भारत से अमेरिका तक एक जैसी तस्वीर, महिलाओं से लिया जाता है उन्हें दिया नहीं जाता
भारत
चेतना मंच
25 Aug 2025 02:48 PM
भारत ही नहीं, दुनियाभर में एक अजीब लेकिन परेशान करने वाला ट्रेंड सामने आया है महिलाएं सबसे ज्यादा ऑर्गन दान करती हैं, लेकिन जब खुद उन्हें जरूरत होती है तो उन्हें पीछे कर दिया जाता है।आइए इस महत्वपूर्ण विषमता को आंकड़ों के साथ समझते हैं। Organ Donation
नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO) की रिपोर्ट कहती है कि देश में 63% अंगदान महिलाएं करती हैं, लेकिन 70% अंग पुरुष मरीजों को मिलते हैं। यानी देने वाली महिलाएं हैं, लेकिन लेने वाले पुरुष। और ये कहानी सिर्फ भारत तक नहीं सीमित है, अमेरिका जैसे विकसित देश भी इससे अछूते नहीं हैं।
महिलाएं क्यों करती हैं ज्यादा डोनेट?
अक्सर महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे परिवार के लिए त्याग करें चाहे वो आर्थिक हो, स्वास्थ्य से जुड़ा या फिर जीवन से जुड़ा। परिवार में अगर किसी को किडनी या लिवर की जरूरत पड़ती है तो सबसे पहले महिला सदस्य आगे आती है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि उनसे बिना पूरी जानकारी के ही ऑर्गन डोनेशन के लिए हामी भरवा ली जाती है। वहीं जब बात महिलाओं के इलाज या ट्रांसप्लांट की आती है तो उनकी ज़रूरत को कमतर आंका जाता है।
ऑर्गन मिलते क्यों नहीं?
1. पैसे की कमी: ट्रांसप्लांट एक महंगी प्रक्रिया है और कई गरीब परिवारों में महिला मरीजों को इलाज का मौका ही नहीं दिया जाता।
2. ब्रेडविनर सोच: माना जाता है कि पुरुष घर चलाता है इसलिए उसका इलाज पहले जरूरी है।
3. भावनात्मक दबाव: महिलाओं से त्याग की उम्मीद की जाती है जिससे वे खुद की जरूरतों को पीछे कर देती हैं।
भारत ही नहीं अमेरिका में भी यही हाल
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, अमेरिका में 10 में से 6 ऑर्गन डोनर महिलाएं होती हैं लेकिन रिसीवर के रूप में उनकी संख्या घटकर 4 पर आ जाती है। यानी वैश्विक स्तर पर भी जेंडर का यह फर्क दिखता है।
महिलाओं से पुरुषों में ट्रांसप्लांट में रिस्क ज्यादा
रिसर्च बताता है कि महिला डोनर के अंग, खासकर किडनी और हार्ट, अगर पुरुषों में ट्रांसप्लांट किए जाएं तो लंबे समय तक टिकने की संभावना कम होती है। इसकी एक वजह अंगों का साइज होता है अक्सर महिलाओं के अंग छोटे होते हैं जो पुरुषों के शरीर में फिट नहीं बैठते।
NOTTO ने क्या कदम उठाया?
NOTTO ने हाल ही में एक अहम एडवायजरी जारी की है जिसमें कहा गया है कि, अगर कोई महिला मरीज है या कोई परिवार पहले अंगदान कर चुका है, तो उन्हें ट्रांसप्लांट के लिए प्राथमिकता दी जाए। हर अस्पताल में ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर होना चाहिए। एंबुलेंस स्टाफ को भी ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वे संभावित ब्रेन-डेड डोनर की पहचान समय रहते कर सकें।
दुनिया में कहां है अपवाद?
स्पेन में ‘Opt-Out’ सिस्टम है
वहां हर व्यक्ति ऑटोमैटिकली डोनर माना जाता है जब तक कि वह खुद मना न करे।
नॉर्वे और स्कैंडिनेवियाई देश
हेल्थ कवरेज सबको मिलता है, जिससे महिलाओं और पुरुषों को बराबरी से इलाज मिलता है।
ईरान
दुनिया का एकमात्र देश जहां किडनी बेचने की अनुमति है लेकिन वहां भी डोनर ज़्यादातर गरीब पुरुष और रिसीवर अमीर महिलाएं होती हैं।
महिलाओं को अंगदान के मामले में भी बराबरी का हक मिलना चाहिए।
ट्रांसप्लांट लिस्ट में महिलाओं को शामिल करने की प्रक्रिया को आसान और सुलभ बनाया जाए।
लोगों की सोच बदली जाए कि त्याग केवल महिलाओं का काम नहीं है और सबसे जरूरी, महिलाओं को उनके स्वास्थ्य को लेकर खुद भी सजग और मुखर होना होगा। Organ Donation