
चार दिनों तक चलने वाला छठ महापर्व भारतीय संस्कृति की सबसे अनुशासित और पवित्र परंपराओं में से एक है। व्रती 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखकर न केवल आस्था की पराकाष्ठा दिखाते हैं, बल्कि शरीर और मन दोनों की साधना करते हैं। देश के हर कोने से लेकर विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय तक सब इस अवसर पर अपनी मिट्टी की खुशबू से जुड़ने लौट आते हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो मानो इन दिनों हर गली, हर घाट पर भक्ति और उल्लास का सागर उमड़ पड़ता है। छठ सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति धन्यवाद का पर्व है सूर्य की ऊर्जा, जल की शुद्धता और मिट्टी की उर्वरता के प्रति हमारी कृतज्ञता का भी प्रतीक है। Chhath Puja 2025
इस पर्व में व्रती सुबह की पहली किरण और शाम के अस्त होते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं जो जीवन के आरंभ और अंत, दोनों के प्रति समान सम्मान का प्रतीक है। छठी मईया और सूर्यदेव की आराधना से संतान की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि और समाज में संतुलन की कामना की जाती है। लेकिन इस पर्व की महत्ता सिर्फ धार्मिक सीमाओं में नहीं बंधी है यह वास्तव में एक इको-फ्रेंडली और हेल्थ-फ्रेंडली फेस्टिवल है, जो इंसान को प्रकृति के और करीब लाता है। चलिए जानते हैं, कैसे यह पर्व भक्ति के साथ सेहत और पर्यावरण का भी उत्सव बन गया है। Chhath Puja 2025
छठ में सूर्यदेव और छठी मईया की आराधना की जाती है। व्रती उदयमान सूर्य के साथ अस्ताचलगामी सूर्य को भी अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम भी है।
छठ पूजा सिर्फ पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि स्वच्छता और शुद्धता का उत्सव भी है। इस महापर्व की शुरुआत ही सफाई से होती है—घर हो या घाट, हर जगह झाड़ू, पानी और भक्ति का संगम दिखाई देता है। व्रती जिस जल में अर्घ्य अर्पित करते हैं, उसकी पवित्रता के लिए लोग तालाबों और नदियों की पहले से सफाई करते हैं। यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रतीक भी है। दरअसल, छठ हमें सिखाता है कि ईश्वर की आराधना तभी सार्थक है जब धरती, जल और वायु भी निर्मल हों। यही कारण है कि यह त्योहार हर साल लोगों को प्रकृति से जुड़ने और उसकी रक्षा का संकल्प दिलाता है।
छठ महापर्व की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें कृत्रिमता की कोई जगह नहीं। पूजा में चढ़ाया जाने वाला हर अर्पण, हर प्रसाद पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक होता है। व्रती बांस से बनी डलिया या सूप में फल, ठेकुआ और प्रसाद सजाकर घाट तक ले जाते हैं — न प्लास्टिक, न कोई रासायनिक सजावट। यही सादगी इस पर्व की सबसे बड़ी पहचान है। अगर ये डलिया या सूप घाट पर रह भी जाएं, तो ये मिट्टी में मिलकर धरती की उर्वरता बढ़ाते हैं, उसे नुकसान नहीं पहुंचाते। इस तरह छठ सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण बन जाता है — जहां भक्ति के साथ-साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी समान रूप से झलकती है।
छठ पूजा का मूल केंद्र है सूर्यदेव की आराधना, जो प्रकृति और जीवन दोनों के आधार हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सूर्य सिर्फ एक देवता नहीं, बल्कि धरती पर हर जीवन का स्रोत हैं। इंसान से लेकर पशु-पक्षी, वृक्षों से लेकर सूक्ष्म जीव तक सभी किसी न किसी रूप में सौर ऊर्जा पर निर्भर हैं। आज जब दुनिया ऊर्जा संकट और प्रदूषण से जूझ रही है, तब छठ पूजा का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। सूर्य की किरणें सिर्फ रोशनी ही नहीं, जीवन की धड़कन हैं — यही कारण है कि छठ पर्व सूर्य की आराधना के माध्यम से प्रकृति, विज्ञान और आस्था — तीनों का संगम प्रस्तुत करता है। Chhath Puja 2025
छठ पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसमें कृत्रिमता नहीं, केवल प्रकृति की गोद से मिले उपहार अर्पित किए जाते हैं। पूजा के थाल में सजे नारियल, केला, मूली, गन्ना, नींबू, अनानास, लौकी, पेठा, सुथनी और शकरकंद ये सब मौसमी और स्थानीय फलों-सब्जियों का अद्भुत संगम होते हैं। इन वस्तुओं के चयन के पीछे केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन का संदेश छिपा है। यह पर्व सिखाता है कि धरती जो देती है, वही सबसे पवित्र अर्पण है। छठ का प्रसाद इसीलिए केवल स्वाद का नहीं, बल्कि संस्कार और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक भी है। Chhath Puja 2025
छठ पूजा की रात जब घाटों पर हजारों मिट्टी के दीपक एक साथ जगमगाते हैं, तो वह दृश्य केवल भक्ति का नहीं, बल्कि धरती और आकाश के मिलन का अद्भुत प्रतीक बन जाता है। ये दीये देसी घी या सरसों के तेल से प्रज्वलित होते हैं, जिनकी लौ न सिर्फ वातावरण को आलोकित करती है, बल्कि वायु को भी शुद्ध बनाती है। इन दीपों की खास बात यह है कि ये प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देते हैं। Chhath Puja 2025
वेदों में बताया गया है कि उषाकाल में सूर्य की किरणें शरीर के लिए अमृत समान होती हैं। छठ में सुबह और शाम, दोनों समय अर्घ्य देने की परंपरा इसी विज्ञान पर आधारित है। इसके अलावा छठ का निर्जला व्रत शरीर में विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है और आत्म-नियंत्रण की शक्ति बढ़ाता है। पूजा में चढ़ाई जाने वाली वस्तुएं—गुड़, चावल, फल, मेवा और सूजी का ठेकुआ पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती हैं। घाटों पर स्नान, सुबह की धूप और शुद्ध वातावरण में समय बिताना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी होता है। Chhath Puja 2025