धर्म-अध्यात्म : सब कुछ चाहिए परमात्मा से!
विनय संकोची मनुष्य भगवान को पाना चाहता है लेकिन इससे भी ज्यादा वह भगवान से सब कुछ पाना चाहता है।…
चेतना मंच | November 29, 2021 11:20 PM
विनय संकोची
मनुष्य भगवान को पाना चाहता है लेकिन इससे भी ज्यादा वह भगवान से सब कुछ पाना चाहता है। इतना कुछ पाना चाहता है, जितना वह जानता तक नहीं है। मनुष्य को भगवान से सब कुछ चाहिए और वह भी तब जबकि वह भगवान को याद करने का समय भी बड़ी मुश्किल से निकाल पाता है।
मनुष्य भगवान को तब अधिक याद करता है, जब वह इच्छा विशेष की पूर्ति चाहता है या फिर वह उन कष्टों से घिर जाता है, जिन से निकलने का कोई सांसारिक मार्ग उसके सामने नहीं होता है, तब याद आते हैं। यह एक सच्चाई है, जिसे स्वीकार नहीं किए जाने का कोई कारण, कोई तर्क किसी के पास नहीं है।
इस संसार का विधान कुछ ऐसा है कि सब को सब कुछ समान रूप से प्राप्त नहीं हो सकता, कुछ भी नहीं। किसी को किसी वस्तु अथवा प्रिय का अभाव महसूस होता है, तो किसी को किसी अन्य वस्तु की कमी खलती है या उसी वस्तु के आधिक्य का अनुभव होता है, जिसका अभाव दूसरे को कष्ट देता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सब को सब कुछ ना कभी मिला है, ना कभी मिल सकता है। एक चीज ऐसी है जो प्रत्येक मनुष्य को समान रूप से प्राप्त हो सकती है, वह है परमात्मा। हां, परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु समान रूप से सबको नहीं मिल सकती है और यह इसलिए क्योंकि परमात्मा किसी से भेद नहीं करता है। परमात्मा का प्रेम किसी के लिए भी कम या अधिक नहीं होता है। परमात्मा की कृपा सब पर समान रूप से बरसती है।
प्रश्न उठता है कि यह परमात्मा की कृपा, परमात्मा का स्नेह सबको बराबर मिलता है तो फिर एक व्यक्ति अधिक सुखी और दूसरा दुख की मार से पीड़ित क्यों होता है? प्रश्न तर्कसंगत भी है और जरूरी भी है। संतों की वाणी इस संबंध में मार्गदर्शन करते हुए कहती है-‘सांसारिक पदार्थों के लिए होने वाले दु:ख की परवाह भगवान नहीं करते हैं।’
इस सत्य से सभी अच्छी तरह परिचित हैं कि मनुष्य के दु:ख सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति में असफल होने से पैदा होते हैं। सांसारिक वस्तुओं की चिंता तो मनुष्य को रहती है, उसकी भगवान परवाह क्यों करें? संसारी मनुष्य सांसारिक वस्तुओं को पाने की होड़ और दौड़ में स्वयं अपने को और परमपिता परमात्मा को भुला बैठता है। मनुष्य भूल जाता है कि उसे संसार में क्यों भेजा गया है और परमात्मा उसे संसार में भेजकर उसे करवाना क्या चाहता है। जब मनुष्य भगवान के प्रति लापरवाह हो जाता है, तो भगवान भी उसकी परवाह क्यों करें। मनुष्य की भगवान के प्रति लापरवाही से परमपिता पर कोई असर नहीं पड़ता है, लेकिन भगवान की लापरवाही मनुष्य के प्रारब्ध तक को प्रभावित करती है। मनुष्य के आज और आने वाले कल का स्वरूप बदल देती है।
भगवान की उपेक्षा का सीधा सा अर्थ है, अपने जीवन की गति को अवरुद्ध करना और गति का विरोध होना कभी किसी के पक्ष में तो नहीं रहता है। परमात्मा की प्रत्येक कृपा के प्रति निरंतर धन्यवाद ज्ञापित करते रहने भर से राह के तमाम कांटे होते दूर हो जाते हैं और पुष्प पंखुड़ियों से सुसज्जित, सुगंधित मार्ग प्रशस्त होता है।
जैसा कि मैंने पहले कहा मनुष्य भगवान को पाना तो चाहता लेकिन उससे भी ज्यादा वह भगवान से सब कुछ पाना चाहता है, नादान मनुष्य नहीं जानता कि भगवान को पा लेना ही सब कुछ पा लेना है। भगवान को पा लेने के बाद किसी वस्तु को पाने की इच्छा रह ही नहीं सकती है, लेकिन भगवान को पाना कौन चाहता है। अरबों की आबादी वाली इस दुनिया में उंगलियों की पोरों पर गिने जा सकने वाले लोग ही हैं, जो संसार से ज्यादा भगवान को पाने में रुचि रखते हैं।