दनकौर के द्रोणाचार्य मेले में भव्य कवि सम्मेलन तो हुआ, लेकिन दीक्षित दनकौरी की गैरमौजूदगी ने साहित्य प्रेमियों के बीच नई बहस छेड़ दी है। स्थानीय कवियों और साहित्यकारों ने आयोजन में दनकौर की साहित्यिक पहचान को उचित स्थान देने की मांग उठाई।

Jewar News : दनकौर के ऐतिहासिक द्रोणाचार्य मेले में रविवार को आयोजित भव्य कवि सम्मेलन के बाद अब इस आयोजन को लेकर साहित्यिक हलकों में सवाल उठने लगे हैं। मेले में आयोजित कवि सम्मेलन की चर्चा जहां मंचीय प्रस्तुतियों को लेकर हुई, वहीं दनकौर क्षेत्र के अनेक साहित्य प्रेमियों, स्थानीय कवियों, साहित्यकारों और पत्रकारों ने आयोजन की साहित्यिक दृष्टि और स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर आपत्ति जताई है। साहित्यिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि दनकौर केवल ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान वाला नगर नहीं है, बल्कि इसकी अपनी एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान भी है। ऐसे में दनकौर में होने वाले किसी बड़े कवि सम्मेलन में स्थानीय साहित्यिक विरासत और उससे जुड़े प्रमुख नामों को स्थान मिलना भी जरूरी है।
दनकौर के साहित्य प्रेमियों द्वारा सबसे बड़ा सवाल दीक्षित दनकौरी को लेकर उठाया जा रहा है। उनका कहना है कि दनकौर के नाम को देश और दुनिया के साहित्यिक मंचों तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध कवि दीक्षित दनकौरी का नाम दनकौर की साहित्यिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्थानीय साहित्यकारों और कवियों का कहना है कि जब दनकौर के नाम पर एक बड़ा कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा था, तब दीक्षित दनकौरी की मौजूदगी आयोजन की गरिमा को और बढ़ा सकती थी। उनके अनुसार, यदि किसी कारण से उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया या वे आयोजन में शामिल नहीं हो सके, तो आयोजकों की ओर से इसकी स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों का सबसे बड़ा तर्क यही है कि जिस नगर के नाम से कोई साहित्यकार देश-दुनिया में अपनी पहचान बना चुका हो, उसी नगर में आयोजित बड़े साहित्यिक कार्यक्रम में उसकी भूमिका पर विचार होना स्वाभाविक है। स्थानीय साहित्य प्रेमियों का कहना है कि दनकौर में होने वाले साहित्यिक आयोजनों को केवल मनोरंजन या मंचीय कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। ऐसे आयोजनों के माध्यम से दनकौर की साहित्यिक विरासत, स्थानीय रचनाकारों और नगर की सांस्कृतिक पहचान को भी सामने लाया जाना चाहिए।
कवि सम्मेलन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच स्थानीय साहित्यकारों की एक अन्य मांग भी सामने आई है। उनका कहना है कि दनकौर और आसपास के क्षेत्र में लंबे समय से साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े कवि, लेखक और पत्रकार सक्रिय हैं। ऐसे में बड़े आयोजनों में बाहर से आने वाले चर्चित कवियों के साथ-साथ स्थानीय रचनाकारों को भी मंच दिया जाना चाहिए। इससे नई पीढ़ी के साहित्यकारों को प्रोत्साहन मिलेगा और दनकौर की अपनी साहित्यिक परंपरा को मजबूती मिलेगी।
दनकौर का द्रोणाचार्य मेला क्षेत्र की पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा आयोजन माना जाता है। मेले में धार्मिक, सांस्कृतिक और मनोरंजन से जुड़े अनेक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। ऐसे में साहित्य प्रेमियों का मानना है कि कवि सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों में स्थानीय साहित्यिक इतिहास को भी उचित स्थान मिलना चाहिए। उनका कहना है कि दनकौर की पहचान केवल द्रोणाचार्य और मेले तक सीमित नहीं है। दनकौर ने साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई है। इसलिए यहां होने वाले बड़े कवि सम्मेलन में नगर की साहित्यिक विरासत की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
कवि सम्मेलन के बाद दनकौर क्षेत्र में साहित्य से जुड़े लोगों के बीच यह विषय चर्चा का कारण बना हुआ है। साहित्य प्रेमियों का कहना है कि भविष्य में द्रोणाचार्य मेले के अंतर्गत होने वाले कवि सम्मेलनों की रूपरेखा तैयार करते समय स्थानीय साहित्यकारों और कवियों से भी संवाद किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि आयोजन समिति स्थानीय साहित्यिक समुदाय को साथ लेकर कार्यक्रम तैयार करे तो द्रोणाचार्य मेले का कवि सम्मेलन क्षेत्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी दनकौर की साहित्यिक पहचान को मजबूती देने वाला मंच बन सकता है।
फिलहाल साहित्य प्रेमियों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच निगाहें द्रोणाचार्य मेला आयोजन समिति और कवि सम्मेलन के आयोजकों की ओर हैं। साहित्यिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की मांग है कि आयोजक यह स्पष्ट करें कि दनकौर की साहित्यिक पहचान से जुड़े प्रमुख रचनाकारों को कार्यक्रम में किस प्रकार स्थान दिया गया और दीक्षित दनकौरी की कार्यक्रम में अनुपस्थिति का कारण क्या रहा। स्थानीय साहित्यकारों का कहना है कि सवाल किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान या अपमान का नहीं, बल्कि दनकौर की साहित्यिक अस्मिता और स्थानीय रचनाकारों को उचित सम्मान देने का है।
दनकौर के द्रोणाचार्य मेले का कवि सम्मेलन भले ही मंचीय प्रस्तुतियों और कवियों की रचनाओं के कारण चर्चा में रहा हो, लेकिन अब साहित्य प्रेमियों द्वारा उठाए गए सवाल ने आयोजन के दूसरे पहलू को सामने ला दिया है। क्या दनकौर में होने वाले बड़े कवि सम्मेलन में दनकौर की साहित्यिक विरासत को प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए? क्या दीक्षित दनकौरी जैसे दनकौर की साहित्यिक पहचान से जुड़े रचनाकार को ऐसे मंच पर आमंत्रित किया जाना चाहिए था? और यदि नहीं, तो इसकी वजह क्या है? इन सवालों के जवाब अब साहित्यिक जगत के साथ-साथ द्रोणाचार्य मेला आयोजन समिति से भी अपेक्षित हैं।
विज्ञापन