महत्व और भी गहरा है जहां बारिश सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि रहमत का प्रतीक मानी जाती है। इस्तिस्का की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि जब सारी कोशिशें नाकाम लगें, तब दुआ और एकता ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।
जब आसमान ने खामोशी ओढ़ ली और रेगिस्तान की रेत ने तपिश से कराहना शुरू किया, तब इस्तिस्का की नमाज़ लोगों के दिलों में उम्मीद की ताज़गी लेकर आई। रॉयल कोर्ट के मुताबिक, किंग सलमान का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब सऊदी अरब के कई इलाके लंबे सूखे और अनियमित बरसात की मार झेल रहे हैं। जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि बीते कुछ सालों में बारिश के मौसमों के बीच बढ़ता फासला सिर्फ मौसम की बात नहीं, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन की चेतावनी है।