अमेरिका के लिए नई चुनौती : रूस-भारत-चीन की त्रिकोणीय ताकत से हिल रहा ग्लोबल पावर बैलेंस
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 10:46 PM
चीन के तियानजिन शहर में चल रहे एससीओ (SCO) समिट 2025 ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के पावर गेम का रुख बदल दिया है। यह शिखर सम्मेलन केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मंच नहीं रहा, बल्कि अब यह अमेरिका-प्रधान वैश्विक व्यवस्था के सामने एक सशक्त विकल्प बनकर खड़ा हो रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप की कोशिश रही कि भारत, रूस और चीन को अलग-अलग करके दबाव की राजनीति से लाभ उठाया जाए। लेकिन मौजूदा हालात में ठीक उल्टा हो रहा है। ये तीनों महाशक्तियां करीब आती दिख रही हैं। यही कारण है कि अमेरिकी टैरिफ की रणनीति और नोबेल महत्वाकांक्षा दोनों पर अब बड़ा झटका लग सकता है। SCO Summit :
नोबेल से लेकर टैरिफ वॉर तक : ट्रंप की बेचैनी बढ़ी
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंध, चीन पर 30% टैरिफ और भारत पर रूसी तेल आयात के नाम पर 50% तक शुल्क लगाकर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। परंतु अब यही हथियार उनके खिलाफ भारी पड़ रहा है। भारत, चीन और रूस के एक साथ आने का मतलब है अमेरिका की मनमानी पर सीधी चोट।
संख्या में और ताकत में भारी
* जनसंख्या : भारत (147 करोड़), चीन (142 करोड़) और रूस (14.6 करोड़) मिलकर दुनिया की 31% आबादी को कवर करते हैं। अकेला अमेरिका (34.7 करोड़) इनके सामने कहीं नहीं टिकता।
* अर्थव्यवस्था : तीनों देशों की संयुक्त शक्ति करीब 61.3 ट्रिलियन डॉलर, जबकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था 29.3 ट्रिलियन डॉलर पर सिमटी हुई है।
* ट्रेड : 2024 में भारत-रूस-चीन का संयुक्त व्यापार 7.25 ट्रिलियन डॉलर रहा, जबकि अमेरिका का व्यापार केवल 4.99 ट्रिलियन डॉलर तक सिमटा।
साफ है कि आर्थिक मोर्चे पर भी ये तीन देश मिलकर अमेरिका से आगे निकल चुके हैं।
ग्लोबल मंच पर अमेरिका के लिए खतरे की घंटी
अगर रूस-भारत-चीन की त्रिकोणीय ताकत रणनीतिक तौर पर एकजुट हो जाती है तो ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंच और मजबूत होंगे। डॉलर का दबदबा चुनौती में आएगा। अमेरिकी हथियार और प्रोडक्शन बाजार खो सकते हैं। टैरिफ वार का असर अमेरिका की ही कंपनियों को झेलना पड़ेगा, क्योंकि उनकी सप्लाई चेन भारत और चीन पर निर्भर है।
मोदी-जिनपिंग मुलाकात और संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात में सीमा, सीधी उड़ान और व्यापार पर लंबी चर्चा हुई। सूत्र बताते हैं कि माहौल पहले से कहीं अधिक सहयोगी रहा। अगर रूस इस कड़ी में मजबूती से जुड़ता है तो यह गठजोड़ केवल एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक राजनीति का शक्ति-संतुलन बदल सकता है।
एससीओ समिट से जो तस्वीर उभर रही है, वह साफ बताती है कि दुनिया अब केवल वॉशिंगटन की शर्तों पर नहीं चलेगी। रूस-भारत-चीन की संयुक्त ताकत अमेरिका जैसे नौ देशों को समा सकती है और इकोनॉमी में दोगुनी ताकत रखती है। यही वजह है कि ट्रंप बेचैन हैं और उनकी टैरिफ डिप्लोमेसी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।