
Chanakya Niti : आज के भौतिकवादी युग में कौन नहीं चाहेगा कि वह ऐशो आराम की जिंदगी यापन करें। व्यक्ति दुनिया के तमाम सुख हासिल करना चाहता है। साथ ही भोग विलास की जिंदगी भी जीना चाहता है। लेकिन क्या एक व्यक्ति के लिए यह सब ठीक है। आज देश और विदेश में जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसमें न केवल पुरुष बल्कि महिला भी ऐसे काम कर बैठती है, जो उसके गुण धर्म के विरुद्ध होते हैं।
भारत के प्राचीन अर्थशास्त्री, महान विद्वान आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र चाणक्य नीति में व्यक्ति के आचरण को लेकर काफी कुछ लिखा है। आचार्य चाणक्य के अनुसार, कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो गलत काम करने पर सीधे नरक के भोगी होते है। जबकि सत्कर्म करने वाला व्यक्ति महान बनता है। आचार्य चाणक्य ने लिखा है कि ...
अत्यन्तलेपः कटुता च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीच प्रसंग: कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्॥
आचार्य चाणक्य दुष्ट या नीच कर्म करने वाले व्यक्ति को नरक का अधिकारी होने के संदर्भ में कहते हैं कि अत्यन्त क्रोध, कटु वाणी, दरिद्रता, स्वजनों से वैर, नीच लोगों का साथ, कुलहीन की सेवा-नरक की आत्माओं के यही लक्षण होते हैं।
आशय यह है कि दुष्ट व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का होता है। उसकी वाणी कड़वी होती है, उसके मुंह से मीठे बोल निकल ही नहीं सकते। वह सदा दरिद्र-गरीब ही रहता है। औरों की बात ही छोड़िए, उसकी अपने परिवार वालों से भी शत्रुता ही रहती है। नीच लोगों का साथ और ऐसे ही लोगों की सेवा करना ही उसका काम होता है। जिस व्यक्ति में ये सब अवगुण दिखाई दें उसे किसी नरक की आत्मा का अवतार समझना चाहिए।
स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च।।
सत्कर्म का आचरण करने वाले व्यक्ति को महात्मा रूप में व्यक्त करते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दान देने में रुचि, मधुर वाणी, देवताओं की पूजा तथा ब्राह्मणों को सन्तुष्ट रखना, इन चार लक्षणों वाला व्यक्ति इस लोक में स्वर्ग की आत्मा के समान होता है।
आशय यह है कि दान देने की आदत वाला, सबसे प्रिय बोलने वाले देवताओं की पूजा करने वाला तथा विद्वानों-ब्राह्मणों का सम्मान करने वाला व्यक्ति दिव्य आत्मा होता है। जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पाये जाते हैं, वह महान पुरुष होता है। ऐसे व्यक्ति को किसी स्वर्ग की आत्मा का अवतार समझना चाहिए।
गम्यते यदि मुगेन्द्रमन्विरे लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम्। जम्बुकाश्रयगतं च प्राप्यते वत्सपुच्छखरचर्मखण्डम् ॥
संगति के प्रभाव को दर्शाते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई सिंह की गुफा में जाए, तो उसे वहां हाथी के कपोल का मोती प्राप्त होता है। यदि वही व्यक्ति गीदड़ की मांद में जाए, तो उसे बछड़े की पूंछ तथा गधे के चमड़े का टुकड़ा ही मिलेगा। आशय यह है कि शेर की गुफा में जाने पर व्यक्ति को हाथी की खोपड़ी का मोती मिलता है, जबकि वही व्यक्ति गीदड़ की मांद में जाता है, तो वहां उसे केवल बछड़े की पूंछ या गधे के चमड़े का टुकड़ा ही मिल सकता है। कहने का आशय यह है कि यदि व्यक्ति महान लोगों का साथ करता है, तो उसे ज्ञान की बातें सीखने को मिलती हैं, जबकि नीच दुष्ट लोगों की संगति करने पर केवल दुष्टता ही सीखी जा सकती है। अतः सज्जनों का ही साथ करना चाहिए।