
Chanakya Niti : वर्तमान समय में धनवान व्यक्ति की ही सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। यदि आपके पास धन है तो रिश्तेदार और मित्र भी आपका साथ देंगे, लेकिन यदि धन नहीं है तो अपने ही छोड़कर चले जाते हैं। धन को लेकर आचार्य चाणक्य ने अपने नीतिशास्त्र चाणक्य नीति में काफी स्पष्ट रुप से लिखा है। चाणक्य नीति के अनुसार धन ही नहीं एक वस्तु और है, जो इंसान का सबसे अनमोल गहना होता है। आचार्य चाणक्य ने धन कमाने वाले लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। उनका कहना है कि धन कमाने के लिए लोग क्या करते हैं, यह उनके चरित्र पर निर्भर करता है।
व्यक्ति के सम्मान और धन को लेकर आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र ''चाणक्य नीति के आठवें अध्याय में लिखा है कि
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मान व मध्यमाः। रतमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।1।।
यहां आचार्य चाणक्य कहते हैं कि अधम धन की इच्छा करते हैं, मध्यम धन और मान चाहते हैं, किन्तु उत्तम केवल मान ही चाहते हैं। महापुरुषों का धन मान ही है। नीच लोगों के लिए धन ही सब कुछ होता है। इसे प्राप्त करने के लिए वे गलत सही हर तरीका अपना सकते हैं। औसत आदमी धन तो चाहता है, किन्तु अपमान के साथ नहीं, बल्कि सम्मान के साथ। अर्थात वह धन और सम्मान दोनों चाहता है। किन्तु महापुरुष धन की बिलकुल भी चाह नहीं करते। वे मान-सम्मान को ही महत्त्व देते हैं। मान-सम्मान ही उनका धन होता है।
इक्षुरापः पयोमूलं ताम्बूलं फलमौषधम्। भक्षयित्वापि कर्त्तव्यास्नानदानादिकाः क्रियाः॥
यहां आचार्य चाणक्य स्नान, दान के लिए किसी वर्जना या समय की बाध्यता न मानते हुए कहते हैं कि ईख, जल, दूध, मूल, पान, फल और औषधि को खा लेने के बाद भी स्नान, दान आदि कार्य किए जा सकते हैं। आशय यह है कि गन्ना चूसने के बाद पानी या दूध पी लेने के बाद, पान चबा लेने के बाद, कोई कन्द मूल, फल या दवा खा लेने के बाद भी स्नान, पूजा, दान आदि कार्य किए जा सकते हैं। जबकि अन्य चीजें खा-पी लेने पर ये कार्य नहीं किये जाते।
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते। यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥
यथा अन्न तथा मन की चर्चा करते हुए आचार्य कहते हैं कि दीपक अन्धकार को खाता है और काजल पैदा करता है। अतः जो नित्य जैसे अन्न खाता है, वह वैसी ही सन्तान को जन्म देता है। व्यक्ति का भोजन जैसा होता है, वैसी ही उसकी सन्तान भी पैदा होती है। सात्विक भोजन करने से सन्तान भी योग्य और बुद्धिमान होगी तथा तामसी भोजन से मूर्ख सन्तान ही पैदा होगी। दीपक अन्धकार को खाता है, तो कालिमा ही पैदा करता है।
चाण्डालानां सहस्त्रैश्च सूरिभिस्तत्वदर्शिभिः। एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो चवनात्परः॥
यवन को निम्नतम कोटि का मानते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि तत्त्वदर्शी विद्वानों ने कहा है कि हजार चाण्डालों के बराबर एक यवन होता है। यवन से नीच कोई नहीं होता। आशय यह है कि विद्वान महापुरुषों के अनुसार एक हजार चाण्डालों के बराबर बुराइयां एक यवन में होती हैं। इसलिए यवन सबसे नीच मनुष्य माना जाता है। यवन से नीच कोई नहीं होता है। Chanakya Niti
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