इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि सऊदी अरब ने अमेरिका में लगभग एक ट्रिलियन डॉलर तक के निवेश का वादा किया है। इतना ही नहीं, सऊदी के व्यावसायिक संबंध ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे में रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक हित एक साथ आकर सऊदी के पक्ष में खड़े नजर आते हैं।

वॉशिंगटन की ओवल ऑफिस में हुई ताज़ा मुलाकात ने अमेरिका–सऊदी रिश्तों की पूरी पटकथा ही बदल दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की इस हाई–प्रोफाइल सीरीज़ के बाद रियाद सिर्फ कूटनीतिक तस्वीरें खिंचवाकर नहीं लौटा, बल्कि सौदों की मोटी फाइलें साथ लेकर गया है। सऊदी अरब को F-35 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों पर सिद्धांततः सहमति, रणनीतिक रक्षा साझेदारी के नए फ्रेमवर्क और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में गहरे सहयोग जैसे कई बड़े लाभ एक साथ मिलते दिख रहे हैं, जो आने वाले सालों में दोनों देशों की साझेदारी को एक नए पावर लेवल पर ले जा सकते हैं।
कुछ ही साल पहले तक अमेरिका खुले तौर पर सऊदी अरब के साथ अपने रिश्तों की समीक्षा कर रहा था। राष्ट्रपति जो बाइडन ने चुनावी मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को वैश्विक स्तर पर ‘अलग-थलग’ करने की बात कही थी। 2018 में क्राउन प्रिंस का अमेरिका दौरा और उसके बाद वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या ने दोनों देशों के रिश्तों पर गहरा साया डाल दिया था। लेकिन इसी हफ्ते जब क्राउन प्रिंस ओवल ऑफिस पहुंचे, तो तस्वीर बिल्कुल अलग थी। राष्ट्रपति ट्रंप न सिर्फ उनके साथ गर्मजोशी से दिखे, बल्कि एक सवाल-जवाब के दौरान उनकी खुलकर ढाल भी बने। जब एक पत्रकार ने खशोगी की हत्या पर सवाल उठाया, तो ट्रंप ने उल्टा पत्रकार को ही यह कहकर झिड़क दिया कि वह “हमारे मेहमान को शर्मिंदा कर रही हैं।
ओवल ऑफिस की यह झलक सिर्फ प्रोटोकॉल भर नहीं थी, बल्कि इस बात का संकेत भी थी कि वॉशिंगटन में मोहम्मद बिन सलमान की छवि कितनी तेजी से सुधरी है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से किए गए औपचारिक ऐलानों से साफ दिखा कि ट्रंप व्हाइट हाउस खशोगी हत्याकांड के बोझ को पीछे छोड़कर सऊदी अरब के साथ नए सिरे से रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि सऊदी अरब ने अमेरिका में लगभग एक ट्रिलियन डॉलर तक के निवेश का वादा किया है। इतना ही नहीं, सऊदी के व्यावसायिक संबंध ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे में रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक हित एक साथ आकर सऊदी के पक्ष में खड़े नजर आते हैं।
अमेरिका लंबे समय से यह चाहता रहा है कि सऊदी अरब और इजराइल के बीच संबंध सामान्य हो जाएं। बाइडन प्रशासन ने तो साफ कह दिया था कि किसी भी बड़े अमेरिकी–सऊदी समझौते की तीन अनिवार्य शर्तें होंगी –
लेकिन हालात उस दिशा में आगे नहीं बढ़ सके। इजराइल ने फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर दरवाज़ा बंद रखा और सऊदी अरब ने भी इजराइल के साथ अपने संबंधों को लेकर अपनी पोज़िशन नरम करने से इनकार कर दिया। अब ट्रंप प्रशासन ने उसी फ्रेमवर्क को तोड़कर हिस्सों में बाँट दिया है। यानी अमेरिकी–सऊदी रक्षा, आर्थिक और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को इजराइल के साथ सामान्यीकरण की शर्त से अलग कर दिया गया है। इसका सीधा फायदा सऊदी अरब को मिला – उसे लंबे समय से मांगी जा रही सुरक्षा और आर्थिक सुविधाएं मिल गईं, बिना इजराइल के साथ औपचारिक नॉर्मलाइजेशन के दबाव को स्वीकार किए।
इस हफ्ते अमेरिका ने सऊदी अरब को “प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी” (Major Non-NATO Ally) का दर्जा देने की दिशा में कदम बढ़ा दिया। इसके साथ ही F-35 लड़ाकू विमानों की बिक्री की योजना को आगे बढ़ाया गया, जो तकनीकी क्षमता के मामले में इजराइल के बेड़े के समान माने जाएंगे। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच एक नया रणनीतिक रक्षा समझौता भी आकार ले चुका है, जो खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन और अमेरिका की सैन्य मौजूदगी को मजबूत करेगा।
क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान लंबे समय से सऊदी अर्थव्यवस्था को तेल पर अत्यधिक निर्भरता से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं। उनके विज़न को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और सऊदी अरब ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में एक व्यापक सहयोग ढांचा तैयार किया है।इस फ्रेमवर्क के तहत सऊदी अरब को एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स की बिक्री की मंजूरी शामिल है, जो भविष्य की डिजिटल और AI-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। इसके साथ ही अहम खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) के क्षेत्र में समझौते पर सहमति बनी है और परमाणु ऊर्जा में सहयोग बढ़ाने के नए रास्ते भी खोल दिए गए हैं।
ट्रंप ने सिर्फ द्विपक्षीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय मुद्दों पर भी क्राउन प्रिंस की कई प्राथमिकताएं स्वीकार कीं। सूडान के गृहयुद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में मदद करने पर सहमति देकर अमेरिका ने यह संकेत दिया कि वह सऊदी को सिर्फ तेल–धन से भरपूर देश नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति केंद्र के रूप में भी मान्यता देने को तैयार है। ओवल ऑफिस में ट्रंप के बगल में बैठे मोहम्मद बिन सलमान ने नए समझौतों को “अमेरिका और सऊदी अरब – दोनों के लिए फायदे का सौदा” बताया।