Hindi Kavita
निकल जा अपनी राह पर
दिखा दे अपनी धार
कोई नहीं है अपना यहां
क्योंकि यह है संसार
अपनों को सम्मान दे
सपनों को उड़ान दे
अब ना तू विश्राम कर
विश्व का कल्याण कर
निकल जा अपनी राह पर
छोटा नहीं रहा है अब
तू जीवन का निर्वाह कर
प्यार करना ही है तो
प्रकृति से कर
दुनिया में अपने नाम कर
वैद्य की भूमिका निभा
दुखियों का उपचार कर
निकल जा अपनी राह पर
प्रशांत मिश्रा 'रवि जी'
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