आपके आसपास ही है तीनों लोकों का सुख, जानें कहां है ?
Chanakya Niti in hindi
भारत
चेतना मंच
17 Dec 2023 04:42 PM
Chanakya Niti : सुखमय जीवन यापन करने के लिए आज का मनुष्य क्या कुछ नहीं करता है। सुखमय जीवन के लिए अनेक प्रकार के जतन किए जाते हैं, लेकिन उसके बाद भी मनुष्य को सुख नहीं मिल पाता है। देश के महान दार्शनिक, अर्थशास्त्री और कूट राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र 'चाणक्य नीति' में सुख पाने के स्थानों का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि वो कौन सा स्थान है, जहां मनुष्य को सारे सुख मिल सकते हैं। यही नहीं मनुष्य इन स्थानों पर तीनों लोकों का सुख प्राप्त कर सकता है।
Chanakya Niti in hindi
आपको एक बार फिर बता दें कि आचार्य चाणक्य की नीतियों का आज बहुत सारे लोग अनुसरण कर रहे हैं। आचार्य चाणक्य के नीति शास्त्र चाणक्य नीति में लिखी बातों पर अमल करके लोग अपने जीवन को सुखमय बना रहे हैं। आचार्य चाणक्य ने न केवल घर परिवार को सुखमय बनाने के उपाय बताए हैं, बल्कि यह भी बताया है कि आप सुख कैसे प्राप्त कर सकते हैं। चाणक्य नीति के अनुसार यदि आप तीनों लोको सुख हासिल करना चाहते हैं तो आपको क्या करना चाहिए। आइए जानते हैं...
घर मैं ही त्रैलोक्य सुख
चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य ने लिखा है कि...
माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः ।
बान्धवा विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्।।
आचार्य चाणक्य तीनों लोकों के सुख की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जिस मनुष्य की मां लक्ष्मी के समान है, पिता विष्णु के समान है और भाई-बन्धु विष्णु के भक्त हैं, उसके लिए अपना घर ही तीनों लोकों के समान है। इसका मतलब यही है कि जिस मनुष्य की मां गुणों में लक्ष्मी के समान तथा पिता भगवान विष्णु की तरह सबका कल्याण करने वाले हों और नाते-रिश्तेदार, भाई-बन्धु भगवान के भक्त हों, उस मनुष्य को तीनों लोकों के सुख इसी संसार में मिल जाते हैं।
इंदियों की शुद्धता
दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्।।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मल का त्याग करने वाली इन्द्री को चाहे जितनी बार भी स्वच्छ किया जाए, साबुन-पानी से सैकड़ों बार धोया जाए फिर भी वह स्पर्श करने योग्य नहीं बन पाती, उसी प्रकार दुर्जन को समझाया-बुझाया जाए, वह सज्जन नहीं बन सकता।
आशय यह है कि इस संसार में दुर्जन को सुधारने का प्रयास निरर्थक ही है, क्योंकि ऐसा कोई साधन नहीं, जिससे उसे सुधारा जा सके। यह बात बिलकुल ऐसी ही प्रतीत होती है कि कुत्ते के पूछ को कितने ही दिन कांच की नली में दबाकर रखा जाए, परंतु बाहर निकलने पर वह टेढ़ी ही रहेगी। मूर्ख को कितना ही समझाया जाय, वह मूर्ख ही रहेगा।
धन का नाश
आप्तद्वेषाद् भवेन्मृत्युः परद्वेषातु धनक्षयः।
राजद्वेषाद् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः।।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि साधुओं-महात्माओं से शत्रुता करने पर मृत्यु होती है। शत्रु से द्वेष करने पर धन का नाश होता है। राजा से द्वेष-शत्रुता करने पर सर्वनाश हो जाता है और ब्राह्मण से द्वेष करने पर कुल का नाश होता है।
आशय यह है कि साधुओं-महात्माओं, ऋषियों, मुनियों, पूज्य लोगों से द्वेष भावना शत्रुता रखने से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। शत्रु से द्वेष करने पर लड़ाई-झगड़े बढ़ते हैं और इससे धन का नाश होता है। राजा से शत्रुता करने पर व्यक्ति का सबकुछ नाश हो जाता है तथा ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति से द्वेष करना अपने कुल पर कलंक लगाने के समान है।
निर्धनता अभिशाप है
वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं, द्रुमालयः पत्रफलाम्बु सेवनम्।
तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं, न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम्।।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य हिंसक जीवों-बाघ, हाथी और सिंह जैसे भयंकर जीवों से घिरे हुए वन में रह ले, वृक्ष पर घर बनाकर, फल-पत्ते खाकर और पानी पीकर निर्वाह कर ले, धरती पर घास-फूस बिछाकर सो ले और फटे-पुराने टुकड़े-टुकड़े हुए वृक्षों की छाल को ओढ़कर शरीर को ढक ले, परन्तु धनहीन होने की दशा में अपने सम्बन्धियों के साथ कभी न रहे, क्योंकि इससे उसे अपमान और उपेक्षा का जो कड़वा घूंट पीना पड़ता है, वह सर्वथा असह्य होता है।
आशय यह है कि निर्धन होना बड़ा पाप है। ऐसे में निर्धन व्यक्ति को अपने सगे संबंधियों से जो अपमान सहना पड़ता है बड़ा असहनीय होता है।
ब्राह्मण धर्म
आचार्य चाणक्य ब्राह्मण धर्म के बारे में कहते हैं कि...
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं सन्ध्या वेदाः शास्त्रा धर्मकर्माणि पत्रम्।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्।।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि विप्र वृक्ष है, सन्ध्या उसकी जड़ है, वेद उसकी शाखाएं हैं, और धर्म-कर्म उसके पत्ते हैं इसलिए जड़ की हरसम्भव रक्षा करनी चाहिए। जड़ के टूट जाने पर न तो शाखाएं रहती हैं और न पत्ते। आशय यह है कि सन्ध्या-पूजा ब्राह्मण का मुख्य कार्य है। ऐसा न करने वाला ब्राह्मण फिर ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता। सन्ध्या-पूजा करके ही ब्राह्मण को वेदों का सच्चा ज्ञान होता है। तभी वह धर्म-कर्म भी कर सकता है। अत: उसे सन्ध्या -पूजा अवश्य करनी चाहिए।
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