
Mahavir Jayanti 2023 : आज महावीर जयंती है। जी हां जैन धर्म के 24वें व अंतिम तीर्थांकर भगवान महावीर का जन्म आज ही के दिन ईसा से 599 वर्ष पूर्व वर्तमान बिहार प्रदेश के वैशाली नगर में हुआ था। उन्होंने ही जैन धर्म की स्थापना की थी। उनसे पूर्व 23 और तीर्थांकर हुए हैं किन्तु जैन धर्म के प्रर्वतक भगवान महावीर ही थे।
आपको बता दें कि भगवान महावीर क्षत्रीय कुल में पैदा हुए थे। महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था। उनका जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व वैशाली (उत्तरी बिहार) के अंतर्गत कुन्डग्राम में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला देवी था। वर्धमान बाल्यकाल से ही बुद्धिमान, सदाचारी और विचारशील थे। युवा वदर्धमान जीवन-मरण, कर्म, संयम आदि प्रसंगों पर सदैव सोचते तथा विचार-विमर्श करते रहते थे। वर्धमान का मन घर पर नहीं लगता था। वह बचपन से ही अत्यंत गम्भीर रहते थे। नाना प्रकार के सांसारिक सुख होते हुए भी उनकी आत्मा में बेचैनी थी। समाज में प्रचलित आडम्बर, ऊँच-नीच की भावना, चरित्र-पतन तथा जीव हत्या उनकी वेदना के मुख्य कारण थे। यज्ञ के नाम पर पशुओं की हत्या करना वर्धमान को असह्य था।
माता-पिता का देहान्त हो जाने पर वर्धमान ने सांसारिक मोह माया को त्याग कर अपने अग्रज नन्दिवद्र्धन की आज्ञा लेकर संन्यास ले लिया। इस समय उनकी आयु 30 वर्ष थी। वह सत्य और शान्ति की खोज में निकल पड़े। इसके लिए उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया। उनका विचार था कि कठोर तपस्या से ही मन में छिपे काम, क्रोध, लोभ, मद तथा मोह को समाप्त किया जा सकता है। 12 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद, जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर उन्हें कैवल्य की प्राप्ति हुई। कठोर तपस्या के कष्टों को सफलतापूर्वक झेलने तथा इन्द्रियों को अपने वश में कर लेने के कारण वे ‘महावीर’ या ‘जिन’ कहलाने लगे। इन्होंने जिस धर्म का प्रचार किया वह ‘जैन धर्म’ के नाम से जाना जाता है।
जैनियों की मान्यता के अनुसार जैन धर्म में महावीर से पूर्व 23 तीर्थकर हुए हैं। महावीर इस धर्म के अन्तिम तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ है-दु:ख जीतने के पवित्र मार्ग को दिखाने वाला। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी 30 वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार बड़े उत्साह से करते रहे। वे वर्ष में आठ महीने घूम-घूम कर जन साधारण के बीच अपने मत का प्रचार किया करते थे और वर्ष के चार महीने किसी नगर में व्यतीत करते थे। धीरे-धीरे भारत के सम्पूर्ण राज्यों में जैन धर्म का प्रसार हो गया। महावीर स्वामी अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक जन-जन को दीक्षित करते रहे। महावीर स्वामी ने जैन भिक्षुओं के लिए पाँच महाव्रत का विधान किया- सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपारिग्रह।
जैन धर्म के त्रिरत्न यह है- सम्यक् दर्शन (सही बात पर विश्वास), सम्यक् ज्ञान (सही बात को समझना) तथा सम्यक चरित्र (उचित कर्म)।
महावीर स्वामी के उपदेशों, उनके द्वारा प्रतिपादित सिधान्तों, विधानों का जन-मानस पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। उनके समय में उत्तरी भारत में तो इस धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु कई केन्द्रों की स्थापना भी हो गई थी। सामान्यजनों के अतिरिक्त बिम्बिसार तथा उसके पुत्र अजातशत्रु जैसे राजा भी महावीर स्वामी के उपेदशों से प्रभावित हुए।
महावीर स्वामी के उपदेश हमें जीवों पर दया करने की शिक्षा देते हैं। उन्होंने मानव समाज को एक ऐसा मार्ग बताया जो सत्य और अहिंसा पर आधारित है और जिस पर चलकर मनुष्य आज भी बिना किसी को कष्ट दिये हुए मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। (72 वर्ष) की आयु में महावीर स्वामी पाटलिपुत्र (पटना) के निकट पावापुरी में जाकर ध्यान में लीन हो गए और यहीं उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।