दनकौर में 3 से 15 सितंबर तक 103वां श्रीकृष्ण जन्मोत्सव एवं द्रोण मेला चल रहा है। दंगल, कवि सम्मेलन, रागिनी और सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण बने हैं।

Jewar News : जेवर क्षेत्र में स्थापित दनकौर नगर एक पौराणिक नगरी है। यह नगरी जेवर कस्बे के पास स्थापित जेवर एयरपोर्ट के बिल्कुल निकट पड़ती है। इसी नगरी में इन दिनों महाभारत काल के प्रसिद्ध गुरू द्रोणाचार्य की याद में बहुत भव्य मेले का आयोजन चल रहा है। आपको बता दें कि ग्रेटर नोएडा के पास बसे दनकौर नगर में इन दिनों सिर्फ एक मेला नहीं लगा है, बल्कि हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृतियां जीवंत हो उठी हैं। गुरु द्रोणाचार्य की नगरी के रूप में प्रसिद्ध दनकौर में 103वां श्रीकृष्ण जन्मोत्सव एवं द्रोण मेला पूरे उत्साह के साथ चल रहा है। 3 सितंबर से शुरू हुआ यह आयोजन 15 सितंबर तक चलेगा। द्रोणाचार्य मंदिर परिसर और द्रोण तालाब के आसपास सजा यह मेला जेवर विधानसभा क्षेत्र की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपराओं में गिना जाता है। मेले में जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्री द्रोणाचार्य मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं, वहीं द्रोण तालाब परिसर में होने वाले दंगल, कवि सम्मेलन, रागिनी, नाट्य मंचन, लोकनृत्य, धार्मिक कार्यक्रम, झूले और मीना बाजार लोगों को अपनी ओर खींच रहे हैं। सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो और तस्वीरों में भी मेले में उमड़ रही भीड़ और विभिन्न कार्यक्रमों के प्रति लोगों का उत्साह दिखाई दे रहा है। Jewar News :
दनकौर को स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में गुरु द्रोणाचार्य की नगरी माना जाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम और गुरुकुल इसी क्षेत्र में था, जहां कौरवों और पांडवों ने अस्त्र-शस्त्र तथा युद्धकला की शिक्षा प्राप्त की थी। इसी मान्यता ने दनकौर को सामान्य कस्बे से अलग एक ऐसी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान दी है, जिसका संबंध सीधे महाभारत की कथा से जोड़ा जाता है। हालांकि द्रोणाचार्य के गुरुकुल और महाभारतकालीन घटनाओं से जुड़े इन विवरणों को स्थानीय धार्मिक एवं लोक मान्यता के रूप में देखना अधिक उचित है; इनके सभी पहलुओं का आधुनिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होना अलग विषय है। दनकौर के नाम को भी स्थानीय परंपरा में द्रोणाचार्य से जोड़ा जाता है। कुछ परंपराओं में इसे पुराने समय में 'द्रोणकोर' अथवा 'द्रोण नगरी' के रूप में वर्णित किया जाता है।

दनकौर के द्रोणाचार्य मंदिर की सबसे खास मान्यताओं में एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य की कथा भी शामिल है। महाभारत की प्रसिद्ध कथा के अनुसार एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखना चाहते थे। प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं मिल पाने के बाद उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर उसे अपना गुरु माना और उसके सामने अभ्यास करते हुए महान धनुर्धर बनने की साधना की। स्थानीय मान्यता है कि दनकौर में स्थित गुरु द्रोणाचार्य की प्राचीन प्रतिमा का संबंध इसी कथा से है। मंदिर से जुड़ी परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि एकलव्य ने यहां गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा स्थापित कर धनुर्विद्या का अभ्यास किया था। यही कारण है कि दनकौर का द्रोणाचार्य मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, एकलव्य की गुरु भक्ति और महाभारत की लोक स्मृतियों का केंद्र भी माना जाता है।
इस वर्ष का आयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे 103वां श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला बताया जा रहा है। श्री द्रोण गौशाला समिति के तत्वावधान में आयोजित इस मेले में धार्मिक आयोजनों के साथ खेल, साहित्य, लोककला और मनोरंजन को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। मेले का धार्मिक पक्ष श्रीकृष्ण जन्मोत्सव से जुड़ा है, जबकि इसकी ऐतिहासिक पहचान गुरु द्रोणाचार्य से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि दनकौर का यह आयोजन केवल जन्माष्टमी का मेला न रहकर द्रोणाचार्य मेला के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
द्रोण मेले में दंगल की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र रही है। इस वर्ष भी द्रोण तालाब परिसर में देश और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहलवानों के पहुंचने और कुश्ती मुकाबलों का आयोजन किया गया। मेले के कार्यक्रम के अनुसार 6, 7 और 8 सितंबर को अलग-अलग इनामी कुश्तियां आयोजित की गईं। इनमें 11 हजार, 21 हजार और 1.51 लाख रुपये तक के पुरस्कारों वाली कुश्तियां शामिल रहीं। आयोजकों की ओर से सर्वोच्च मल्ल की घोषणा किए जाने की भी बात कही गई थी। द्रोण तालाब का अखाड़ा इन दिनों पहलवानों की हुंकार और दर्शकों की तालियों से गूंजता नजर आया। द्रोणाचार्य की नगरी में कुश्ती का आयोजन अपने आप में इस मेले की ऐतिहासिक और पारंपरिक पहचान को मजबूत करता है।
द्रोण मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विराट कवि सम्मेलन भी प्रमुख आकर्षण रहा। 6 सितंबर की रात आयोजित कवि सम्मेलन में देशभर से आए कवियों ने हास्य, व्यंग्य, वीर रस और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएं प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम के दौरान द्रोण नाट्य मंच तालियों और ठहाकों से गूंजता रहा। स्थानीय स्तर पर सामने आए वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट में भी कवि सम्मेलन को लेकर लोगों में खास उत्साह दिखाई दिया। चेतना मंच ने भी इस कवि सम्मेलन को लेकर विस्तृत समाचार प्रकाशित किया है, जिसमें इसे द्रोण मेले में साहित्य और लोक संस्कृति के महत्वपूर्ण संगम के रूप में रेखांकित किया गया है।
मेले में रात के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला लगातार जारी है। आयोजकों द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार रागिनी, कवि सम्मेलन, नाटक, भजन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और लोकनृत्य लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। आने वाले दिनों में 'सीता स्वयंवर', 'वीर हकीकत राय' और 'वीर अभिमन्यु' जैसे नाटकों का मंचन प्रस्तावित है। इसके अलावा स्थानीय स्कूलों के बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम, पंजाबी-राजस्थानी नृत्य और सूफी संगीत भी कार्यक्रमों का हिस्सा हैं।
द्रोण मेला केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं है। मेले में लगाए गए मीना बाजार, खान-पान की दुकानें, पारंपरिक सामान की दुकानें और झूले भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। महिलाओं और परिवारों की बड़ी संख्या खरीदारी के लिए पहुंच रही है। बच्चों के लिए लगाए गए झूले और मनोरंजन के दूसरे साधन मेले को पारिवारिक उत्सव का रूप दे रहे हैं। हाल की स्थानीय रिपोर्टों में मेले में गोरखपुर के खजला-हलवे जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों की मौजूदगी और खरीदारी को लेकर भी लोगों के उत्साह का उल्लेख किया गया है।
ऐसे पारंपरिक मेलों का महत्व केवल धार्मिक और सांस्कृतिक नहीं होता। हजारों लोगों की आवाजाही से स्थानीय दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, खान-पान कारोबारियों, झूला संचालकों और अस्थायी दुकानदारों को भी रोजगार और कारोबार का अवसर मिलता है। दनकौर और आसपास के गांवों के लिए यह मेला हर वर्ष एक बड़े सामुदायिक आयोजन के रूप में सामने आता है। दूर-दराज से आने वाले लोग मंदिर में दर्शन के साथ मेले का आनंद लेते हैं और स्थानीय बाजार में खरीदारी भी करते हैं।
दनकौर के द्रोण मेले को समझने के लिए इसे केवल झूलों और दुकानों वाले सामान्य मेले की नजर से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे गुरु द्रोणाचार्य, पांडव-कौरव, एकलव्य, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, कुश्ती और स्थानीय लोक संस्कृति की लंबी परंपरा जुड़ी हुई है। इसी वजह से हर वर्ष इस मेले का इंतजार दनकौर ही नहीं, बल्कि पूरे जेवर क्षेत्र और ग्रेटर नोएडा के आसपास के लोग करते हैं। स्थानीय परंपरा में इस मेले के इतिहास को कई पीढ़ियों से आगे बढ़ाया गया है। कुछ स्रोत इसके आयोजन की निरंतरता को 19वीं सदी तक ले जाते हैं और बताते हैं कि पुराने समय में बाधित हुई परंपरा को बाद में दोबारा शुरू कराया गया। 1883 के आसपास मेले के पुनः आयोजन का भी उल्लेख मिलता है, हालांकि इन ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए अलग से पुरालेखीय अध्ययन आवश्यक है।
दनकौर प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण नगर है और जेवर विधानसभा क्षेत्र का प्रमुख हिस्सा होने के कारण यहां होने वाले बड़े आयोजन जेवर क्षेत्र की खबरों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के कारण जेवर क्षेत्र की पहचान आज वैश्विक स्तर पर तेजी से बदल रही है। ऐसे दौर में दनकौर का द्रोण मेला क्षेत्र की हजारों साल पुरानी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान की याद दिलाता है। एक ओर जेवर एयरपोर्ट और आधुनिक औद्योगिक विकास इस क्षेत्र को भविष्य की ओर ले जा रहे हैं, तो दूसरी ओर दनकौर का द्रोण मेला क्षेत्र को उसके इतिहास, लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर रखे हुए है।
इस वर्ष 103वां श्रीकृष्ण जन्मोत्सव एवं द्रोण मेला 3 सितंबर से 15 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। यानी अभी कई दिन तक दनकौर में मेले की रौनक जारी रहेगी। धार्मिक कार्यक्रमों के साथ आने वाले दिनों में नाट्य मंचन, स्कूलों के सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकनृत्य, सूफी संगीत और अन्य प्रस्तुतियां लोगों को आकर्षित करेंगी।
दनकौर में गुरु द्रोणाचार्य मंदिर के आसपास इन दिनों दिखाई दे रहा उत्सव इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच भी पुरानी परंपराएं लोगों को उसी मजबूती से जोड़ती हैं। द्रोणाचार्य की नगरी में लगा यह मेला इतिहास, आस्था, खेल, साहित्य, लोककला और मनोरंजन का ऐसा संगम है, जिसकी अपनी अलग पहचान है। जेवर कैटेगरी के पाठकों के लिए दनकौर का यह मेला इसलिए भी खास है क्योंकि यह केवल दनकौर का आयोजन नहीं, बल्कि पूरे जेवर क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विज्ञापन