Jewar History: जेवर अब सिर्फ एक तहसील या कस्बा नहीं रहा बल्कि जेवर का नाम देश के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल हो चुका है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उद्घाटन के साथ जेवर की पहचान नई ऊंचाइयों तक पहुंचने जा रही है।

उत्तर प्रदेश का छोटा सा कस्बा जेवर इन दिनों पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। जेवर अब सिर्फ एक तहसील या कस्बा नहीं रहा बल्कि जेवर का नाम देश के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल हो चुका है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उद्घाटन के साथ जेवर की पहचान नई ऊंचाइयों तक पहुंचने जा रही है लेकिन विकास की इस नई कहानी के बीच जेवर का इतिहास भी लोगों की जिज्ञासा बढ़ा रहा है। आखिर जेवर का नाम कहां से आया, जेवर का रामायण से क्या संबंध है और क्या जेवर का कोई रिश्ता महाभारत काल से भी जुड़ा है ऐसे कई सवाल लोगों के मन में उठ रहे हैं।
जेवर उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले की एक तहसील है। कभी यह बुलंदशहर जिले का हिस्सा हुआ करता था लेकिन साल 1997 में जब गौतमबुद्ध नगर जिला बना तब जेवर को इसमें शामिल कर लिया गया। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी करीब 32 हजार के आसपास थी लेकिन एयरपोर्ट परियोजना के बाद इस क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ है और आबादी भी बढ़ी है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने के बाद यह छोटा कस्बा अब देश और दुनिया के नक्शे पर अपनी पहचान बनाने जा रहा है। यही वजह है कि जेवर के नाम और इतिहास को लेकर लोगों की दिलचस्पी भी बढ़ गई है।
‘जेवर’ शब्द का मतलब आमतौर पर गहना या आभूषण होता है। इसी वजह से पहली नजर में लगता है कि इस इलाके का नाम गहनों से जुड़ा होगा। कई स्थानों के नाम स्थानीय व्यापार या पेशों के आधार पर रखे जाते रहे हैं जैसे चूड़ी बाजार, अनाज मंडी या लोहार बस्ती। कुछ स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, संभव है कि कभी इस क्षेत्र में गहनों का कारोबार होता रहा हो या यहां किसी मेले या बाजार में आभूषणों की बिक्री प्रसिद्ध रही हो। हालांकि इस बात के समर्थन में कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए यह कहानी लोक परंपरा तक ही सीमित मानी जाती है।
जेवर का सीधा उल्लेख रामायण या अन्य प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता लेकिन जिस क्षेत्र में जेवर स्थित है वह रामायण काल से जुड़ा माना जाता है। गौतमबुद्ध नगर जिले के इतिहास में इस इलाके को त्रेतायुग से जोड़कर देखा जाता है। जिले के बिसरख गांव को रावण के पिता विश्रवा ऋषि की जन्मभूमि माना जाता है। यहां आज भी रावण का मंदिर मौजूद है और दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं किया जाता। यह परंपरा इस क्षेत्र की पौराणिक पहचान को और मजबूत करती है।
केवल रामायण ही नहीं इस क्षेत्र का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि दनकौर में गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था जहां पांडव और कौरवों ने युद्ध की शिक्षा ली थी। कहा जाता है कि एकलव्य भी इसी क्षेत्र से जुड़े थे। इन मान्यताओं के चलते यह इलाका प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा माना जाता है। हालांकि ये बातें लोक परंपराओं पर आधारित हैं लेकिन क्षेत्र की पहचान को एक अलग महत्व जरूर देती हैं।
आज जेवर की पहचान केवल इतिहास तक सीमित नहीं रह गई है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उद्घाटन के साथ यह क्षेत्र विकास की नई दिशा में कदम रख रहा है। यह एयरपोर्ट उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट होगा और दिल्ली-एनसीआर के लिए एक नया विकल्प बनेगा। बताया जा रहा है कि मई-जून तक यहां से घरेलू उड़ानें शुरू हो सकती हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानें उसके कुछ महीनों बाद शुरू होने की उम्मीद है। एयरपोर्ट बनने से रोजगार, व्यापार और निवेश के नए अवसर भी खुलेंगे।
जेवर की पहचान अब केवल एक छोटे कस्बे की नहीं रहेगी। प्राचीन इतिहास और आधुनिक विकास का यह संगम इसे आने वाले समय में देश के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल कर सकता है। रामायण और महाभारत की लोक कथाओं से लेकर आधुनिक एयरपोर्ट तक का यह सफर जेवर को एक नई पहचान देने जा रहा है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश के विकास का नया इंजन बन सकता है।