हर मुसलमान को पता होना चाहिए ज़कात और फ़ितरा के बीच का ये बड़ा अंतर
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 09:25 PM
इस्लाम धर्म में ज़कात और फ़ितरा सिर्फ धार्मिक फर्ज़ नहीं बल्कि इंसानियत और समाज सेवा का भी प्रतीक हैं। ये दोनों ऐसी इबादतें हैं जो समाज के ज़रूरतमंद तबके की मदद और उनके सम्मानजनक जीवन की गारंटी देती हैं। Difference Between Zakat and Fitrah
क्या है ज़कात और क्यों है यह जरूरी?
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, ज़कात हर उस मुसलमान पर फर्ज़ है जो 'साहिबे माल' यानी संपन्न हो यानी जिसके पास न्यूनतम 85 ग्राम सोने या 595 ग्राम चांदी के बराबर संपत्ति साल भर तक कायम रहे। इस स्थिति में व्यक्ति को अपनी कुल संपत्ति का 2.5% हिस्सा ज़कात के रूप में निकालना होता है। यह रकम सीधे जरूरतमंदों, गरीबों, यतीमों और समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचाई जाती है। मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन बताते हैं कि ज़कात अदा न करने पर माल में बरकत नहीं रहती। वे कहते हैं, "ज़कात इंसान के माल को पाक करती है और समाज में आर्थिक संतुलन बनाए रखती है।"
ईद से पहले गरीबों के लिए सहारा
फ़ितरा (या सदक़ा-ए-फ़ित्र) रमज़ान के महीने के अंत में, ईद-उल-फ़ित्र की नमाज़ से पहले अदा किया जाता है। इसका उद्देश्य है रोज़े के दौरान हुई छोटी-मोटी खामियों की तलाफ़ी और ज़रूरतमंदों तक ईद की खुशी पहुंचाना। फ़ितरा की तय मात्रा लगभग 3 किलो गेहूं या उसकी कीमत के बराबर होती है। यह हर मुसलमान पर वाजिब है जो अपनी जरूरतें पूरी करने के बाद कुछ न कुछ बचत रखता हो चाहे वह पुरुष हो, महिला या बच्चा।
मौलाना इफराहीम बताते हैं, "फ़ितरा का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी शख्स ईद की खुशी से महरूम न रहे। यह भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम देता है।" Difference Between Zakat and Fitrah