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पहली नजर में यह ट्रेंड मॉडर्न और खुले रिश्तों की तरह लगता है लेकिन इसके पीछे की सच्चाई रिश्तों के लिए काफी उलझन भरी और भावनात्मक रूप से नुकसानदायक मानी जा रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस ट्रेंड में एक व्यक्ति चुपचाप समझौता करता रहता है जिससे रिश्ते का संतुलन बिगड़ जाता है।

आज के दौर में रिश्तों की परिभाषा तेजी से बदल रही है। सोशल मीडिया, नई सोच और बदलती लाइफस्टाइल के कारण डेटिंग की दुनिया में हर दिन नए ट्रेंड सामने आ रहे हैं। इन्हीं में से एक नया शब्द इन दिनों तेजी से चर्चा में है टोल्यामोरी। पहली नजर में यह ट्रेंड मॉडर्न और खुले रिश्तों की तरह लगता है लेकिन इसके पीछे की सच्चाई रिश्तों के लिए काफी उलझन भरी और भावनात्मक रूप से नुकसानदायक मानी जा रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस ट्रेंड में एक व्यक्ति चुपचाप समझौता करता रहता है जिससे रिश्ते का संतुलन बिगड़ जाता है और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।
टोल्यामोरी शब्द “टोलरेट” यानी सहन करना और “पॉलीअमोरी” से मिलकर बना है। इस ट्रेंड में एक व्यक्ति अपने पार्टनर के दूसरे रिश्तों या बेवफाई को जानते हुए भी चुपचाप सहन करता रहता है। यहां रिश्ते में बराबरी नहीं होती और न ही खुलकर बातचीत होती है। एक व्यक्ति अपनी भावनाओं को दबाकर रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करता रहता है जबकि दूसरा व्यक्ति अपनी आजादी का फायदा उठाता है। धीरे-धीरे यह स्थिति रिश्ते को असंतुलित बना देती है और व्यक्ति खुद को नजरअंदाज करने लगता है।
पॉलीअमोरी और टोल्यामोरी को अक्सर लोग एक जैसा समझ लेते हैं लेकिन दोनों में बड़ा फर्क होता है। पॉलीअमोरी में सभी लोगों की सहमति और पारदर्शिता होती है। इसमें रिश्ते के नियम साफ होते हैं और सभी पार्टनर एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं। वहीं टोल्यामोरी में ऐसा नहीं होता। इसमें एक व्यक्ति अपनी असली भावनाओं को दबाकर सिर्फ समझौता करता रहता है। इस वजह से रिश्ता बराबरी का नहीं रह जाता और धीरे-धीरे तनाव बढ़ने लगता है।
आज की पीढ़ी पर सोशल मीडिया का प्रभाव काफी ज्यादा है। लोग खुद को मॉडर्न और ओपन माइंडेड दिखाने की कोशिश करते हैं। कई बार वे अपनी असली भावनाओं को छुपा लेते हैं और जलन, असुरक्षा या दुख जैसी भावनाओं को व्यक्त नहीं करते। उन्हें लगता है कि ऐसा करना उन्हें ज्यादा समझदार और परिपक्व दिखाएगा। यही सोच टोल्यामोरी जैसे ट्रेंड को बढ़ावा देती है जहां व्यक्ति अपनी भावनाओं को नजरअंदाज करके रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करता है।
टोल्यामोरी वाले रिश्तों में रहने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से कमजोर होने लगता है। लगातार समझौता करने से आत्मसम्मान कम हो सकता है और व्यक्ति खुद को कम महत्व देने लगता है। ऐसे रिश्तों में भरोसा और सुरक्षा की भावना भी कम हो जाती है। इससे तनाव बढ़ता है और रिश्ते में दूरी आने लगती है। कई बार व्यक्ति अंदर ही अंदर परेशान रहता है लेकिन वह अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता।
लंबे समय तक अपनी भावनाओं को दबाकर रखना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं माना जाता। टोल्यामोरी वाले रिश्तों में व्यक्ति अकेलापन, चिंता और तनाव महसूस कर सकता है। धीरे-धीरे यह स्थिति डिप्रेशन जैसी समस्याओं को भी जन्म दे सकती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि किसी भी रिश्ते में खुलकर बातचीत और बराबरी जरूरी होती है ताकि दोनों लोग भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस कर सकें।
रिश्ते तब मजबूत होते हैं जब उनमें भरोसा, सम्मान और खुलापन होता है। अगर कोई रिश्ता सिर्फ समझौते पर टिका हो तो वह लंबे समय तक टिकना मुश्किल हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि किसी भी नए ट्रेंड को अपनाने से पहले उसकी सच्चाई को समझा जाए। रिश्तों में अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय खुलकर बात करना ज्यादा बेहतर माना जाता है।