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वैश्विक तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक खींचतान ने रविवार को एक अहम मोड़ ले लिया, जब पाकिस्तान में आयोजित वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई।

Us Iran War : वैश्विक तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक खींचतान ने रविवार को एक अहम मोड़ ले लिया, जब पाकिस्तान में आयोजित वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। इस विफल बातचीत को यदि भारतीय ग्रामीण परंपरा की “पंचायत व्यवस्था” के नजरिए से समझा जाए, तो इसकी असफलता का कारण साफ नजर आता है कमजोर सरपंच। Us Iran War
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की इस बैठक में पाकिस्तान ने मध्यस्थ यानी “सरपंच” की भूमिका निभाने की कोशिश की। दोनों पक्ष अमेरिका और ईरान अपने-अपने मुद्दों और शर्तों के साथ आमने-सामने थे, ठीक उसी तरह जैसे किसी गांव की पंचायत में दो पक्ष अपने विवाद लेकर पहुंचते हैं। भारत की पारंपरिक पंचायत व्यवस्था में यह मान्यता रही है कि पंचायत की सफलता काफी हद तक सरपंच की ताकत, निष्पक्षता और प्रभाव पर निर्भर करती है। यदि सरपंच मजबूत हो, तो वह दोनों पक्षों को संतुलित कर समाधान निकाल सकता है। लेकिन अगर सरपंच कमजोर हो, तो पंचायत अक्सर बेनतीजा खत्म हो जाती है। Us Iran War
इस वार्ता में पाकिस्तान की स्थिति भी कुछ ऐसी ही नजर आई। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी सीमित साख और आंतरिक-आर्थिक चुनौतियों के कारण वह दोनों शक्तिशाली देशों के बीच प्रभावी मध्यस्थता नहीं कर सका। न तो वह अमेरिका पर दबाव बना पाया और न ही ईरान को संतुष्ट कर सका। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यही कमजोरी इस बातचीत की सबसे बड़ी बाधा बनी। एक मजबूत और प्रभावशाली मध्यस्थ की अनुपस्थिति में वार्ता धीरे-धीरे अपने उद्देश्य से भटक गई और अंततः बिना किसी सहमति के समाप्त हो गई।
इस घटनाक्रम के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या अंतरराष्ट्रीय विवादों में भी “मजबूत मध्यस्थ” की भूमिका उतनी ही जरूरी है जितनी किसी गांव की पंचायत में होती है। भारत की पारंपरिक सोच को देखें तो यह सिद्धांत यहां भी सटीक बैठता है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अभी खत्म होने के संकेत नहीं हैं। पाकिस्तान में हुई इस असफल वार्ता के बाद अब नजरें किसी नए मध्यस्थ या नए मंच पर टिकी हैं, जहां दोनों देश फिर से बातचीत की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि एक बात स्पष्ट हो गई है चाहे गांव की पंचायत हो या वैश्विक कूटनीति, “सरपंच” यदि मजबूत न हो, तो समाधान की उम्मीद भी कमजोर पड़ जाती है।
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