
Hindi Kahani - प्राचीन समय में शोभावती नामक नगरी में यज्ञसोम नाम का एक ब्राह्मण रहता था। जब उसका यौवन बीत गया, तब सौ-सौ मनोरथों के बाद उसकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। यज्ञसोम ने उस बालक का नाम देवसोम रखा। देवसोम जब सोलह वर्ष का हुआ, तो अचानक ज्वर से उसकी मृत्यु हो गई।
इस प्रकार बालक की अचानक मृत्यु पर माता-पिता बहुत दुःखी हुए। वे बालक के शव को आलिंगन में बांधकर विलाप करने लगे। काफी देर तक उन्होंने बालक के शव को आलिंगन में बांधे रखा और शव को दाह-क्रिया के लिए नहीं ले जाने दिया। वहां इकट्ठे बड़े-बूढ़ों ने उसे बहुत समझाया, तब उसने शव को नहलाया-धुलाया फिर उसे एक पालकी पर रखकर, आंसू बहाते तथा रोते-पीटते वे बंधु-बांधव, जो वहां इकट्ठे थे, श्मशान में ले गए।
उस श्मशान में कुटिया बनाकर एक बूढ़ा तपस्वी रहता था। अधिक अवस्था और कठोर तपस्या के कारण उसका शरीर अत्यंत कृश हो गया था। उसका नाम वामशिव था। उसके साथ उसकी कुटिया में एक शिष्य भी रहता था। योगी ने कुछ ही देर पहले उसे भला-बुरा कहा था, जिससे वह चिढ़ा हुआ था। वह मूर्ख और दुष्ट था। ध्यान और योग आदि की क्रियाओं में लगे रहने के कारण उसे अहंकार हो गया था। वह भीख में मिले हुए अन्न को खाकर निर्वाह करता था। बाहर दूर से आते हुए इस जन कोलाहल को सुनकर योगी ने उससे कहा- बाहर जाकर देख आओ कि इस एमशान में शोरगुल क्यों हो रहा है।'
गुरु की बात सुनकर वह बोला- 'मैं नहीं जाऊंगा, आप ही जाइए। मेरी भिक्षा-बेला बीती जा रही है। '
यह सुनकर गुरु बोले- 'अरे मूर्ख पेटू! तुझे धिक्कार है। आधा दिन बीत जाने पर यह तेरी कैसी भिक्षा-बेला है?"
यह सुनकर उस क्रुद्ध और बुरे शिष्य ने तपस्वी से कहा- 'अरे बुड्ढे । तुझे धिक्कार है। न मैं तेरा शिष्य हूँ, न तू मेरा गुरु है। मैं दूसरी जगह जा रहा हूं। तू अपना यह कमण्डल संभाल।' यह कह कर वह उठा और तपस्वी के सम्मुख दण्ड- कमण्डल रखकर वहां से चलता बना।
उसके जाने के बाद तपस्वी हंसता हुआ कुटिया से बाहर निकला और वहां आया, जहां वह ब्राह्मण बालक दाहकर्म के लिए लाया गया था। वहां उसने देखा कि लोग तरुणाई के द्वार पर खड़े उस बालक के लिए शोक कर रहे थे। बुढ़ापे के कारण क्षीण उस योगी ने उस शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। यह निश्चय कर वह एकान्त में जाकर पहले तो जी खोल कर रोया, फिर अंगों के संचालन के साथ शीघ्रता से नाचने लगा।
कुछ ही देर बाद यौवन की इच्छा रखने वाले उस संन्यासी ने अपना शरीर छोड़कर योगबल से उस ब्राह्मणपुत्र के शरीर में प्रवेश किया। फिर देखते ही देखते सजाई हुई चिता पर वह ब्राह्मणपुत्र जीवित होकर, जंभाई लेता हुआ उठ बैठा। यह देखकर वहां एकत्र सब लोग बोल पड़े- 'अरे, यह तो जीवित हो गया!'
ब्राह्मणपुत्र के शरीर में प्रविष्ट उस तपस्वी ने जो योगों का स्वामी था और अपने तमाम व्रतों को छोड़ना नहीं चाहता था, बोला- 'मरकर जब मैं परलोक गया, तो भगवान् शिव ने प्रकट होकर मुझे जीवनदान दिया और कहा कि तुम्हें पाशुपत व्रत लेना है। मुझे इसी समय एकांत में जाकर वह व्रत ग्रहण करना है। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा, तो जीवित नहीं रहूंगा। इसलिए आप लोग लौट जाइए। मैं भी जा रहा हूं।'
यह कहकर उस तपस्वी ने जिसने व्रत का दृढ़ निश्चय कर रखा था, वहां एकत्र हुए हर्ष और शोक से विह्वल सब लोगों को समझा-बुझाकर, घर लौटा दिया। फिर उसने जाकर अपने पूर्व शरीर को एक खड्ड में डाल दिया और व्रत धारण करके युवा शरीर से अन्यत्र चला गया। को खाकर निर्वाह करता था। बाहर दूर से आते हुए इस जन कोलाहल को सुनकर योगी ने उससे कहा- बाहर जाकर देख आओ कि इस एमशान में शोरगुल क्यों हो रहा है।'
गुरु की बात सुनकर वह बोला- 'मैं नहीं जाऊंगा, आप ही जाइए। मेरी भिक्षा-बेला बीती जा रही है। '
यह सुनकर गुरु बोले- 'अरे मूर्ख पेटू! तुझे धिक्कार है। आधा दिन बीत जाने पर यह तेरी कैसी भिक्षा-बेला है?"
यह सुनकर उस क्रुद्ध और बुरे शिष्य ने तपस्वी से कहा- 'अरे बुड्ढे । तुझे धिक्कार है। न मैं तेरा शिष्य हूँ, न तू मेरा गुरु है। मैं दूसरी जगह जा रहा हूं। तू अपना यह कमण्डल संभाल।' यह कह कर वह उठा और तपस्वी के सम्मुख दण्ड- कमण्डल रखकर वहां से चलता बना।
उसके जाने के बाद तपस्वी हंसता हुआ कुटिया से बाहर निकला और वहां आया, जहां वह ब्राह्मण बालक दाहकर्म के लिए लाया गया था। वहां उसने देखा कि लोग तरुणाई के द्वार पर खड़े उस बालक के लिए शोक कर रहे थे। बुढ़ापे के कारण क्षीण उस योगी ने उस शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। यह निश्चय कर वह एकान्त में जाकर पहले तो जी खोल कर रोया, फिर अंगों के संचालन के साथ शीघ्रता से नाचने लगा।
कुछ ही देर बाद यौवन की इच्छा रखने वाले उस संन्यासी ने अपना शरीर छोड़कर योगबल से उस ब्राह्मणपुत्र के शरीर में प्रवेश किया। फिर देखते ही देखते सजाई हुई चिता पर वह ब्राह्मणपुत्र जीवित होकर, जंभाई लेता हुआ उठ बैठा। यह देखकर वहां एकत्र सब लोग बोल पड़े- 'अरे, यह तो जीवित हो गया!'
ब्राह्मणपुत्र के शरीर में प्रविष्ट उस तपस्वी ने जो योगों का स्वामी था और अपने तमाम व्रतों को छोड़ना नहीं चाहता था, बोला- 'मरकर जब मैं परलोक गया, तो भगवान् शिव ने प्रकट होकर मुझे जीवनदान दिया और कहा कि तुम्हें पाशुपत व्रत लेना है। मुझे इसी समय एकांत में जाकर वह व्रत ग्रहण करना है। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा, तो जीवित नहीं रहूंगा। इसलिए आप लोग लौट जाइए। मैं भी जा रहा हूं।'
यह कहकर उस तपस्वी ने जिसने व्रत का दृढ़ निश्चय कर रखा था, वहां एकत्र हुए हर्ष और शोक से विह्वल सब लोगों को समझा-बुझाकर, घर लौटा दिया। फिर उसने जाकर अपने पूर्व शरीर को एक खड्ड में डाल दिया और व्रत धारण करके युवा शरीर से अन्यत्र चला गया।